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काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

रक्तगुल्मविनिश्चयाध्यायः ९] खिलस्थानम् ४४३

अन्नपानानि रूक्षाणि विदाहीनि गुरूणि च। व्यायामं मैथुनं चिन्तां गुल्मिनी तु विवर्जयेत् ।।७३।। (इति ताडपत्रपुस्तके २२१ तमं पत्रम्)।

रक्तगुल्म में अपथ्य—रक्तगुल्म की रोगिणी को चाहिये कि वह रूक्ष, विदाही एवं गुरु अन्नपान, व्यायाम, मैथुन तथा चिन्ता का त्याग करे अर्थात् इनका सेवन न करे ।।७३।।

ज्वरारुचिश्वासकासशोषकार्श्यारतिव्यथाः । शोफश्चोपद्रवा गुल्मे तांश्चिकित्सेत् स्वभेषजैः ।।७४।।

गुल्म के उपद्रव—गुल्म में ज्वर, अरुचि, श्वास, कास, शोष, कृशता, अरति (ग्लानि), पीड़ा तथा शोक आदि उपद्रव होते हैं। वैद्य को चाहिये कि अपनी २ ओषधियों के द्वारा उनकी चिकित्सा करे ।।७४।।

बिल्वश्योनाकनिर्यूहे साधितैर्जाङ्गलै रसैः । शैथिल्यकरणार्थं च रक्तगुल्मस्य भोजयेत् ।।७५।।

रक्तगुल्म में पथ्य—रक्तगुल्म के रोगी को गुल्म के शिथिल करने के लिये जांगल मांसरसों के द्वारा सिद्ध किये हुए बिल्व और श्योनाक (पाठा) के क्वाथ पिलाने चाहिये ।।७५!

यूषेण वा कुलत्थानां लावसंसारिकेण वा। चालनार्थं विरेकं च त्रिवृत्त्रिफलया पिबेत् ।।७६।।

अथवा गुल्म में गति उत्पन्न करने के लिये कुलत्थ के यूष अथवा लाव (बटेर) के द्वारा संस्कारयुक्त त्रिवृत् और त्रिफला से विरेचन देना चाहिये ।।७६।।

वायोरुपशमार्थं च फलतैलानुवासिताम् । आस्थापयेत् सकृद् द्विर्वा शूलाटोपनिवृत्तये ।।७७।।

वायु की शान्ति के लिये उसे फल तैल के द्वारा अनुवासन देकर शूल तथा आटोप (अफारे) को दूर करने के लिये एक या दो बार आस्थापन बस्ति देवे। फल तैल का प्रयोग इसी ग्रन्थ के पिछले अध्याय (बस्तिविशेषणीयाध्याय) में ८९ से ९४ श्लोकों में दिया गया है ।।७७।।

तुल्यं मधु च तैलं च ताभ्यामुष्णोदकं समम् । द्वौ कर्षौ शतपुष्पायाः कर्षार्धं सैन्धवस्य च ।।७८।। एतेनास्थापयेन्नारीं दशमूलादिकेन वा । बलं चाप्याययेत्तस्या रसैः क्षीरैश्च संस्कृतैः ।।७९।।

आस्थापन योग—मधु और तैल समान मात्रा तथा इन दोनों के समान उष्ण जल लेवे। इसमें दो कर्ष सौंफ तथा आधा कर्ष सैन्धव नमक डालकर उसके द्वारा अथवा दशमूल क्वाथ के द्वारा उसे आस्थापन बस्ति देवे। फिर संस्कारयुक्त मांसरस तथा दूध के प्रयोग द्वारा उसके बल की वृद्धि करे ।।७८-७९।।

उपक्रमेत्ततश्चूर्णैरेतैः शोधनपातनैः । हरीतकी वचा हिङ्गु सैन्धवं साम्लवेतसम् ।।८०।। यवानी यावशूकं च चूर्णमुष्णाम्बुना पिबेत् ।

इसके बाद शोधन कराने वाले तथा गुल्म को नीचे गिराने वाले निम्न चूर्णों के द्वारा उसकी चिकित्सा करे—हरड, बच, हींग, सैन्धवनमक, अम्लवेतस, अजवायन तथा यवक्षार के चूर्ण को उष्ण जल के साथ सेवन करे ।।८०।।

हरीतकीयवक्षारसौवर्चलमिति त्रयम् ।।८१।। घृतयुक्तं पिबेद्युक्त्या रक्तगुल्मस्य भेदनम् ।

रक्तगुल्म के भेदन करने के लिये हरड़, यवक्षार तथा सौवर्चल नमक—इन तीनों का युक्तिपूर्वक घृत के साथ सेवन करे ।।८१।।

४४४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रक्तगुल्मविनिश्चयाध्यायः ९]

पत्रैलापिप्पलीशुण्ठीचूर्णं वा विडसंयुतम् ।।८२।।
नागरं शुक्तिचूर्णं वा पिबेद्गोमूत्रसंप्लुतम् ।

तेजपत्र, पिप्पली तथा सोंठ के चूर्ण में विडलवण मिलाकर अथवा सोंठ या मुक्ताशुक्ति (अथवा नखी) के चूर्ण को गोमूत्र में मिलाकर सेवन करना चाहिये ।।८२।।

सूक्ष्मैलाकुञ्चिकाचव्यपिप्पलीचित्रकस्य वा ।।८३।।
कल्कं बल्वजयूषाढ्यैः पिबेन्मण्डोदकेन वा ।

छोटी इलायची, कलौंजी, चव्य, पिप्पली तथा चित्रक के कल्क को बल्वज के यूष अथवा चावलों के मण्ड के साथ सेवन करना चाहिये ।।८३।।

अपरापातनोट्दिष्टैरोषधैश्चापि भेदयेत् ।।८४।।

अथवा अपरा (Placenta) पातन के लिये प्रयुक्त होने वाली (सु. शा. अ. १० में कथित) ओषधियों के द्वारा इसका भेदन करना चाहिये ।।८४।।

अतिप्रवृत्तं रुधिरं ग्लानिं जनयते यदि । विनिहृते गुल्मदोषे सावशेषेऽपि वा भिषक् ।।८५।।
पुनरास्थापनोक्तेन तत्र कुर्याद्द्विषग्जितम् । अनुबन्धभयाच्चैव शनैस्तदनुशोधयेत् ।।८६।।

यदि गुल्म के दोष के निकल जाने पर अथवा कुछ शेष रहने पर भी अत्यन्त प्रवृत्त होता हुआ रक्त शरीर में बहुत ग्लानि उत्पन्न करे तो पुनः आस्थापनोक्त विधि से उसकी (च. चि. अ. ५ में कथित) चिकित्सा करनी चाहिये । तथा अनुबन्ध के भय से उसके बाद उसका शनैः २ शोधन करना चाहिये ।।८५-८६।।

पद्मादीनि समूलानि दग्ध्वा तद्भस्म संहरेत् । गाढयित्वा च तत्क्वाथं चूर्णैरेतैर्विपाचयेत् ।।८७।।
शुण्ठीपिप्पलिकुष्ठैश्च चव्यचित्रकदारुभिः । दर्विप्रलेपितं सिद्धमभ्यस्येत्तेन शुद्ध्यति ।।८८।।
शिलाजत्वभयारिष्टं कल्पेनाभ्यस्य मुच्यते ।

