काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 802, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४४२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | रक्तगुल्मविनिश्चयाध्यायः ९] |
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कोई दूसरी बात । इस प्रकार उस (Gase) के विषय में कोई भी ज्ञातव्य बात (Important point) छूटने नहीं पाता है। उसपर पूर्णरूप से (Thoroughly) विचार विनिमय किया जा सकता है ।।६२-६३।।
यो हि गुल्मे गर्भ इति गर्भे वा गुल्म इत्यपि ।
क्रियां कुर्यादयशसा एनसा चैव युज्यते ।।६४।।
अतस्तु संशये जाते कुर्यात् साधारणीः क्रियाः । नोपक्रमेदविदितं रोगं कश्चिच्चिकित्सकः ।।६५।।
जो गुल्म में गर्भ की अथवा गर्भ में गुल्म की चिकित्सा करता है वह अपकीर्ति (बदनामी) तथा पाप से युक्त होता है। इसलिये यदि गुल्म या गर्भ का परस्पर संशय हो तो साधारण चिकित्सा करनी चाहिये । चिकित्सक को किसी भी अज्ञात रोग की चिकित्सा नहीं करनी चाहिये । अर्थात् यदि चिकित्सक को गर्भ या गुल्म में परस्पर संशय हो तो उसे गर्भ या गुल्म की कोई भी विशेष चिकित्सा नहीं करनी चाहिये । अपितु ऐसी चिकित्सा करनी चाहिये जो साधारणतया दोनों में प्रयुक्त हो सके ।।६४-६५।।
अथ काले त्वसंपूर्णे संदिग्ध चे चापि दर्शने । हेतुना केनचिद्रक्तं स्रवेत्तं चाशु वारयेत् ।।६६।।
पूर्णे प्रसवकाले तु न रक्तं प्रतिवारयेत् । तत्रानुवासनं दद्याद् द्रवं स्निग्धं च भोजनम् ।।६७।।
यदि पूर्ण या उचित समय (दसवें मास) से पूर्व ही किसी कारण से रक्त आने लग जाय तथा साथ ही गर्भ और गुल्म में परस्पर संदेह भी हो तो उस निकलते हुए रक्त को रोक देना चाहिये अर्थात् उस रक्त का स्तम्भन कर देना चाहिये । तथा यदि प्रसव का समय (दस मास) पूरा हो चुका हो (उस समय यदि रक्त आता हो) तो उस रक्त का स्तम्भन नहीं करना चाहिये—उसे नहीं रोकना चाहिये । उस अवस्था में अर्थात् दसवें मास के बाद यदि रक्तस्राव हो रहा हो तो उस स्त्री को अनुवासन बस्ति तथा द्रव और स्निग्ध भोजन कराना चाहिये । अर्थात् दसवें मास से पूर्व होनेवाले रक्तस्राव को अवश्य रोक देना चाहिये क्योंकि उस अवस्था में यदि वह गर्भ है तो रक्तस्राव को न रोकने से गर्भपात (Abortion) होने का भय रहता है ।।६६-६७।।
विधिनाऽनेन गर्भश्चेत् सुखेन प्रसविष्यति । अथवा रक्तगुल्मः स्यात् सोऽप्यकृत्स्नेन भेत्स्यते ।।६८।।
एतस्मात् कारणाद्रक्तं प्रवृत्तं न निवार्यते ।
उपर्युक्त विधि (अनुवासन और स्निग्ध एवं द्रव भोजन) के द्वारा चिकित्सा करने से यदि वह गर्भ है तो सुखपूर्वक प्रसव हो जायगा । और यदि वह रक्तगुल्म है तो उसका भी पूर्णरूप से भेदन हो जायगा । इस कारण से दसवें मास के बाद प्रवृत्त हुए रक्त को रोकना नहीं चाहिये ।।६८।।
रक्तगुल्मे प्रथमो युक्त्या स्नेहोपपादनम् ।।६९।।
शस्तं बाहुसिरायाश्च वेधनं पाकवारणम् । तथा संशमनीयं च दोषशेषावकर्षणम् ।।७०।।
रक्तगुल्म में प्रारम्भ में रोगी को युक्तिपूर्वक स्नेहन कराना चाहिये । तथा गुल्म में पाक को रोकने के लिये हाथ की सिरा का वेधन करना चाहिये अर्थात् फस्त खोलनी चाहिये । तथा उसके बाद बचे हुए दोषों को निकालने के लिये संशमन चिकित्सा का प्रयोग करना चाहिये ।।६९-७०।।
कल्याणकं पञ्चगव्यं षट्पलं तिक्तमेव वा । सरुजां पाययेन्नारीं दोषवित् कर्मकोविदः ।।७१।।
तीक्ष्णैरास्थापयेदेनां युक्तितश्चानुवासयेत् । पथ्यानि भोजयेच्चैव क्षीरयूषरसादिभिः ।।७२।।
दोषों तथा चिकित्सा के कर्म को जानने वाले व्यक्ति को चाहिये कि वह उस रुग्णा स्त्री को कल्याणक, पञ्चगव्य, षट्पल अथवा तिक्तक घृत का पान कराये । तीक्ष्ण द्रव्यों के द्वारा उसे आस्थापन बस्ति देकर फिर युक्तिपूर्वक अनुवासन कराये । तथा दूध, यूष, एवं मांसरस आदि के द्वारा उसे पथ्य भोजन कराये ।।७१-७२।।