काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंरक्तगुल्मविनिश्चयाध्यायः ९] खिलस्थानम् ४४३
अन्नपानानि रूक्षाणि विदाहीनि गुरूणि च। व्यायामं मैथुनं चिन्तां गुल्मिनी तु विवर्जयेत् ।।७३।। (इति ताडपत्रपुस्तके २२१ तमं पत्रम्)।
रक्तगुल्म में अपथ्य—रक्तगुल्म की रोगिणी को चाहिये कि वह रूक्ष, विदाही एवं गुरु अन्नपान, व्यायाम, मैथुन तथा चिन्ता का त्याग करे अर्थात् इनका सेवन न करे ।।७३।।
ज्वरारुचिश्वासकासशोषकार्श्यारतिव्यथाः । शोफश्चोपद्रवा गुल्मे तांश्चिकित्सेत् स्वभेषजैः ।।७४।।
गुल्म के उपद्रव—गुल्म में ज्वर, अरुचि, श्वास, कास, शोष, कृशता, अरति (ग्लानि), पीड़ा तथा शोक आदि उपद्रव होते हैं। वैद्य को चाहिये कि अपनी २ ओषधियों के द्वारा उनकी चिकित्सा करे ।।७४।।
बिल्वश्योनाकनिर्यूहे साधितैर्जाङ्गलै रसैः । शैथिल्यकरणार्थं च रक्तगुल्मस्य भोजयेत् ।।७५।।
रक्तगुल्म में पथ्य—रक्तगुल्म के रोगी को गुल्म के शिथिल करने के लिये जांगल मांसरसों के द्वारा सिद्ध किये हुए बिल्व और श्योनाक (पाठा) के क्वाथ पिलाने चाहिये ।।७५!
यूषेण वा कुलत्थानां लावसंसारिकेण वा। चालनार्थं विरेकं च त्रिवृत्त्रिफलया पिबेत् ।।७६।।
अथवा गुल्म में गति उत्पन्न करने के लिये कुलत्थ के यूष अथवा लाव (बटेर) के द्वारा संस्कारयुक्त त्रिवृत् और त्रिफला से विरेचन देना चाहिये ।।७६।।
वायोरुपशमार्थं च फलतैलानुवासिताम् । आस्थापयेत् सकृद् द्विर्वा शूलाटोपनिवृत्तये ।।७७।।
वायु की शान्ति के लिये उसे फल तैल के द्वारा अनुवासन देकर शूल तथा आटोप (अफारे) को दूर करने के लिये एक या दो बार आस्थापन बस्ति देवे। फल तैल का प्रयोग इसी ग्रन्थ के पिछले अध्याय (बस्तिविशेषणीयाध्याय) में ८९ से ९४ श्लोकों में दिया गया है ।।७७।।
तुल्यं मधु च तैलं च ताभ्यामुष्णोदकं समम् । द्वौ कर्षौ शतपुष्पायाः कर्षार्धं सैन्धवस्य च ।।७८।। एतेनास्थापयेन्नारीं दशमूलादिकेन वा । बलं चाप्याययेत्तस्या रसैः क्षीरैश्च संस्कृतैः ।।७९।।
आस्थापन योग—मधु और तैल समान मात्रा तथा इन दोनों के समान उष्ण जल लेवे। इसमें दो कर्ष सौंफ तथा आधा कर्ष सैन्धव नमक डालकर उसके द्वारा अथवा दशमूल क्वाथ के द्वारा उसे आस्थापन बस्ति देवे। फिर संस्कारयुक्त मांसरस तथा दूध के प्रयोग द्वारा उसके बल की वृद्धि करे ।।७८-७९।।
उपक्रमेत्ततश्चूर्णैरेतैः शोधनपातनैः । हरीतकी वचा हिङ्गु सैन्धवं साम्लवेतसम् ।।८०।। यवानी यावशूकं च चूर्णमुष्णाम्बुना पिबेत् ।
इसके बाद शोधन कराने वाले तथा गुल्म को नीचे गिराने वाले निम्न चूर्णों के द्वारा उसकी चिकित्सा करे—हरड, बच, हींग, सैन्धवनमक, अम्लवेतस, अजवायन तथा यवक्षार के चूर्ण को उष्ण जल के साथ सेवन करे ।।८०।।
हरीतकीयवक्षारसौवर्चलमिति त्रयम् ।।८१।। घृतयुक्तं पिबेद्युक्त्या रक्तगुल्मस्य भेदनम् ।
रक्तगुल्म के भेदन करने के लिये हरड़, यवक्षार तथा सौवर्चल नमक—इन तीनों का युक्तिपूर्वक घृत के साथ सेवन करे ।।८१।।