मूल सहित पद्म आदि को जलाकर उसकी भस्म बनाले तथा उसके क्वाथ को गाढ़ा करके उसमें सोंठ, पिप्पली, कुष्ठ, चव्य, चित्रक, देवदारु आदि का चूर्ण डालकर पकायें । जब वह कलछी में लिप्त होने योग्य हो जाय तब उसका प्रयोग करे । उससे रोगी का शोधन होता है । और शिलाजीत तथा अभयारिष्ट के कल्प के सेवन से भी रक्तगुल्म नष्ट होता है ।।

यच्चापि पञ्चगुल्मीये चिकित्सितमुदाहृतम् ।।८९।।
तदिहापि प्रयोक्तव्यं प्रसमीक्ष्य बलाबलम् । इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।९०।।
(इति) खिलेषु रक्तगुल्मविनिश्चयो (नाम नवमोऽध्यायः) ।।९।।


इसके अतिरिक्त पञ्चगुल्मीय अध्याय में जो चिकित्सा कही गई है—रोगी के बलाबल को देखकर उस सबका भी यहां प्रयोग करना चाहिये ।
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।।८९-९०।।
(इति) खिलेषु रक्तगुल्मविनिश्चयो (नाम नवमोऽध्यायः)

अन्तर्वलीचिकित्सिताध्यायः १०] खिलस्थानम् ४४५

अथ अन्तर्वत्नीचिकित्सिताध्यायो दशमः ।

अथातोऽन्तर्वत्नीचिकित्सितमध्यायं वक्ष्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् कश्यपः ॥२॥

अब हम अन्तर्वत्नी चिकित्सित अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। अर्थात् इस अध्याय में गर्भिणी स्त्रियों की चिकित्सा का वर्णन किया जायेगा ॥

सूक्ष्मां चिकित्सां वक्ष्यामि गर्भिणीनां विभागशः ।
तथा गर्भश्च नारी च वर्धते रक्ष्यतेऽपि च ॥३॥

अब मैं गर्भिणी स्त्रियों की सूक्ष्म चिकित्सा का विभागपूर्वक वर्णन करूंगा जिससे गर्भ और नारी (गर्भवती स्त्री) दोनों की वृद्धि होती है तथा उनकी रक्षा भी होती है ॥३॥

गर्भिणीनां ज्वरः कष्टः सर्वव्याधिषु पार्थिव ! । ज्वरोष्मणाऽभितप्तस्तु गर्भो यात्येव विक्रियाम् ॥४॥
तस्माज्ज्वरचिकित्सां तु पूर्वमेव निबोध मे ।

हे पार्थिव ! गर्भिणी स्त्रियों के सम्पूर्ण रोगों में ज्वर सबसे अधिक कष्टदायी रोग होता है। ज्वर की ऊष्मा (गर्मी) से सन्तप्त हुए गर्भ में विकृति उत्पन्न हो जाती है। इसलिये सबसे पहले तू मेरे से ज्वर की चिकित्सा सुन ॥४॥

क्षुच्छ्रमाभ्यञ्जनाद्रौक्ष्यादौष्ण्यापक्वविधारणात् ॥५॥
स्नेहस्वेदौषधानां च विभ्रमात्तेजसोऽपि च । सन्तापान्मनसश्चापि पर्वता¹नां तथैव च ॥६॥
गन्धाच्च तृणपुष्पाणां गर्भिण्या जायते ज्वरः ।

क्षुधा, श्रम, अभ्यञ्जन, रूक्षता, उष्णता, अपक्व के धारण स्नेहन, स्वेदन तथा ओषधियों और तेज के विभ्रम, मन के सन्ताप तथा पहाड़ों पर चढ़ने और तृण एवं पुष्पों की गन्ध इत्यादि से गर्भिणी स्त्री को ज्वर हो जाता है ॥५-६॥

गर्भिणीं ज्वरितां नारीमेकाहमुपवासयेत् ॥७॥
ततो दद्यादलवणां पेयां स्नेहविवर्जिताम् ।

ज्वरयुक्त गर्भिणी स्त्री को पहले एक दिन उपवास कराके फिर लवण एवं स्नेह से रहित पेया देनी चाहिये ॥७॥

तीक्ष्णानि त्वन्नपानानि स्वेदमायासमॆव च ॥८॥
वर्जयेज्ज्वरिता नारी यवागूं केवलां पिबेत् ।

गर्भिणी स्त्री को ज्वर हो जाने पर तीक्ष्ण अन्नपान, स्वेदन और आयास (परिश्रम वाले कार्य) का त्याग कर देना चाहिये। तथा केवल यवागू का सेवन करना चाहिये ॥८॥

यवाग्वा ह्रसिते दोषे यूषैरन्नानि दापयेत् ॥९॥
यूषैस्तु ह्रसिते दोषे रसं वा क्षीरमेव वा । दापयेन्मतिमान् प्राज्ञो न त्वौषधविधिर्हितः ॥१०॥
अनुबन्धे तु दोषस्य गर्भकालमपेक्ष्य च । मासाच्चतुर्थात् प्रभृति भिषग्भेषजमाचरेत् ॥११॥


¹ आरोहणादिति पूरणीयम् । किं वा 'पर्वतारोहणात्तथा' इति वा पाठः स्यात् ? ।

४४६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अन्तर्वत्नीचिकित्सिताध्यायः १०]

बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिये कि यवागू के द्वारा दोषों के कुछ कम हो जाने पर यूषों के साथ अन्न का सेवन कराये। तथा फिर यूषों के द्वारा दोषों के और कम हो जाने पर मांंसरस अथवा दूध देवे। इस अवस्था में ओषधियों का प्रयोग अच्छा नहीं है। इसके बाद भी यदि कुछ दोष का अनुबन्ध शेष रहे अर्थात् दोष बचा रह जाय तो गर्भ के समय को देखकर चतुर्थ मास से लेकर चिकित्सक ओषधि का प्रयोग कर सकता है। अर्थात् गर्भ के चतुर्थ मास के बाद ओषधि का प्रयोग किया जा सकता है। उससे पूर्व ओषधि का प्रयोग बिलकुल नहीं करना चाहिये। चतुर्थ मास से पूर्व गर्भ स्थिर नहीं होता इस लिये ओषधियों का प्रयोग नहीं कराना चाहिये। चतुर्थ मास में गर्भ स्थिर हो जाता है। गर्भ के स्थिर हो जाने के बाद फिर विशेष डर नहीं रहता है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—'चतुर्थे मासि स्थिरत्वमापद्यते गर्भः'। चरक में तो गर्भावस्था में आठवें मास से पूर्व तक ओषधि का निषेध किया गया है उसके बाद भी जो केवल वमन आदि से साध्य रोग हैं अर्थात् जिनमें वमन, विरेचन आदि देना आवश्यक है उनमें मृदु वमन-विरेचन आदि अथवा तदर्थकारी (विरेचन ओषधि के स्थान पर गुदा में फलवर्ति आदियों का रखना तदर्थकारी कहलाता है अर्थात् जो उस प्रयोजन को सिद्ध करे) ओषधियों के प्रयोग का विधान दिया गया है ॥९-११॥

