भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 800

४४० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रक्तगुल्मविनिश्चयाध्यायः ९]

रक्तगुल्म की वृद्धि का कारण—समय के साथ २ वह रक्तगुल्म किस प्रकार बढ़ता जाता है। इसका भी तू मेरे से कारण सुन। वृद्धि की समानता के कारण उसे गर्भ समझकर वह स्त्री उसकी अभिघात आदि से इसप्रकार रक्षा करती है जैसे मुर्गी अभिघात आदि से अपने अण्डे की रक्षा करती है। वह उसे (रक्तगुल्म को जिसे वह गर्भ समझे हुए हैं) हानि पहुंचाने वाले कारणों, श्रम, उपवास, तीक्ष्ण, उष्ण एवं क्षारीय पदार्थों का कभी सेवन नहीं करती है। इसप्रकार रक्षा किया जाता हुआ वह (रक्तगुल्म) समय के अनुसार धीरे २ बढ़ता जाता है। तथा उपघातकर (हानि पहुंचाने वाले) कारणों के द्वारा कुछ काल के बाद नीचे से टूटे हुए जलकुम्भ (घड़े) के समान कभी २ उसका भेदन हो जाता है ॥४९-५२॥

केचिदिच्छन्ति गुल्मस्य मासादादशमात् परम्। परिपाकं फलस्येव स्वकालपरिणामतः ॥५३॥ तस्मिंश्च काले स व्याधिः स्यान्नातिदुरुपक्रमः। तत्रोपक्रममिच्छन्ति तस्य कर्तुमतो बुधाः ॥५४॥

कुछ लोग फल के समान गुल्म का अपने काल के परिणाम के अनुसार दसवें मास के बाद परिपाक मानते हैं। अर्थात् जिस प्रकार अपने समय के अनुसार फल का पाक होता है उसीप्रकार गुल्म का भी अपने काल के अनुसार दसवें मास के बाद परिपाक होता है। उससे पूर्व गुल्म का सम्यक् परिपाक नहीं हो पाता है। उस समय वह रोग (रक्तगुल्म) अधिक कष्टसाध्य नहीं होता है इसलिये विद्वान् लोग कहते हैं कि उस समय (अर्थात् दसवें मास के बाद) इस (रक्तगुल्म) की चिकित्सा करनी चाहिये। चरक चि. अ. ५ में भी कहा है—स रौधिरः स्त्रीभव एव गुल्मो मासि व्यतीते दशमे चिकित्स्यः। क्योंकि दसवें मास के बाद ही वह सुखसाध्य माना गया है। उस समय तक उसका पूर्णरूप से परिपाक हो जाता है। कहा भी है—रक्तगुल्मे पुराणत्वं सुखसाध्यस्य लक्षणम्। यह सुख साध्यता उसके परिपाक के काल के अनुसार ही कही गई है॥

अप्राप्तकालो याप्यः स्याद्गर्भद्व्यक्तिकौविदैः। नापक्वो भिद्यते व्याधिरिति मत्वा यथाभवम् ॥५५॥

रक्तगुल्म की चिकित्सा का जब तक काल उपस्थित न हो अर्थात् १० वें मास से पूर्व वह विद्वानों द्वारा गर्भ के समान याप्य माना गया है तथा पकने पर अर्थात् उसका सम्यक् परिपाक होने पर (दसवें मास के बाद) उसका भेदन हो जाता है—इत्यादि बातों को ध्यान में रखते हुए दसवें मास तक इसका यापन करना चाहिये। याप्य से अभिप्राय उस रोग या अवस्था से है जिसे चिकित्सा संभाले रखती है अर्थात् जब तक चिकित्सा होती रहती है रोगी ठीक रहता है तथा ज्यों ही चिकित्सा बन्द की जाती है रोगी की अवस्था खराब हो जाती है अथवा उसकी मृत्यु हो जाती है। रक्तगुल्म का ऊपर जो दसवें मास के बाद चिकित्सा करने का निर्देश किया गया है उसे देखकर कुछ लोग कहते हैं कि प्राचीन आचार्यों को गुल्म तथा गर्भ के भेद का ज्ञान नहीं था इसीलिये गर्भकाल (दसवां मास) व्यतीत होने पर चिकित्सा करने का विधान दिया है। परन्तु यह ठीक नहीं है। दसवें मास के बाद चिकित्सा का विधान केवल इसलिये दिया गया है कि तब वह सुख साध्य होता है—उस समय तक उसका सम्यक् परिपाक हो जाता है तथा इसी अध्याय में ५४ वें श्लोक में कहा है—'तस्मिंश्च काले सव्याधिः स्यान्नातिदुरुपक्रमः''। इसलिये यह कहना कि प्राचीन आचार्यों को इनके भेद का ज्ञान नहीं था—ठीक नहीं है। इसीलिये अगले श्लोकों में आचार्य स्वयं विस्तार से इनकी विभदक पहचान लिखते हैं ॥५५॥

विशेषं रक्तगुल्मस्य गर्भस्य च निबोध मे। अङ्गप्रत्यङ्गवान् गर्भस्तैरेव च विचेष्टते ॥५६॥ रक्तगुल्मस्तु वृत्तः स्याल्लोंष्टवच्च विचेष्टते। स्थानात् स्थानं व्रजन् गर्भो व्याविद्धं परिवर्तते ॥५७॥ नाभेरधस्ताद्गुल्मोऽयमव्याविद्धं विवर्तते। आनुपूर्व्येण गर्भश्च अह्न्यहनि वर्धते ॥५८॥ विपरीतं हि गुल्मस्तु मन्दं मन्दं विवर्धते। तां तामवस्थां गर्भस्तु मासि मासि प्रपद्यते ॥५९॥