भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 798

४३८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रक्तगुल्मविनिश्चयाध्यायः ९]

Hyperemesis grauidarum होती है, उसी के समान इसमें भी वमन होने लगती है), उसे खाया हुआ अन्न रुचिकर नहीं होता है, पेट में उसके गांठें हो जाती हैं तथा उसका शरीर नीला हो जाता है। उसके स्तनों का मध्यभाग, नाभि तथा लोमराजि मूर्च्छित सी दिखाई देती है। उसके होंठ तथा स्तनों के चूचक (Nipplies) काले पड़ जाते हैं, स्तनों से दूध बहने लगता है तथा उसे दोहद (विशेष प्रकार की इच्छाएँ जैसी गर्भावस्था में गर्भिणी को होती हैं) उत्पन्न होने लगती हैं, वह नानाप्रकार के अम्ल आदि रसों की इच्छा करती है, बार २ थूकती है, अच्छी गन्ध को वह पसन्द नहीं करती है, उसका वर्ण निखर आता है (निर्मल हो जाता है)-इत्यादि गर्भिणी के जो लक्षण होते हैं उन्हें देखकर इस व्याधि को अनेक वर्षों तक गर्भ समझ कर लोग दुःखी होते हैं। इसी संहिता के 'गुल्मचिकित्साध्याय' में इसके निम्न लक्षण दिये हैं—'स्तनमण्डलकृष्णत्वं ...... प्रचक्षते' (मूल पृ. ११३ देखें) चरक नि. अ. ३ में भी रक्तगुल्म में होने वाले गर्भ के लक्षणों को कहा है तथा सुश्रुत शा. अ. ३ में गर्भिणी के उन लक्षणों को कहा है जो कि रक्तगुल्म में होते हैं॥३०-३५॥

केनचित्त्वथ कालेन निर्भेदं यदि गच्छति ।। ३६ ।।

यदि किसी कारण से उस गुल्म का भेदन हो जाता है तो लोग उसे गुल्म से मुक्त हुई समझते हैं। अर्थात् यदि गुल्म किसी कारण से पककर फटजाये तो उसका स्राव बह जाता है जिससे लोग यह समझने लगते हैं कि उसका गुल्म नष्ट हो गया है। साधारणतया गुल्म पकता नहीं है इसीलिये फटता भी नहीं है। विद्रधि (Abscess) पककर फट जाती है। गुल्म तथा विद्रधि का भेद ही यह है कि गुल्म पकता नहीं है तथा विद्रधि पक जाती है ॥३६॥

ततो गुल्मप्रमुक्ता सा ज्ञातिमध्ये प्रभाषते । गर्भिण्यहं चिरं भूत्वा प्रच्युते गर्भशोणिते ।। ३७ ।।

जब वह स्त्री इसप्रकार चिरकाल तक गर्भिणी (गर्भिणी के लक्षणों से युक्त होने के कारण अपने आप को गर्भिणी समझने वाली) रहती है और उसके बाद गर्भस्थित शोणित (रक्तगुल्म का रक्त) निकल जाता है तब गर्भ के लक्षण दिखाई नहीं देते हैं। उस समय उसे बड़ा भारी सन्देह होने लगता है ॥३७॥

गर्भरूपं न पश्यामि तत्र मे संशयो महान् । तामिदं प्रतिभाषन्ते सर्वग्रामकुतूहलाम् ।। ३८ ।।
दिव्यो गर्भो व्यतिक्रान्तो नैगमेषेण ते हृतः । इत्येनामबुधाः प्राहुर्हृतं सर्वमशोभनम् ।। ३९ ।।

इस आश्चर्यजनक बात को देखकर अज्ञानी लोग उसे कहते हैं कि तेरे जो दिव्य गर्भ उत्पन्न हुआ था—नैगमेष ने उसका हरण करलिया है। जितनी अशुभ बातें थी उन सबका हरण हो गया है। तथा जो कुशल एवं ज्ञानी लोग हैं वे उसे परिप्लुत कहते हैं ॥३८-३९॥

परिप्लुत इति प्राहुः कुशला ये मनीषिणः । गुल्मश्चय इति प्रोक्तो रक्तं रुधिरमुच्यते ।। ४० ।।
रक्तस्य संचयस्तेन रक्तगुल्म इति स्मृतः । गर्भक्वच्चेष्टते नायं किन्तु सादृश्यदर्शनात् ।। ४१ ।।

गुल्म-चय या इकट्ठे होने को कहते हैं तथा रक्त का अर्थ रुधिर है। इसप्रकार रक्त का संचय होने से इसे रक्तगुल्म कहते हैं। यह गर्भ की तरह चेष्टा अवश्य करता है परन्तु केवल सादृश्य के कारण यह वास्तव में गर्भ नहीं होता है। चरक चि. अ. ३ में गर्भ से इसका निम्न भेद दिया है—"केवलश्चास्यागुल्मः पिण्डित एव स्पन्दते, तामगर्भा गर्भिणीमित्याहुर्मूढाः।" अर्थात् यदि रक्तगुल्म है तो वह सारा का सारा पिण्डाकृति गुल्म ही स्पन्दन करता है अर्थात् यह गर्भ की तरह ही स्पन्दन तो अवश्य करता है परन्तु यदि सम्यक् प्रकार से परीक्षा की जाये तो ज्ञात होगा कि यह केवल एक पिण्डाकृति वस्तु ही है। गर्भ के समान उसके अङ्गों का हम पृथक् २ स्पर्श या अनुभव नहीं कर सकते हैं। इसीलिये चरक चि. अ. ५ में बिलकुल स्पष्ट कहा है—यः स्पन्दते पिण्डित एव नाङ्गैश्चिरात्सशूलः सभगर्भलिङ्गः। अर्थात् गुल्म