शारीरं तु ज्वरं ज्ञात्वा वातपित्तकफात्मकम् । मध्यां क्रियां प्रयुञ्जीत संचिन्त्य गुरुलाघवम् ॥१२॥
उपद्रवबलं ज्ञात्वा सत्त्वं चापि समीक्ष्य तु । गर्भावस्थां तु विज्ञाय लेखनानि प्रदापयेत् ॥१३॥

यदि गर्भिणी स्त्री को वातिक, पैत्तिक अथवा श्लैष्मिक आदि शारीरिक ज्वर हो तो गुरुता एवं लघुता का विचार करके मध्य क्रिया (चिकित्सा) का प्रयोग करना चाहिये। अर्थात् उस समय ऐसी चिकित्सा होनी चाहिये जो साधारणतया तीनों दोषों के प्रकोप में व्यवहृत हो सके। तथा रोग के उपद्रव एवं रोगी के बल और गर्भावस्था को ध्यान में रखते हुए लेखन ओषधियां देनी चाहिये ॥१२-१३॥

उत्पन्नायां तु तृष्णायां नात्युष्णं प्रपिबेज्जलम् । वातश्लेष्मसमुत्थे तु ज्वरे नीरं¹ विषायते ॥१४॥
अथ पित्तकृते चापि शृतशीतं प्रशस्यते । कुप्यपाषाणनिष्पक्वं शीतं तृष्णानिबर्हणम् ॥१५॥

ज्वर में तृष्णा (प्यास) लगने पर हल्का, उष्ण (सुखोष्ण) जल पीना चाहिये। विशेषकर वातिक और श्लैष्मिक ज्वर में तो शीतल जल बिलकुल ही विष के तुल्य है। पैत्तिक ज्वर में भी गरम करके ठण्डा किया हुआ पानी ही प्रशस्त माना गया है। कूपी तथा पत्थर के बर्तन में पकाकर ठण्डा किया गया जल प्यास को बुझाता है। अर्थात् वैसे तो साधारणतया सभी प्रकार के ज्वरों में उष्ण जल ही देना चाहिये। पैत्तिक ज्वर में चाहें तो थोड़ा बहुत शीतल जल दिया जा सकता है परन्तु वातिक और श्लैष्मिक ज्वर में तो शीतल जल का बिलकुल ही निषेध किया गया है तथा पैत्तिक में भी गर्म करके ठण्डा किया हुआ जल देना चाहिये। ज्वर में साधारणतया उष्ण जल ही क्यों देना चाहिये इस विषय में चरक वि. अ. ३ में कहा है। यहां भी पित्त के प्रयोग में जो शीतल जल का विधान दिया गया है, वह गरम करके ठण्डा किया हुआ जल ही समझना चाहिये ॥१४-१५॥

ज्वरे तु तरुणे दृष्टो विधिरेष विशेषतः । भग्नवेगे तु कर्तव्यं तृष्णाप्रशमनैः शृतम् ॥१६॥
ज्वरं ज्वरं समासाद्य शीतं वा यदि वेतरम्(त्) ।

यह उपर्युक्त विधान विशेषकर तरुण ज्वरों के लिये दिया गया है। अर्थात् साधारणतया सभी प्रकार के ज्वरों में इस विधान का पालन करना चाहिये परन्तु तरुण ज्वरों में तो इसका अवश्य ही पालन करना चाहिये। अन्य ज्वरों में


१. नीरं शीतलजलमित्यर्थः स्यात्।

अन्तर्वत्नीचिकित्सिताध्यायः १०] खिलस्थानम् ४४७

इस विषय में थोड़ी बहुत ढील की जा सकती है परन्तु तरुण ज्वर में बिलकुल नहीं। ज्वर के वेग के समाप्त हो जाने पर प्रत्येक ज्वर के अनुसार तृष्णाशामक ओषधियों के द्वारा पकाया हुआ शीतल या उष्ण जल देना चाहिये ॥१६॥

शिरोरोगे तु कर्तव्यो यथावद्भेषजक्रमः । भग्नवेगे ज्वरे कृत्स्ने गुरु नैव प्रशस्यते ॥१७॥

गर्भिणी स्त्री को यदि शिरोरोग हो जाय तो यथावत् चिकित्सा करनी चाहिये। ज्वर का वेग पूर्णरूप से शान्त हो जाने पर भी गुरु भोजन नहीं देना चाहिये ॥१७॥

तरुणे तु ज्वरे नार्या अभ्यङ्गो न प्रशस्यते । गर्भे तु तरुणे दत्तो गर्भघाताय कल्पते ॥१८॥

तरुण ज्वर में गर्भवती स्त्री को अभ्यङ्ग (मालिश) नहीं देना चाहिये। गर्भावस्था में तरुण ज्वर में अभ्यङ्ग देने से गर्भ नष्ट हो जाता है ॥१८॥

गर्भिणीनां तु नारीणां नस्ततो नानुसेचयेत् । नस्यदानेन गर्भिण्याः प्राणस्तु परिहीयते ॥१९॥

नस्य के द्वारा गर्भिणी स्त्री के दोषों को नहीं निकालना चाहिये अर्थात् उसे नस्य नहीं देना चाहिये। नस्य देने से गर्भिणी स्त्री के प्राण नष्ट हो जाते हैं ॥१९॥

कुणिर्वा यदि वाऽन्यश्च जायते दुर्बलेन्द्रियः । धूमपानेन गभिण्या धूमतेजोहतो भृशम् ॥२०॥
विवर्णो जायते गर्भः पतेद्वाऽपि विशांपते ! ।

हे राजन् ! गर्भिणी के धूम्रपान करने से उत्पन्न हुई सन्तान धूम्र की तेजी से नष्ट हुई लूली (जिसके हाथ निकम्मे हों), अन्धी अथवा दुर्बल होती है। वह वर्णरहित (कान्तिहीन) होती है अथवा गर्भपात ही हो जाता है ॥२०॥

शिरोविवेके गर्भिण्याः संक्षोभात्तु भयेन वा ॥२१॥
मारुतः कुपितो देहे गर्भघाताय कल्पते । अथवा वातरोगी तु गर्भो भवति पार्थिव ! ॥२२॥

हे पार्थिव ! गर्भिणी को शिरोविरेचन देने से संक्षोभ और भय के कारण गर्भिणी के शरीर में वायु का प्रकोप होकर गर्भ नष्ट हो जाता है अथवा यदि वह उत्पन्न होता है तो उसे वातिक रोग हो जाते हैं ॥२१-२२॥

स्वेदेन तरुणे गर्भे पित्तं प्रकुपितं भृशम् । च्यावयेदाशु गर्भं तु तस्मात् स्वेदं विवर्जयेत् ॥२३॥
स्वेदः स्थिरे तु विहितो गर्भवैवर्ण्यकारकः ।

