काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंरक्तगुल्मविनिश्चयाध्यायः ९] | खिलस्थानम् | ४४१
गर्भिणी नानिमित्तं च ज्वर्यते दह्यतेऽपि वा।
गुल्मिनी ह्यनिमित्तं तु ज्वर्यते दह्यतेऽपि वा।।६०।।
अब तू मेरे से रक्तगुल्म तथा गर्भ का भेद (Differential diagnosis) सुन-गर्भ तथा रक्तगुल्म में भेद-१. गर्भ अङ्गप्रत्यङ्गों से युक्त हुआ उन्हीं के द्वारा चेष्टा करता है तथा रक्तगुल्म एक गोल ढेले या मांस की लोथ के समान चेष्टा करता है। अर्थात् गर्भ के तीसरे या चौथे मास में हाथ-पैर आदि की पिण्डिकायें प्रकट हो जाती हैं अतः यदि उसके बाद के महीनों में अर्थात् चतुर्थ या पंचम आदि मासों में हम माता के पेट की स्पर्श आदि के द्वारा परीक्षा करें तो हमें गर्भ के हाथ-पैर आदि की पिण्डिकाओं तथा समयानुसार अन्य भी अङ्गप्रत्यङ्गों का अनुभव हो सकता है। जब कि रक्तगुल्म में भी गुल्म के इधर-उधर हिलने से चेष्टाएं तो अवश्य ही होती हैं परन्तु उसमें हाथ-पैर आदि के पृथक् अनुभव नहीं होते हैं अपितु अङ्ग-प्रत्यङ्गों से रहित केवल एक मांस के लोथड़े मात्र का ही अनुभव होता है। इसीलिये चरक चि. अ. ५ में कहा है—'यः स्पन्दते पिण्डित एव नाङ्गैः'। इसी प्रकार चरक नि. अ. ३ में भी कहा है। २. गर्भ एक स्थान से दूसरे स्थान पर गति करता हुआ व्याविद्ध दिखाई देता है। जब कि गुल्म नाभि के नीचे अव्याविद्ध होकर स्थित होता है। ३. गर्भ प्रतिदिन क्रमशः वृद्धि को प्राप्त होता है। इसके विपरीत गुल्म धीरे-धीरे बढ़ता है। ४. गर्भ प्रत्येक मास में अपनी भिन्न २ अवस्था को प्राप्त करता है अर्थात् प्रत्येक मास में गर्भ की अवस्था थोड़ी बहुत अवश्य बदलती रहती है तथा गर्भिणी को बिना किसी कारण के ज्वर तथा दाह नहीं होता है परन्तु गुल्मिनी (जिस स्त्री को रक्तगुल्म हो) को बिना किसी कारण के ही ज्वर तथा दाह हो जाता है।।५६-६०।।
अस्मिन् विशेषेऽपि सति संदेहो जायते महान्। नानागर्भविकाराणां सङ्कराद्भिषजे मतः।।६१।।
इन सब उपर्युक्त भेदों के होने पर भी अनेक गर्भसम्बन्धी विकारों के मिल जाने से चिकित्सक को बड़ा भारी सन्देह हो जाता है। अर्थात् यद्यपि रक्तगुल्म तथा गर्भ की उपरिलिखित अनेक विभेदक पहिचान हैं तथापि कई बार गर्भ के अनेक लक्षणों के मिल जाने से रक्तगुल्म तथा गर्भ में भेद करना अत्यन्त कठिन हो जाता है।।६१।।
संभूय सह संमन्त्र्य भिषग्भिः शास्त्रकोविदैः।
काले चिकित्सां कुर्वीत यथा वक्ष्याम्यतः परम्।।६२।।
अल्पान्तरावुभावेतौ गर्भो गुल्मश्च रक्तजः। तद्यथावद्विदित्वाऽऽदौ क्रियां कुर्याद्भिषग्वरः।।६३।।
इसलिये'एकत्रित होकर तथा शास्त्रों के पारंगत वैद्यों के साथ परस्पर सलाह (Consultation) करके उचित काल में (दसवें मास के बाद) रक्तगुल्म की चिकित्सा करनी चाहिये। जैसा कि मैं आगे वर्णन करूँगा। क्योंकि गर्भ तथा रक्तगुल्म में बहुत कम भेद होता है इसलिये इस बात को पहले अच्छी प्रकार जानकर चिकित्सक को चिकित्सा करनी चाहिये। अर्थात् यदि गर्भ के लक्षणों के कारण ठीक प्रकार से निदान न हो रहा हो तो अन्य भी चिकित्सकों से सलाह की जा सकती है। क्योंकि संभव है कि कोई बात अकेले व्यक्ति को समझ न पड़ती हो वह अन्य चिकित्सकों की सहायता से समझ में आ सकती है। आजकल भी हम देखते हैं कि यदि एक चिकित्सक को किसी रोगी के निदान में सन्देह हो तो वह निःसंकोच दूसरे योग्य चिकित्सक को बुलाकर दिखा देता है तथा उसके विषय में अपने सन्देह को दूर कर लेता है। यदि कोई रोगी (Case) अधिक (Complicated) हो तो कई चिकित्सकों की समिति (Medical counsil) बैठकर भी विचार करती है। कई व्यक्ति मिलकर जब विचार करते हैं तब वे अन्त में अवश्य ही किसी न किसी निश्चित परिणाम पर पहुँच जाते हैं।,क्योंकि एक चिकित्सक को कोई एक बात ध्यान में आती है तो दूसरे को