भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 799

रक्तगुल्मविनिश्चयाध्यायः ९] खिलस्थानम् ४३९

में स्पन्दन देर से भी होते हैं जब कि गर्भ के स्पन्दन तृतीय मास में होने लगते हैं तथा माता को चौथे-पांचवें मास में अनुभव होने लगते हैं ॥४०-४१॥

गर्भोऽयमिति मन्वाना मनसा तद्विभाविनी । नारी विचेष्टते तास्ता गर्भचेष्टाः पृथग्विधाः ॥४२॥

उक्त रक्तगुल्म को गर्भ समझती हुई तथा उसी का मन में ध्यान करती हुई वह स्त्री नाना प्रकार की गर्भ की चेष्टाओं को करती है ॥४२॥

दोहदं यत् करोतीति शृणु तत्रापि कारणम् । य एव हि रसाः प्रायो धातूनां वृद्धिहेतवः ॥४३॥ तेषामेवाभिलाषः स्याद्योनिसाधर्म्यतत्त्वतः । वातपित्तान्वितं रक्तं चीयमानं विकारवत् ॥४४॥ कट्वम्ललवणादीनां रसानां गृ¹द्धिमावहेत् ।

रक्तगुल्म में दोहद का कारण—उस समय स्त्री के जो दोहद (गर्भावस्था में उत्पन्न होने वाली विशेष इच्छाएं) के लक्षण उत्पन्न होते हैं—उसका कारण भी तू मेरे से सुन-जो रस धातुओं की वृद्धि करने वाले होते हैं, उत्पत्ति धर्म की समानता के कारण प्रायः उन्हीं रसों की ही स्त्री को उस समय इच्छा होती है । उदाहरण के लिये गुल्म में एकत्रित हुए विकार युक्त रक्त में यदि वायु तथा पित्त की प्रधानता हो तो उस स्त्री को कटु, अम्ल एवं लवण रस की इच्छा उत्पन्न होती है ॥४३-४४॥

गर्भिण्यस्मीति तत्प्रीतिप्रेमसंकल्पसंभूतः ॥४५॥ प्रस्रुतो जायते नार्यास्तेन स्तन्यं प्रवर्तते ।

रक्तगुल्म में स्तनों में दुग्ध उत्पत्ति का कारण—स्त्री अपने आपको गर्भिणी समझती है । इसलिये उस (कल्पित) गर्भ के प्रति प्रीति एवं प्रेम के संकल्प के कारण नारी में स्रावों की उत्पत्ति होती है इसीलिये स्त्री के स्तनों में दुग्ध का स्राव प्रारम्भ हो जाता है । दुग्ध उत्पत्ति का कारण शिशु के प्रति माता का प्रेम ही मुख्य कारण होता है । इसीलिये सुश्रुत में कहा भी है—“स्नेहो निरन्तरस्तस्य स्रवणे हेतुरुच्यते” । अर्थात् यदि माता में प्रेम (स्नेह) अथवा ममता की भावना न हो तो स्तनों में दुग्ध उत्पन्न ही नहीं होता अथवा बहुत कम होता है ॥४५॥

सर्वा रसवहा नाड्यः समन्तान्नाभिमाश्रिताः ॥४६॥ गर्भो विवर्धमानश्च संपीडयति ताः स्त्रियाः । तद्वच्च रक्तगुल्मोऽपि पीडयन्नुपचीयते ॥४७॥ ताभिश्च पीड्यमानाभिर्न सम्यग्वर्तते रसः । आपाण्डुगण्डतादीनि लक्षणानि भवन्त्यतः ॥४८॥

रक्तगुल्म में पाण्डुता आदि का कारण—सम्पूर्ण रसवहा नाडियां चारों ओर से आकर नाभि में आश्रित होती हैं, स्त्री में वृद्धि को प्राप्त होता हुआ गर्भ उन रसवहा नाडियों का पीडन करता है । उसीप्रकार रक्तगुल्म भी रसवहा नाडियों का पीडन करता हुआ वृद्धि को प्राप्त होता रहता है—बढ़ता रहता है । उन रसवहा सिराओं का पीडन होने से शरीर में रस ठीक प्रकार से नहीं पहुंचता है । इसीलिये सारे शरीर में पाण्डुता तथा गण्डता आदि के लक्षण हो जाते हैं ॥४६-४८॥

कथं प्रकर्षते कालमिति तत्रापि मे शृणु । विवृद्धेरिह सारूप्याद्गर्भोऽयमिति निश्चिता ॥४९॥ संरक्षेतेऽभिघातेभ्यः कुक्कुट्यण्डमिवाङ्गना । तदपायकरान् हेतून्न कथंचन सेवते ॥५०॥ श्रमोपवासतीक्ष्णोष्णाक्षारादीनि च सर्वशः । स एवं याप्यमानस्तु यथाकालं प्रकर्षते ॥५१॥ व्यापत्तिहेतुमासाद्य कालेनाल्पेन वा पुनः । भेदं गच्छत्यधस्ताद्धि जलकुम्भ इव क्षतः ॥५२॥


१. गृद्धिं गर्धामभिलाषमित्यर्थः ।