तरुण गर्भ में स्वेद देने से पित्त प्रकुपित हो जाता है। वह प्रकुपित हुआ पित्त शीघ्र ही गर्भ को गिरा देता है। इसलिये गर्भावस्था में स्वेद नहीं देना चाहिये। तथा गर्भ के स्थिर होने पर दिया गया स्वेद गर्भ को विवर्ण (कान्तिहीन) कर देता है ॥२३॥

वमनं तरुणे गर्भे स्वैर्गुणैर्गर्भघातकम् ॥२४॥

तरुण गर्भ में दिया गया वमन अपने गुणों के द्वारा गर्भ को नष्ट कर देता है ॥२४॥

नाभिप्रपीडनोत्कारात् संक्षोभाच्च विशेषतः । गर्भिण्यास्तरुणे गर्भे स्रंसनं न प्रशस्यते ॥२५॥
गुरुत्वादुष्णतीक्ष्णत्वाद्वहनाच्चास्य घातकम् ।

विशेष रूप से नाभि का पीडन करने अथवा संक्षोभ के कारण गर्भिणी को तरुण गर्भावस्था में दिया गया विरेचन प्रशस्त नहीं माना गया है। यह गुरु, उष्ण, तीक्ष्ण तथा वाहन गुण के कारण गर्भ को नष्ट कर देता है ॥२५॥

५१ का.सं.

४४८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | अन्तर्वत्नीचिकित्सिताध्यायः १०]

आस्थापनं तु तरुणे गर्भे नार्या न शस्यते ।।२६।।
अनुवासनं च मतिमानिति शास्त्रविनिश्चयः ।

तरुण गर्भ में गर्भवती स्त्री को आस्थापन तथा अनुवासन दोनों प्रशस्त नहीं माने गये हैं—ऐसा शास्त्रों का कहना है ।।२६।।

आस्थापनं सानुवासं करोति स्वेन तेजसा ।।२७।।
हीनाङ्गं स्राविणं वाऽपि गर्भमित्येष निश्चयः ।

तरुण गर्भावस्था में आस्थापन तथा अनुवासन देने से उनके तेज के कारण गर्भ निश्चय से हीन अङ्गों वाला हो जाता है तथा गर्भस्राव हो जाता है । योगरत्नाकर में गर्भपात तथा गर्भस्राव का भेद कहते हुए कहा है कि चतुर्थमास तक गर्भस्राव (Abortion) होता है । तब तक गर्भ स्थिर नहीं होता है । उसके बाद पांचवें अथवा छठे मास में गर्भपात (Miscarriage) होता है ।।२७।।

तस्मादेतानि मतिमान् गर्भिण्या न प्रदापयेत् ।।२८।।

इसलिये बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि वह गर्भिणी को उपर्युक्त चीजों का प्रयोग न कराये ।।२८।।

इमानि दद्यात् संचिन्त्य रोगावस्थाविशेषवित् । विदारिगन्धां कलशीं तथा गन्धर्वहस्तकम् ।।२९।।
(इति ताडपत्रपुस्तके २२२ तमं पत्रम्)

मधुकं भद्रदारुं च क्वाथः शर्करया युतः । वातज्वरहरो देयो मातुलुङ्गरसाप्लुतः ।।३०।।

रोगों की भिन्न २ अवस्थाओं को जानने वाले व्यक्ति को चाहिये कि वह अच्छी प्रकार सोच-विचार कर गर्भिणी स्त्री को निम्न वस्तुओं का प्रयोग कराये—वातज्वरहर क्वाथ—विदारीगन्धा, कलशी (पृश्निपर्णी), एरण्ड, मुलहठी तथा देवदारु के क्वाथ में शर्करा और बिजौरे नींबू का रस मिलाकर देने से वह वातज्वर को नष्ट करता है ।।२९-३०।।

वर्गो विदारिगन्ध्यादिः क्वथितो नातिशीतलः । भद्रदारुसमायुक्तो वातज्वरहरो मतः ।।३१।।

विदारीगन्धा वर्ग की ओषधियों का क्वाथ बनाकर उसमें देवदारु मिलाकर ईषद् उष्ण अवस्था में देने से यह वातज्वर को नष्ट करता है ।।३१।।

एरण्डो वरुणश्चैव बृहत्यौ मधुकं तथा । वातज्वरहरः क्वाथो रास्नाकल्कसमायुतः ।।३२।।

एरण्ड, वरुण, दोनों बृहती (छोटी तथा बड़ी कटेरी), मुलहठी तथा रास्ना का कल्क—इनका क्वाथ वातज्वर को नष्ट करता है ।।३२।।

द्विपञ्चमूलनिष्क्वाथः कोष्णो वा यदि वा हिमः ।
रास्नाकल्कसमायुक्तो वातज्वरहितो मतः ।।३३।।

दोनों पञ्चमूल अर्थात् दशमूल के क्वाथ में रास्नाकल्क मिलाकर ईषदूष्ण अथवा शीतल अवस्था में वातज्वर में हितकर माना गया है ।।३३।।

जीर्णे तु भोजने पेया तन्वी लवणवर्जिता । कुष्ठं सयष्टीमधुकं रास्ना गिरिकदम्बकः ।।३४।।
शताह्वा पद्मकं चैव सारिवोशीरमुत्पलम् । मुस्ता शृगालविन्ना च करविन्दी तथा वचा ।।३५।।
पयस्या हंसपदी च तथा पुन्नागमेव च । कर्षप्रमाणान्येतानि दधिमण्डेन पेषयेत् ।।३६।।

अन्तर्वत्नीचिकित्सिताध्यायः १० ] खिलस्थानम् ४४९

तत(सम ?)स्तमेषामङ्गानां निष्क्वाथं क्वायेद्भिषक् । भागांश्च दशमूलस्य कार्या द्विपलसंमिताः ।। ३७ ।।
बलातिबलयोश्चैव कुर्यादर्धपलं भिषक् । कोरण्डमधुशिग्रूणि मदयन्ती च ते त्रयः ।। ३८ ।।
यवकोलकुलत्थानां भागाः स्युः प्रस्थसंमिताः । निष्क्वाथ्यैतानपां द्रोणे शेषमाढकसंमितम् ।। ३९ ।।
तत्र दद्यात् प्रतीवापं यत् पूर्वमुपकल्पितम् । क्षीरं तथैव गोमूत्रं वारुणीं दधि चोत्तमम् ।। ४० ।।
भिषक्कुडवमात्राणि तिलतैलेन योजयेत् । अवहत्याग्निना सिद्धमीषत्क्षोदायितं यदि ।। ४१ ।।
उष्णेनैतेन तैलेन सर्वगात्राणि म्रक्षयेत् । वातज्वरं निहन्येतन्म्रक्षणैस्त्रिभिरेव तु ।। ४२ ।।
एषोऽभ्यङ्गः स्थिरे गर्भे यथावत् संप्रशस्यते ।

