काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 791, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें'बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८] खिलस्थानम् ४३१
भुक्तवन्तं च तैलस्य प्रसृतेनानुवासयेत् । वायुः प्रशाम्यते तेन निरूहेण प्रचालितः ॥८१॥
जांगल मांसरस का भोजन करने के बाद उस व्यक्ति को एक प्रसृत तैल के द्वारा अनुवासन (स्नेहबस्ति) देनी चाहिये। इससे शरीर में निरूहबस्ति के द्वारा विचलित हुआ वायु शान्त हो जाता है। अर्थात् निरूह बस्ति के द्वारा शरीर में वायु विक्षुभित हो जाता है उसकी शान्ति के लिये अनुवासन (स्नेह) बस्ति का प्रयोग करना चाहिये ॥८१॥
आस्थापनो बस्तिरयं गुदनिर्वापणं नरः । एकान्तरं ततश्चोर्ध्वं यथोक्तमनुवासनम् ॥८२॥
आस्थापन (निरूह) बस्ति देकर एक अथवा एक से अधिक दिन के बाद रोगी की गुदा का निर्वापण करने वाला अनुवासन (स्नेह बस्ति) देना चाहिये। चरक सि. अ. १ में भी कहा है कि-निरूह के बाद यदि वायु अत्यन्त प्रबल हो तो तीसरे दिन अन्यथा पांचवें दिन अनुवासन देना चाहिये। यदि रोगी की अग्नि मन्द न हो तो उसी दिन भी अनुवासन कराया जा सकता है ॥८२॥
दीप्ताग्नेर्दृढदेहस्य सोदावर्ते विमार्गगे । श्रोणिवङ्क्षणसंस्थे च वाते शस्तं दिने दिने ॥८३॥
प्रतिदिन अनुवासन किसे देना चाहिये ?—जिस व्यक्ति की जाठराग्नि प्रदीप्त हो, शरीर दृढ हो, उदावर्त्त हुआ हो, वायु विपरीत मार्ग में गया हुआ हो अथवा श्रोणि तथा वंक्षण (groin) में स्थित हो तो उसे प्रतिदिन अनुवासन दिया जा सकता है। अष्टाङ्गसंग्रह सू. अ. २८ में कहा है कि-जिनकी अग्नि प्रदीप्त हो, जो रूक्ष हों, वायु की प्रधानता हो तथा नित्य व्यायाम करते हों उन्हें प्रतिदिन अनुवासन कराया जा सकता है। अन्यथा तीसरे या पांचवें दिन कराना चाहिये ॥
तस्य पक्वाशयगतः स्नेहमात्रां प्रभञ्जनः । बलवान् बलवत्यग्नौ वारिवत् स विशोधयेत् ॥८४॥
उस रोगी के पक्वाशय में स्थित वायु यदि बलवान् हो तथा उसकी जाठराग्नि भी बलवान् हो तो उसे मात्रा में स्नेह देना चाहिये। वह स्नेह उस वायु का पानी की तरह शोधन कर देता है अर्थात् जिस प्रकार पानी वायु का शोधन कर देता है उसी प्रकार स्नेह (तैल) भी वायु का शोधन कर देता है। पानी के अन्दर से यदि वायु छनकर गुजरे तो उसकी सब अशुद्धियां पानी अपने में जज्ब (Absorb) कर लेता है उसी प्रकार तैल में भी यही गुण विद्यमान है ॥८४॥
न च तैलात् परं किञ्चिद्द्रव्यमस्त्यनिलापहम् ।
स्नेहाद्रौक्ष्यं गुरुत्वाच्च लघुत्वं मारुतस्य तु ॥८५॥
औष्ण्याच्छैत्यं निहन्त्याशु तैलं पुष्टिं करोति च ।
मनःप्रसादः(दं) स्नेहं च बलवर्णमथापि च ॥८६॥
अनुवासन के गुण—तैल से बढ़कर वायु (वातप्रकोप अथवा वायु के रोग) को नष्ट करने वाला कोई द्रव्य नहीं है। इसी प्रकार चरक सि. अ. १ में कहा है। तैल के गुण—तैल स्नेह होने से वायु की रूक्षता, गुरु होने से वायु की लघुता तथा उष्ण होने से वायु की शीतलता का शीघ्र ही नाश करके शरीर की पुष्टि, मन की प्रसन्नता तथा बल और वर्ण की वृद्धि करता है। इसी प्रकार चरक सि. अ. १ में कहा है ॥८५-८६॥
स्यात् स्निग्धविटपस्कन्धः कोमलाङ्कुरपल्लवः । मूले सिक्तो यथा वृक्षः काले पुष्पफलप्रदः ॥८७॥
स्नेहबस्तेर्नरस्तद्वद् दृढकायो दृढप्रजः । वातात्मकैर्विकारैश्च पूर्वोक्तैर्नाभिभूयते ॥८८॥
जिस प्रकार जड़ को सींचने से वृक्ष की शाखायें तथा तना स्निग्ध (गीला-हरा) रहता है, उसमें कोमल अङ्कुर तथा नवीन पत्ते आने लगते हैं और उचित समय पर वह फूलों तथा फलों से युक्त हो जाता है। उसी प्रकार स्नेहबस्ति (अनुवासन बस्ति) के द्वारा मनुष्य दृढ शरीर तथा हृष्ट-पुष्ट सन्तान वाला हो जाता है तथा पूर्वोक्त वातविकारों के द्वारा वह आक्रान्त नहीं होता है। इसी प्रकार चरक सि. अ. १ में भी कहा है ॥८७-८८॥
५० का.सं.