भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 795

रक्तगुल्मविनिश्चयाध्यायः ९] खिलस्थानम् ४३५

रक्तगुल्मः कथं स्त्रीणां जायते दुरुपद्रवः ।
अथ कस्मात् कुमाराणां कन्यानां च न जायते ॥४॥
रक्तगुल्मः कथं चासौ रक्तगुल्म इति स्मृतः । कस्मान्निश्चेतनत्वेऽपि गर्भचेष्टा विचेष्टते ॥५॥
दूरान्तरं न त्वनयोश्चेतनाचेतनावतोः । विप्रकृष्टान्तरेऽप्यस्मिन् गर्भशोणितगुल्मयोः ॥६॥
केचिद्विशेषं नेच्छन्ति केचिदिच्छन्ति लिङ्गतः । तयोर्विशेषो यद्यस्ति किमर्थं स उपेक्ष्यते ॥७॥
युक्तो गर्भे दोहदस्य क्षीरस्य च समुद्भवः । आपाण्डुगण्डतादीनां लिङ्गानां च समुद्भवः ॥८॥
न युक्तमिव पश्यामि तस्मिन्नेषां समुद्भवम् ।
रक्तगुल्मेऽथ दृश्यन्ते लिङ्गान्येतानि तत् कथम् ॥९॥
कस्मादादशमान्मासात् परिपाकं नियच्छति । एकद्वित्रिचतुष्पञ्च षट्सप्ताष्टनवादिषु ॥१०॥
मासेषु भेदं नाप्नोति प्रायो गर्भउदास्थितः । नारीणां सुकुमारीणां स कष्ट इति मे मतिः ॥११॥
उपक्रम्यः कथमयं कश्चास्योपक्रमः स्मृतः । कस्यां कस्यामवस्थायां का का वाऽस्यावचारणा ॥१२॥
कस्मिन् काले च निर्भेद्यो भेदनीयं च किं भवेत् ।
विनिर्भिन्ने च किं कार्यमेतदाचक्ष्व मे विभो ! ॥१३॥

स्त्रियों को भयंकर उपद्रवों वाला रक्तगुल्म किस प्रकार हो जाता है तथा वह बालकों और बालिकाओं को क्यों नहीं होता है ? रक्तगुल्म को इस (रक्तगुल्म) नाम से क्यों कहा जाता है ? तथा अचेतन होने पर भी इसमें गर्भ (के समान) चेष्टाएँ क्यों होती हैं ? इन चेतन तथा अचेतन गर्भ और रक्तगुल्म में थोड़ा भेद होने पर भी अधिक भेद नहीं होता है । कुछ लोग इन दोनों में अन्तर (भेद) नहीं करते हैं । कुछ लोग इनमें लक्षणों के द्वारा भेद करते हैं । यदि उन दोनों में भेद है तो उसकी उपेक्षा क्यों की जाती है ? इसमें गर्भ में होनेवाले दोहद (गर्भावस्था में उत्पन्न होनेवाली विशेष इच्छायें), स्तनों में दुग्ध की उत्पत्ति तथा गाल आदि का पाण्डु (रक्तहीनता-(Anarmia) आदि लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं । रक्तगुल्म में जब ये लक्षण उत्पन्न नहीं होने चाहिये तब ये उसमें दिखाई क्यों देते हैं ? यह दसवें महीने तक परिपाक को क्यों प्राप्त होता चला जाता है ? पहले, दूसरे, तीसरे, चौथे, पांचवें, छठे, सातवें, आठवें तथा नौवें महीनों में इसका भेदन क्यों नहीं होता है ? तथा यह प्रायः गर्भ की तरह स्थित क्यों रहता है ? सुकुमार स्त्रियों में यह अधिक कष्टदायक होता है । इसकी किस प्रकार चिकित्सा करनी चाहिये तथा वह चिकित्सा कौन सी है ? किस २ अवस्था में इसकी कौन २ सी अवचारणा प्रयुक्त होती है ? किस समय इसका भेदन करना चाहिये तथा भेदनीय द्रव्य क्या होता है ? तथा भेदन करने के बाद क्या करना चाहिये ? हे सर्वव्यापक भगवन् ! मुझे इन सब बातों का उत्तर दीजिये ॥४-१३॥

इति पृष्टः स शिष्येण प्रोवाच वदतां वरः । रक्तगुल्मस्तु नारीणां जायते येन हेतुना ॥१४॥
येन चैव कुमाराणां कन्यानां च न जायते ।
तत् सर्वमभिधास्यामि विस्तरेण निबोध मे ॥१५॥

इस प्रकार शिष्य द्वारा प्रश्न किये जाने पर ज्ञानी कश्यप ने कहा है कि जिस प्रकार से स्त्रियों को रक्तगुल्म होता है, तथा जिस कारण से यह बालकों तथा.कन्याओं को नहीं होता है—उन सबका मैं विस्तारपूर्वक वर्णन करूँगा वह तू मेरे से सुन ॥

विण्मूत्रकृमिपक्ववामकफवाताशयाः पृथक् । सप्तैते देहिनां कोष्ठे स्त्रीणां गर्भाशयोऽष्टमः ॥१६॥

सब प्राणियों के कोष्ठ में मल, मूत्र, कृमि, पक्व, आम, कफ तथा वायु के पृथक् २ सात आशय होते हैं । इनके अतिरिक्त स्त्रियों में एक आठवां गर्भाशय होता है । जिसमें रजोवहा सिराएँ रज को लाकर डालती हैं । अर्थात् उपर्युक्त