भोजन के जीर्ण होने पर पतली तथा लवण रहित पेया देनी चाहिये । अभ्यङ्गार्थ तैल-कुष्ठ मधुयष्टि, रास्ना, भूकदम्ब, सौंफ, पद्माख, सारिवा (अनन्तमूल), खश, नीलकमल, नागरमोथा, शृगालविन्ना (पृश्निपर्णी), करविन्दी, बच, पयस्या (क्षीरविदारी), हंसपादी तथा नागकेसर—प्रत्येक १ कर्ष लेकर इन्हें दही के पानी के साथ पीस ले । इन सबका क्वाथ बनाये । फिर दशमूल २ पल, बला तथा अतिबला आधा २ पल, कोरण्ड, मीठा सहिजना, मदयन्ती (मेंहदी), यव, कोल तथा कुलत्थ प्रत्येक १ प्रस्थ । इनका एक द्रोण जल में क्वाथ करके एक आढक जल शेष रखे । उस क्वाथ में उपरिलिखित कुष्ठ इत्यादि वाला क्वाथ डाल दें । फिर इसमें उत्तम दूध, गोमूत्र, वारुणी (मद्य) तथा दही-प्रत्येक १ कुडव तथा तिल तैल डालकर पकाये । तथा तैलसिद्ध होने पर उसे अग्नि पर से उतार ले । इस उष्ण तैल के द्वारा सम्पूर्ण शरीर पर मालिश करे । तीन दिन मालिश करने से यह वातज्वर को नष्ट कर देता है । स्थिर हुए गर्भ में (अर्थात् चतुर्थ मास के बाद) इस अभ्यङ्ग (तैल) का यथावत् प्रयोग प्रशस्त माना गया है ।।३४-४२।।

क्षीरं क्षीरयवागूर्वा रसो वा जाङ्गलो हितः ।। ४३ ।।
जीर्णज्वरे सदा नार्या वातघ्नैरोषधैः शृतः ।

जीर्णज्वर में गर्भवती स्त्री को सदा वातनाशक ओषधियों से सिद्ध किया दूध, क्षीरयवागू अथवा जांगल मांसरस देना चाहिये ।।४३।।

अथ पित्तकृते चापि क्वथितं सारिवादिकम् ।। ४४ ।।
शर्करामधुसंयुक्तं पाययेत् कल्यमुत्थितम् ।

यदि ज्वर में पित्त का प्रकोप हो तो सारिवा आदि के क्वाथ में शर्करा और मधु मिलाकर प्रातःकाल पिलाना चाहिये ।।

पयस्या क्षीरकाकोली मृद्वीका मधुकानि च ।। ४५ ।।
शर्करामधुसंयुक्तं पानकं पैत्तिके ज्वरे ।

पैत्तिकज्वर में पयस्या, क्षीरकाकोली, मुनक्का, मुलहठी, शर्करा तथा मधु मिला हुआ पानक (शर्बत-Syrup) देना चाहिये ।।४५।।

नीलोत्पलं पयस्या च सारिवा मधुकं मधु ।। ४६ ।।
पिप्पलयो मरिचोशीरं लोध्रं लाजा सशर्करा । एतत् क्षीरसमायुक्तं खजेन मथितं पिबेत् ।। ४७ ।।
गर्भिणी ज्वरिता क्षिप्रं पित्तात्तेन प्रशाम्यति ।

ज्वर की अवस्था में गर्भिणी स्त्री को नीलकमल, पयस्या, सारिवा, मुलहठी, मधु, पिप्पली, मरिच, खस, लोध्र, लाजा (धान की खील) तथा चीनी-इन सबको दूध में मिलाकर खोंचे से खूब मथकर पीना चाहिये । इससे पित्त का प्रकोप शीघ्र ही शान्त हो जाता है ।।४६-४७।।

४५० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अन्तर्वत्नीचिकित्सिताध्यायः १०]

नलवञ्जूलमूलानि गुन्द्रामूलानि चाहरेत् ।। ४८ ।।
सहां च सहदेवां च मार्कवं पाटलिं तथा । क्षीरिणां च प्रवालानि तथा जम्ब्वाम्रयोरपि ।। ४९ ।।
उत्पलं सारिवोशीरं चन्दनं पद्मपत्रकम् । श्लक्ष्णान्येतानि पिष्टानि प्रदेहः शीतलो भवेत् ।। ५० ।।
पित्तज्वरहरो नार्यास्तर्पणो घृतसंयुतः ।

नल (नड़), बेंत तथा गुन्द्रा के मूल, सहा, सहदेवा, मकोय, पाटली (पाटला), क्षीरी वृक्षों (प्लक्ष, न्यग्रोध, वट आदि) तथा आम्र और जामुन के नवीन पत्ते, कमल, सारिवा, खस, चन्दन तथा पद्मपत्रक—इन सबको बारीक पीसकर घी मिलाकर बनाया हुआ प्रदेह (प्रलेप) शीतल होता है । यह गर्भवती स्त्रियों के पित्तज्वर को नष्ट करता है तथा उनका तर्पण करता है ।।४८-५०।।

यवपिष्टस्य कुडवो मञ्जिष्ठार्धपलं तथा ।। ५१ ।।
अम्लप्रस्थशते ^१तैलं तैलप्रस्थं विपाचयेत् । दाहज्वरहरं तैलं प्रशस्तं ज्वरनाशनम् ।। ५२ ।।

पिसे हुए जौ १ कुडव, मंजीठ आधा पल, अम्ल (कांजी) १०० प्रस्थ, तिल तैल १ प्रस्थ । तैलपाक विधि से तैल को सिद्ध करे । यह तैल दाह तथा ज्वर को नष्ट करता है । तथा यह उत्तम ज्वरनाशक माना गया है ।।५१-५२।।

अथ श्लेष्मज्वरे नारीं रास्नाक्वाथं सुशीतलम् । क्षौद्रेण सह संयुक्तं पाययेदिति कश्यपः ।। ५३ ।।

महर्षि कश्यप का मत है कि श्लेष्मज्वर में गर्भवती स्त्री को रास्ना का क्वाथ ठण्डा करके उसमें मधु मिलाकर पिलाना चाहिये ।।५३।।

भद्रदारुकनिष्क्वाथो रास्नाक्षौद्रसमायुतः । अथवा चन्दनक्वाथः पिप्पलीक्षौद्रसंयुतः ।। ५४ ।।
श्लेष्मज्वरहरः पेयो रास्नावासाऽमृताशृतः ।

श्लेष्म ज्वर में क्वाथ—श्लेष्म ज्वर को नष्ट करने के लिये रास्ना तथा मधु मिश्रित देवदारु का क्वाथ, पिप्पली एवं मधु मिश्रित चन्दन का क्वाथ तथा रास्ना, बासा और गिलोय का क्वाथ—पिलाना चाहिये ।।५४।।

श्रीपर्णिकामृतानां तु निष्क्वाथो मधुयोजितः ।। ५५ ।।
पेयः सयष्टीमधुको ज्वरे श्लैष्मिकपैत्तिके ।

श्लेष्मपैत्तिक (द्विदोषज) ज्वर में श्रीपर्णिका (गंभारी), अमृता (गिलोय) तथा मधुयष्टि के क्वाथ में मधु मिलाकर देना चाहिये ।।५५।।

महतः पञ्चमूलस्य क्वाथः श्लैष्मिकवातिके ।। ५६ ।।
रास्नाकल्कसमायुक्तः पेयः कल्पमिति स्थितिः ।

