भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 790

४३० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | बस्तिविशेषणीयाध्यायः ८]

वयसः स्थापनो वृष्यः स्वरवर्णबलाग्निकृत् । वातपित्तकफानां च मलानां चापकर्षणः ॥७३॥
बालवृद्धवयस्थानां क्षिप्रमूर्जस्करः परम् । सर्वेन्द्रियाणां वैशद्यं कुरुते चाङ्गमार्दवम् ॥७४॥
एवमेते समाख्याता निरूहस्य गुणागुणाः ।

बस्ति वयःस्थापक (आयु को स्थिर करने वाली) एवं वृष्य है, स्वर, वर्ण, बल और अग्नि को बढ़ाने वाली है, वात, पित्त तथा कफ रूप दोषों और मलों का अपकर्षण करती (शरीर से बाहर निकालती) है, बाल, वृद्ध तथा युवा व्यक्तियों में शीघ्र ही बल को बढ़ाने वाली है, सब इन्द्रियों को विशद (निर्मल) करती है तथा शरीर के अङ्गों को मृदु कर देती है। इस प्रकार ऊपर निरूह बस्ति के गुण तथा दोष कहे गये हैं ॥७३-७४॥

पुरीषं मारुतः पित्तं कफश्च क्रमशो यदा ॥७५॥
प्रवर्तन्ते च फेनं च शङ्खस्फटिकसन्निभम् । सम्यङ्निरूढगात्राणां मार्दवं जनयेत् परम् ॥७६॥
अन्नाभिलाषो वैशद्यं लघुता वाऽथ मार्दवम् । सृष्टविण्मूत्रवातत्वमिन्द्रियाणां प्रसन्नता ॥७७॥

निरूह के सम्यक् योग के लक्षण—यदि निरूह का सम्यक् योग हुआ हो तो क्रमशः पुरीष (मल), वायु, पित्त तथा कफ निकलते हैं तथा उनके बाद शङ्ख तथा स्फटिक के समान (सफेद) झाग निकलते हैं अर्थात् सम्यक् प्रकार से प्रयुक्त निरूह बस्ति में सर्वप्रथम मल निकलना चाहिये तथा उसके बाद क्रमशः आंतों में से वायु फिर पक्वाशय में से पित्त तथा आमाशय में से कफ का निःसरण होता है तथा अन्त में सफेद झाग निकलते हैं। तथा सम्यक् निरूह हो जाने पर शरीर अत्यन्त मृदु हो जाता है, अन्न में रुचि उत्पन्न होती है, शरीर विशद, लघु तथा मृदु हो जाता है, मल-मूत्र तथा वायु ठीक प्रकार से सरते हैं (निकल जाते हैं) तथा सम्पूर्ण इन्द्रियां प्रसन्न हो जाती हैं ॥७५-७७॥

अयोगे विपरीतं स्यादतियोगेऽतिवर्तनम् । कफपित्तासृजां मांसप्रक्षालननिभस्य वा ॥७८॥
हिक्का कम्पस्तृषा ग्लानिर्गात्रभेदस्तमः क्लमः । निद्रानाशः प्रलापश्च यत्र चाप्युपजायते ॥७९॥

अयोग के लक्षण—निरूह के अयोग में इससे विपरीत लक्षण होते हैं अर्थात् उसमें पुरीष, वायु आदि के निकलने का क्रम उपर्युक्त नहीं रहता है, शरीर मृदु नहीं होता, अन्न में रुचि उत्पन्न नहीं होती, शरीर विशद तथा मृदु नहीं होता है उसके मल-मूत्र तथा वायु ठीक तरह से नहीं सरते हैं तथा इन्द्रियां प्रसन्न नहीं होती हैं। इसी प्रकार चरक सि. अ. १ में भी कहा है।

अतियोग के लक्षण—यदि निरूह का अतियोग हो जाये तो शरीर से कफ, पित्त तथा रक्त अथवा मांस के धोवन के समान जल अधिक मात्रा में निकलता है तथा हिक्का, कम्पन, प्यास, ग्लानि, अङ्गभेद, तम (तमोगुण की प्रधानता), क्लम (थकावट) निद्रानाश तथा प्रलाप आदि लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। चरक सि. अ. १ में कहा है कि-निरूह के अतियोग के वे ही लक्षण होते हैं जो विरेचन के अतियोग के होते हैं। विरेचन के अतियोग के लक्षण पहले कहे जा चुके हैं ॥७८-७९॥

सम्यङ्निरूढमाश्वस्तं परिषिक्तं सुखाम्बुना ।
तनु वा(ना) भोजयेन्मात्रां जाङ्गलानां रसेन वा ॥८०॥

सम्यक् प्रकार से निरूह हो जाने पर रोगी को आश्वासन देकर तथा ईषदुष्ण जल से उसका परिषेचन करके उचित मात्रा में पतले जांगल मांसरस के द्वारा भोजन कराये। निरूहबस्ति में विरेचन के समान अग्नि मन्द नहीं होती है इसलिये इसमें पेयादि संसर्जन क्रम की विशेष आवश्यकता नहीं होती है। इसमें प्रारम्भ से ही जांगल मांसरस दिया जा सकता है। वमन, विरेचन के बाद पेयादि क्रम की आवश्यकता होती है क्योंकि उसमें रोगी की अग्नि मन्द हो जाती है ॥८०॥