भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 796

४३६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रक्तगुल्मविनिश्चयाध्यायः ९]

मल-मूत्र के सात आशय तो सभी प्राणियों में (चाहे वह स्त्री हो या पुरुष) सामान्य रूप से होते हैं। इनके अतिरिक्त स्त्रियों में आठवां गर्भाशय होता है जो केवल स्त्रियों में ही होता है, पुरुषों में नहीं। आशय का अर्थ अधिष्ठान है। सुश्रुत शा. अ. ५ में आशयों का परिगणन निम्न प्रकार से किया गया है—आशायास्तु—वाताशयः पित्ताशयः श्लेष्माश्यो रक्ताशय आमाशयः पक्वाशयो मूत्राशयः, स्त्रीणां गर्भाशयोऽष्टम इति' । गर्भाशय की शरीर में स्थिति के विषय में वाग्भट में कहा है—'गर्भाशयोऽष्टमः स्त्रीणां पित्तपक्वाशयान्तरा' । अर्थात् पित्ताशय और पक्वाशय के बीच में गर्भाशय होता है ।।१६।।

रजोवहाः सिरा यस्मिन् रजः प्रविसृजन्त्यतः । पुष्पभूतं हि तद्वैवान्मासि मासि प्रवर्त्तते विपर्ययात्तदेवैह तत्रैव तु निचीयते ।।१७।।

वही रज पुष्प (आर्तव-Monthly discharge) के रूप में दैववश प्रत्येक मास में प्रवृत्त होता है-निकलता रहता है। तथा यदि रोग या किसी अन्य कारण से प्रवृत्त न हो सके तो वह रज वहीं गर्भाशय में ही संचित होता रहता है ।।१७।।

अनेन हेतुना स्त्रीणां रक्तगुल्मो हि जायते । तदाशयस्य चाभावात् पुरुषाणां च जायते ।।१८।।

इस उपर्युक्त कारण से स्त्रियों को रक्तगुल्म होता है। इसके विपरीत आशय (गर्भाशय) के अभाव के कारण यह रक्तगुल्म पुरुषों में नहीं होता है ।।१८।।

हीनयोन्यास्तु बालायाः कायं गच्छति शोणितम् । अथ पूर्णस्वभावायाः कायं योनि च गच्छति ।।१९।।

छोटी लड़कियों की योनि स्वल्प होने के कारण उनका सारा रक्त शरीर में चला जाता है। तथा जिस स्त्री के शारीरिक अवयव पूर्ण हो चुके हैं—उनका रक्त शरीर तथा योनि दोनों में जाता है अर्थात् कुछ रक्त जहाँ शरीर के पोषण में व्यय होता है वहां कुछ योनि में भी जाता है ।।१९।।

गर्भमङ्गे भावयति, किञ्चित् स्तन्याय कल्पते । पक्तये शोणिताद्य(दे)स्तु शेषः कायं समिन्ध्यति ।।२०।।

स्त्री के शरीर के रक्त का कुछ भाग गर्भ को पुष्ट करता है, कुछ स्तन्य (दूध) का निर्माण करता है तथा कुछ रक्त से शरीर में पाचन होता है। शेष—इन सबसे बचा हुआ रक्त शरीर में ईंधन का कार्य करता है। अर्थात् स्त्री के शरीर के रक्त के कुछ भाग के गर्भ का पोषण होता है, कुछ से उसके स्तनों में दूध का निर्माण होता है, कुछ शरीर के अन्दर पाचन का कार्य करता है तथा इन कार्यों के बाद बचा हुआ रक्त शरीर का पोषण करता है। इस संहिता के सूत्रस्थान के उपलब्ध प्रथम अध्याय में भी कहा है—मातृपुष्ट्यर्थमेकांशो द्वितीयो गर्भपुष्टये। तृतीयः स्तनपुष्ट्यर्थं नार्या गर्भस्तु पुष्यति ।।२०।।

तथैव गर्भः सूतायाः सद्यः स्तन्याय कल्पते । शेषं तु रुधिरीभूतं कायं योनिं च सर्पति ।।२१।।

इसीप्रकार गर्भ का कुछ अंश प्रसव के बाद शीघ्र ही दुग्ध का निर्माण करने लगता है। तथा शेष रक्त के रूप में शरीर तथा योनि में फैल जाता है ।।२१।।

धातुषु प्रतिपूर्णेषु शरीरे समवस्थिते । संचितं रुधिरं योनिः पुनः कालेन मुञ्चति ।।२२।।

तब धातुओं के रक्त से पूर्ण हो जाने तथा शरीर के समावस्था में स्थित होने पर संचित हुआ रक्त पुनः उचित काल में योनि को छोड़ देता है अर्थात् योनि से प्रवृत्त होने लगता है।

यदा रक्तवहा रक्तं प्रदोषात्रानुपद्यते । विमार्गाद्योनिमन्वेति(विकृति) स्तेन जायते ।।२३।। तथैव रक्तगुल्मोऽपि हेतुनाऽनेन जायते ।