श्लेष्मवातिक (द्विदोषज) ज्वर में बृहत् पञ्चमूल (बिल्व, अग्निमन्य, श्योनाक, पाटला, गंभारी) के क्वाथ में रास्ना का कल्क मिलाकर प्रातःकाल सेवन करना चाहिये ।।५६।।

क्वाथो विदारिगन्धादेः शर्करामधुयोजितः ।। ५७ ।।
वातपित्तज्वरे पेय इति ह स्माह कश्यपः ।

वातपित्त ज्वर में विदारीगन्धा आदि के क्वाथ में शर्करा तथा मधु मिलाकर पिलाना चाहिये—ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।।५७।।


१. तिलोद्भवमित्यर्थः ।

अन्तर्वलीचिकित्सिताध्यायः १०] खिलस्थानम् ४५१

पित्तज्वरे हिमा पेया पथ्या क्षीरमथापि च ।।५८।।
जीर्णे पित्तहरैः पक्वो यूषस्तु चणकैस्तथा।

पित्त ज्वर में शीतल पेया अथवा दूध पथ्य होता है। जीर्ण पित्त ज्वर में पित्तनाशक ओषधियों द्वारा पकाया हुआ तथा चने का यूष पथ्य माना गया है ।।५८।।

श्लेष्मज्वरे सुखोष्णा तु पेया नार्याः प्रशस्यते ।।५९।।
तथैव मुद्गयूषोऽथ मौलको रस एव च । सुसात्म्यश्चेति कर्तव्यो व्याधावस्मिन् विशेषतः ।।६०।।

श्लेष्म ज्वर में गर्भवती स्त्री को सुखोष्ण (ईषदूष्ण) पेया, मूंग का यूष अथवा मूली का रस देना चाहिये। तथा इस रोग में विशेषकर ऐसी वस्तुओं का प्रयोग कराना चाहिये जो शरीर के लिये सात्म्य हों ।।५९-६०।।

संसृष्टे तु भिषक् प्राज्ञो योजयेत यथाबलम् । सन्निपातसमुत्थाने त्रिदोषशमनं हितम् ।।६१।।

संसृष्ट दोषों में (दो दोषों के मिले होने पर) विद्वान् चिकित्सक को बल के अनुसार ओषधियों का प्रयोग करना चाहिये। तथा सन्निपात (तीनों दोषों के संमिलित प्रकोप) में त्रिदोषशामक चिकित्सा करनी चाहिये ।।६१।।

अथ या मद्यपा नारी शृणु तस्याश्चिकित्सितम् ।
वातिके पैत्तिके वाऽपि श्लैष्मिके च विशांपते ! ।।६२।।
ज्वरे दद्यात् सुरां नार्या जलेनार्धेन योजिताम् । सुरया वासयित्वैनां ततः १कल्पं प्रदापयेत् ।।६३।।

हे विशांपते (राजन्) ! जो स्त्री मद्य का सेवन करती है उसकी चिकित्सा सुनो—वातिक, पैत्तिक अथवा श्लैष्मिक ज्वर में गर्भवती स्त्री को मद्य (शराब) में आधा पानी मिलाकर देना चाहिये। अथवा भिन्न २ कल्प को सुरा के द्वारा सुगन्धित करके उसे देना चाहिये ।।६२-६३।।

हरेणुमुद्गचुच्चू२नां कर्कट्याश्च रसेन तु । रसेन किञ्चिदम्लेन लघून्यन्नानि भोजयेत् ।।६४।।
लवणस्नेहहीनानि मृदूनि सुरभीणि च । आहारेण गदे भग्ने मद्यस्योपरमे कृते ।।६५।।

उपर्युक्त आहार के द्वारा रोग के नष्ट हो जाने तथा मद्य की शान्ति हो जाने पर उस स्त्री को हरेणु, मूंग तथा चुच्चू नामक शाक अथवा काकड़ाशृङ्गी के रस या कुछ अम्ल रस के साथ लवण तथा स्नेह से रहित मृदु एवं सुगन्धियुक्त भोजन कराये ।।६४-६५।।

यथोक्ता तु क्रिया पथ्या यथास्वमिति कश्यपः । अतिसारे तु गर्भिण्याः समुत्पन्ने भिषग्जितम् ।।६६।।
वातिके पैत्तिके चैव श्लैष्मिके च प्रवक्ष्यते ।

गर्भिणी स्त्री को अतिसार हो जाने पर वातिक, पैत्तिक एवं श्लैष्मिक दोष के अनुसार उस २ दोष की यथोक्त चिकित्सा करनी चाहिये ।।६६।।

विरुद्धाध्यशनाजीर्णैस्तथैवात्यशनादपि ।।६७।।
भयोद्वेगविधाताद्वा संघातात् पूरणात् क्षयात् ।
(इति ताडपत्रपुस्तके २२३ तमं पत्रम् ।)


१. कल्पं तत्तत्प्रयोगोक्तम् ।
२. चुच्चूः शाकविशेषः ।

४५२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अन्तर्वत्नीचिकित्सिताध्यायः १०]

कन्दमूलफलैरामैर्दुष्टतोयनिषेवणात् ।।६८।। रौक्ष्याद्बुभुक्षया छो(शो)काद्गुर्वाभिष्यन्दिभोजनात् । अब्यातोश्च स(मु)द्रेकादतीसारः प्रवर्तते ।।६९।।

गर्भिणी स्त्री को अतिसार का कारण—विरुद्ध भोजन, अध्यशन (पूर्वकृत आहार के बिना पचे दूसरा भोजन करना), अजीर्ण, मात्रा से अधिक भोजन, भय तथा उद्वेग के विघात, संघात (दोषों के संघात), पूरण (सन्तर्पण), एवं क्षय से तथा कच्चे कन्द मूल, फल के प्रयोग एवं दूषित जल के सेवन से, क्षुधा के कारण उत्पन्न रूक्षता, शोक और गुरु एवं अभिष्यन्दि भोजन से अब धातु (जलीय अंशयुक्त धातु—लसीका) के उद्रेग के कारण अतिसार हो जाता है ।।६७-६९।।

आमातिसारे संजाते पाचनानि प्रदापयेत् । कुटजस्य च बीजानि मुस्ता पाठा तथैव च ।।७०।। अजमोदाऽथ सरलं तथा चातिविषा शुभा । आमे श्लेष्मान्विते पेयमेतत् पिष्टं सुखाम्बुना ।।७१।।

आमातिसार में आम के श्लेष्मा से युक्त होने पर उसे कुटज के बीज (इन्द्रजौ), नागरमोथा, पाठा, अजमोद, सरल (चीड़) तथा अतिविषा (अतीस) आदि पाचक ओषधियों को पीसकर ईषदुष्ण जल के साथ देना चाहिये ।।

पाठाचन्दनभागश्च कुटजस्य फलानि च । तथा चातिविषा मुख्या पिष्टमेतद्धिताम्बुना ।।७२।। आमे पित्तान्विते पेयमिति ह स्माह कश्यपः ।

