भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 797

रक्तगुल्मविनिश्चयाध्यायः ९] खिलस्थानम् ४३७

जब दोषों के कारण वह रक्त रक्तवहा सिराओं में नहीं पहुंचता है तब वह विपरीत मार्ग में जाने से पुनः योनि में पहुंच जाता है जिससे विकार उत्पन्न हो जाते हैं। इसी प्रकार उपर्युक्त कारण से रक्तगुल्म भी हो जाता है॥२३॥

यदा ऋतुमती नारी प्राप्तान् वेगान् विधारयेत् ॥२४॥
ह्रिया त्रासाद्द्यवायाद्वा वर्तमानानधोगतान् । एवमादिभिरप्यन्यैरुदावृत्तः प्रकोपितः ॥२५॥
वायुः शोणितमादाय प्रतिस्रोतः प्रपद्यते । गर्भाशयमुदावृत्तस्तस्या वहति शोणितम् ॥२६॥
मारुतश्च्युतगर्भाया यदा मिथ्योपचर्यते । तस्याः स वायुरुद्धतः प्रतिघातात् सशोणितः ॥२७॥
गत्वा गर्भाशयं रुद्धः स्थिरत्वमुपपद्यते । संवृत्तं शोणितं तत्र मारुतो विषमं गतः ॥२८॥
रजोवहाः समावृत्तः संस्तम्भयति गर्भवत् ।

जब ऋतुकाल में स्त्री लज्जा, भय अथवा मैथुन के कारण शरीर के अधो भाग में प्राप्त हुए वेगों को रोकती है। उपर्युक्त अथवा उदीर्ण हुए अन्य कारणों से प्रकुपित हुआ वायु उस रक्त को लेकर स्रोतों में पहुंचता है। गर्भाशय में पहुंचने पर वह रक्त बढ़ने लगता है अथवा जिसकां सद्यः गर्भपात हुआ हो उस स्त्री का वायु मिथ्योपचार के कारण प्रकुपित हो जाता है। उसका वह प्रकुपित हुआ वायु रक्तरहित गर्भाशय में पहुंच कर रुककर वहां स्थिर हो जाता है। वह रुका हुआ रक्त तथा विषम (प्रकुपित) हुआ वायु रजोवहा सिराओं को घेरकर गर्भ के समान स्थित हो जाता है। अर्थात् जिस प्रकार गर्भ स्थित होता है उसी प्रकार यह स्थित हो जाता है। इसी संहिता के चिकित्सा स्थान (गुल्मचिकित्साध्याय) में रक्तगुल्म की सम्प्राप्ति तथा निदान निम्न रूप से दिया है—रक्तगुल्मः स्त्रिया योनौ जायते न नृणां क्वचित् । .....गर्भिण्यस्मीति मन्यते ॥ (पृ. ११२ देखें) इसी प्रकार चरक नि. अ. ३ में भी कहा है॥२४-२८॥

स गुल्मः स्पन्दतेऽभीक्ष्णं मारुतेन समीरितः ॥२९॥
दर्शयन् यानि रूपाणि तानि वक्ष्यामि सर्वशः ।

वायु के द्वारा प्रेरित हुआ वह गुल्म निरन्तर स्पन्दन करता रहता है। उसके जो स्वरूप (लक्षण) दिखाई देते हैं उन्हें मैं विस्तारपूर्वक कहूंगा॥२९॥

कासते शूल्यते चैव ज्वर्यतेऽथातिसार्यते ॥३०॥
मन्यते सर्वगात्राणि मूर्च्छितानि गुरूणि च । तमोऽस्या जायतेऽभीक्ष्णं कार्श्यं चैव निगच्छति ॥३१॥
वमत्यभीक्ष्णशो भुक्तमन्नं चास्यै न रोचते । जायन्ते चोदरे गण्डा नीलं चास्याः प्रदृश्यते ॥३२॥
स्तनान्तरं च नाभिश्च लोमराजी च मूर्च्छिता । ओष्ठौ च कृष्णौ भवतस्तथैव स्तनचूचुकौ ॥३३॥
पयोधरौ प्रसिच्येते दोहदं च निगच्छति ।
(इति ताडपत्रपुस्तके २२० तमं पत्रम्) ।

नानारसान् प्रार्थयते निष्ठीवति मुहुर्मुहुः ॥३४॥
शुभादुद्विजते गन्धाद्वर्णश्चास्याः प्रसीदति ।
गर्भिण्या यानि रूपाणि तानि संदृश्य तत्त्वतः ॥३५॥
वर्षाणि हरति व्याधिं गर्भोऽयमिति दुःखिता ।

रक्तगुल्म के लक्षण—उस स्त्री को कास, शूल, ज्वर तथा अतिसार हो जाता है। उसे अपना सम्पूर्ण शरीर मूर्च्छित तथा भारी प्रतीत होता है। उसे अपने सामने निरन्तर अन्धकार दिखाई देता है अथवा उसमें तमोगुण की वृद्धि हो जाती है, शरीर कृश हो जाता है, उसे निरन्तर वमन होता है (गर्भिणी स्त्री को प्रातः काल वमन—Morning sickness-