आमातिसार में आम के पित्त से युक्त होने पर पाठा, चन्दन, कुटज के फल (इन्द्रजौ) तथा अतीस-आदि ओषधियों को पीसकर हितकर जल के साथ देना चाहिये ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।।७२।।

हिङ्गुसैन्धवनागाश्च बृहत्यौ कौटजं फलम् ।।७३।। तथा पिप्पलिमूलं च मुख्या चातिविषा नृप ! । आमे वातोत्थिते पेयमेतत् पिष्टं सुखाम्बुना ।।७४।।

हे राजन् ! आमातिसार में आम के वात से युक्त होने पर हींग, सैन्धव, नागकेसर, दोनों बृहती, इन्द्रजौ, पिप्पलीमूल तथा अतीस-उन्हें पीसकर ईषदुष्ण जल के साथ देना चाहिये ।।

बृहत्यादिस्तु पातव्यः सन्निपातसमुत्थिते । पक्वसंग्रहणे पथ्यः सर्वेषामिति निश्चयः ।।७५।।

सान्निपातिक आमातिसार में बृहत्यादि गण की ओषधियों का क्वाथ पिलाना चाहिये । आमदोष के पक जाने पर पक्वातिसार का स्तम्भन करना चाहिये—ऐसा सब आचार्यों का मत है ।।७५।।

श्लैष्मिके मधुसंयुक्तस्तण्डुलोदकसंयुतः । अम्बष्ठादिगणः पेयो भिन्नवर्चोविबन्धनः ।।७६।।

पक्वातिसार में श्लेष्मा का संयोग होने पर अर्थात् श्लैष्मिक अतिसार के स्तम्भन के लिये अम्बष्ठादि गण के क्वाथ में मधु तथा तण्डुलोदक मिलाकर पिलाना चाहिये । यह अतिसार को रोकता है ।।७६।।

अथवा कौटजं पिष्ट्वा फलं क्षौद्रेण संयुतम् । धातकी मरिचं लोध्रं कट्वङ्गं देवदारु च ।।७७।। तण्डुलोदकसंयुक्तं श्लेष्मातीसारनाशनम् ।

अथवा इन्द्रजौ, धाय के फूल, मरिच, लोध्र, कट्वङ्ग (श्योनाक अरलु) तथा देवदारु को मधु के साथ पीसकर तण्डुलोदक से पीना चाहिये । यह श्लेष्मातिसार को नष्ट करता है ।।७७।।

तण्डुलोदकपिष्टं वा केसरं नलिनस्य तु ।।७८।। मधुयुक्तं पिबेन्नारी श्लेष्मातीसारनाशनम् ।

अन्तर्वलीचिकित्सिताध्यायः १० ] खिलस्थानम् ४५३

अथवा नलिन (कमल) के पुंकेसर (Pallens) को तण्डुलोदक में पीसकर उसमें मधु मिलाकर पीने से श्लेष्मातिसार नष्ट होता है ॥७८॥

न्यग्रोधादिस्तु निर्यूहः क्षौद्रेण मधुरीकृतः ।।७९।।
पित्तातिसारशमनः कुशलैः परिकीर्तितः ।

कुशल चिकित्सकों की राय में न्यग्रोधादि गण के क्वाथ को मधु के द्वारा मधुर करके पीने से पित्तातिसार नष्ट होता है ॥

कणा धातकिपुष्पं च मधुकं बिल्वपेशिका ।।८०।।
शर्करामधुसंयुक्तं पित्तवृद्धिविनाशनम् ।

अथवा पिप्पली, धाय के फूल, मुलहठी, कच्चे बिल्व का गूदा-इनके क्वाथ को शर्करा एवं मधु मिलाकर पिलाने से पित्तातिसार नष्ट होता है ॥८०॥

पद्मं समङ्गाम्रास्थि मधुकं पद्मकेसरम् ।।८१।।
लोध्रं मोचरसश्चैव शर्कराक्षौद्रसंयुतः । पित्तातिसारशमनो योग एष विधीयते ।।८२।।

कमल, मंजीठ, आम की गुठली, मुलहठी, पद्मकेसर, लोध्र तथा मोचरस को शर्करा तथा मधु के साथ देने से पित्तातिसार शान्त होता है ॥८१-८२॥

एरण्डवर्त्तं क्षुड्डाकं पञ्चमूलं शृतं हितम् । कालाकट्वङ्गसंयुक्तं वातातीसारनाशनम् ।।८३।।

एरण्ड को छोड़कर स्वल्प पञ्चमूल का क्वाथ बनाकर उसमें काला (नीलिनी अथवा सारिवा) और कट्वङ्ग (श्योनाक) मिलाकर देने से वातातिसार नष्ट होता है ॥८३॥

पद्मं समङ्गाम्रास्थि बृहती बिल्वपेशिका । श्लक्ष्णपिष्टं पिबेद्दध्ना वातातीसारनाशनम् ।।८४।।

कमल, मंजीठ, आम की गुठली, बृहती, कच्चे बिल्व का गूदा—इन सबको बारीक पीसकर दही के साथ सेवन करने से वातातिसार नष्ट होता है ॥८४॥

पिप्पल्यो धातकी पद्मं समङ्गा मोचजो रसः । मत्स्यण्डिकेन्द्रधान्यं च पिष्टमेतन्नृपोत्तम ! ।।८५।।
तण्डुलोदकसंयुक्तं सशूले वातिके हितम् ।

हे राजन् ! वातातिसार में पिप्पली, धाय के फूल, कमल, मंजीठ, मोचरस, मत्स्यण्डिका (मीजां खाण्ड), इन्द्रजौ—इनको पीसकर तण्डुलोदक के साथ देना चाहिये ॥८५॥

मुस्ताबिल्वशलाटूनि अनन्ता मधुकं तथा ।।८६।।
श्लक्ष्णपिष्टं पिबेद्दध्ना सर्पिर्गुडसमायुतम् । वातातीसारशान्त्यर्थं यथावदिति कश्यपः ।।८७।।

नागरमोथा, बिल्वशलाटु (कच्चे बिल्व), सारिवा, मुलहठी इन्हें बारीक पीसकर उसमें घृत तथा गुड मिलाकर यथावत् दही के साथ सेवन करने से वातातिसार नष्ट होता है-ऐसा महर्षि कश्यप का मत है ॥८६-८७॥

पिप्पल्यो धातकी लोध्रं समङ्गा पद्मकेसरम् । पद्मा मोचरसश्चैव दीर्घवृन्ततरोस्त्वचः ।।८८।।
केसरं चेति चूर्णानि श्लक्ष्णान्येतानि चूर्णयेत् । घृतं मत्स्यण्डिका क्षौद्रं लेहीभूतानि लेहयेत् ।।८९।।
लेहः कल्याणकस्त्वेष सर्वातीसारनाशनः ।

४५४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | अन्तर्वत्नीचिकित्सिताध्यायः १०]

कल्याणकावलेह—पिप्पली, धाय के फूल, लोध्र, मंजीठ, पद्मकेसर, पद्म, मोचरस, दीर्घवृन्त (श्योनाक) की छाल, तथा नागकेसर-इन सबको बारीक पीसकर चूर्ण करे। इनमें घी, मत्स्यण्डिका तथा मधु मिलाकर अवलेह बनाये। इसे कल्याणकावलेह कहते हैं। यह सब प्रकार के अतिसारों को नष्ट करता है ॥८८-८९॥

काश्मर्यमूलत्वक्कल्कः श्यामामूलं तथैव च ।।९०।। यवागूं दधिमण्डेन सिद्धामल्पघृतां पिबेत्। प्रवाहिकार्ता सततं तथा संपद्यते सुखी ।।९१।।

गंभारी की जड़ की छाल का कल्क तथा त्रिवृत् की मूल की दधिमण्ड (दही का पानी-Water floating on curd) के साथ यवागू बनाकर उसे थोड़े घृत के द्वारा सिद्ध करके निरन्तर पीने से प्रवाहिका (Dysentry) का रोगी स्वस्थ हो जाता है।

वक्तव्य—माधवनिदानकार अतिसार तथा प्रवाहिका में यह अन्तर माना है कि अतिसार में नाना प्रकार की द्रवधातुएं निकलती हैं और प्रवाहिका में केवल मात्र कफ ही निकलता है ॥९०-९१॥

किराततिक्तकं लोध्रं यष्टीमधुकमेव च। फाणितं तिलकल्कश्च शर्करामधुसंयुतम् ।।९२।। तण्डुलोदकमेत्येतत् प्रतिहन्ति प्रवाहिकाम्।

चिरायता, लोध्र, मुलहठी, फाणित (राव), तिलों का कल्क इन्हें पीसकर शर्करा तथा मधु मिलाकर तण्डुलोदक के साथ सेवन करने से प्रवाहिका नष्ट होती है ॥९२॥

कपित्थबिल्वमाषाणां कल्कानक्षसमान् पृथक् ।।९३।। तथा कोमलमोचाऽपि पिप्पलीशृङ्गवेरयोः। अर्धप्रस्थं भवेद्दध्नो गौडमद्यकृतः खटः (डः) ।।९४।। घृतक्षौद्रेण सहितः पीतो हन्ति चिरोत्थिताम्। वाहिकां जीर्णभक्षायाः प्राणस्य बलवर्धनः ।।९५।।

कपित्थ (कैथ), बिल्व, उड़द, कोमल शाल्लकी तथा पिप्पली और आर्द्रक—प्रत्येक का कल्क पृथक् २ एक अक्ष (तोला) तथा दही आधा प्रस्थ। इसमें गुड निर्मितद मद्य डालकर खड तैयार किया जाय। इसमें घी और मधु (असमान मात्रा में) डालकर भोजन के जीर्ण हो जाने पर सेवन करने से जीर्ण प्रवाहिका नष्ट होती है तथा प्राणों के बल की वृद्धि होती है। दही की लस्सी में कपित्थ, चांगेरी, मरिच तथा जीरा आदि डालकर पका लेने से उसे खड कहते हैं। कहा भी है—तक्रं कपित्थचांगेरीमरिचाजाजिचित्रकैः। सुपक्वः खडयूषोऽयम्॥ चरक चि. अ. १९ में भी प्रवाहिका के लिये खडयोग दिया है ॥९३-९५॥

बाणमूलस्य निष्क्वाथस्त्रपुषीबीजसंयुतः। शर्करामधुसंयुक्तो रक्तातीसारनाशनः ।।९६।।

रक्तातिसारनाशक योग—बाण (सहचर) की मूल के क्वाथ में खीरे के बीज तथा शर्करा और मधु मिलाकर सेवन करने से रक्तातिसार नष्ट होता है ॥९६॥

पद्मं समङ्गा मधुकं चन्दनं पद्मकेशरम्। पयसा मधुसंयुक्तं रक्तातीसारनाशनम् ।।९७।।

कमल, मंजीठ, मुलहठी, चन्दन, कमलकेसर, इनके चूर्ण को मधु मिलाकर दूध से सेवन करने से रक्तातिसार नष्ट होता है ॥९७॥

तिलान् कृष्णान् समङ्गा च यष्टीमधुकमुत्पलम्। पिबेदामेन पयसा रक्तातीसारनाशनम् ।।९८।।

काले तिल, मंजीठ, मधुयष्टि तथा नील कमल-इन्हें पीसकर कच्चे दूध के साथ सेवन करने से रक्तातिसार नष्ट होता है।

अन्तर्वलीचिकित्सिताध्यायः १०] खिलस्थानम् ४५५

वक्तव्य—इसमें दूध बकरी का लिया जाय तो विशेष गुणकारी होता है। चरक ने रक्तातिसार में बकरी के दूध का प्रयोग दिया है ॥९८॥

मौचो रसस्तिला लोध्रमुत्पलं कमलं तथा। पिबेत् क्षीरेण संयुक्तं रक्तातीसारनाशनम् ॥९९॥

मोचरस, तिल, लोध्र, नीलकमल, कमल-इनके चूर्ण का दूध के साथ सेवन करने से रक्तातिसार नष्ट होता है ॥९९॥

पयस्या चन्दनं लोध्रं पद्मकेंसरमेव च। पयसा मधुसंयुक्तं पिबेद्रक्तातिसारिणी ॥१००॥

रक्तातिसार के रोगिणी को पयस्या (क्षीरकाकोली), रक्तचन्दन, लोध्र तथा कमलकेसर-के चूर्ण को मधु में मिलाकर दूध के साथ सेवन करना चाहिये ॥१००॥

रक्तं निर्वा(र्वे)हते यावत् कृच्छ्रात् सगुदवेदनम्। कुप्यपाषाणतप्तेन पयसा भोजितां ततः ॥१०१॥ मधुकं घृतमण्डेन त्वथैनामनुवासयेत्।

जब तक गुदा में वेदना होती है तथा कष्टपूर्वक गुदा से रक्त आता है तब तक कुप्पी अथवा पत्थर के बर्तन में गरम किये हुए दूध के साथ मुलहठी का सेवन करना चाहिये। तदनन्तर घृतमण्ड के द्वारा उसे अनुवासन देना चाहिये। जमे हुए घी के ऊपर के स्वच्छ पतले भाग को घृतमण्ड कहते हैं ॥१०१॥

गर्भिण्या वातिकी यस्या जायते परिकी(क)र्तिका ॥१०२॥ बृहतीबिल्वमानन्तैर्यूषं कृत्वा तु भोजयेत्।

जिस गर्भवती स्त्री को वातिक परिकर्तिका (परिकर्तनवत् गुदा में पीडा) होती हो उसे बृहती, बिल्व तथा अनन्तमूल का यूष बनाकर खिलाना चाहिये ॥१०२॥

परिकी(क)र्तिकायां गर्भिण्याः पैत्तिकायामिदं हितम् ॥१०३॥ मधुकं हंसपदी च वितुन्नकमथापि च। पाययेन्मधुसंयुक्तं सुपिष्टं तण्डुलाम्बुना ॥१०४॥

गर्भवती स्त्री की पैत्तिक परिकर्तिका में मुलहठी, हंसपदी, तथा धनिये को अच्छी प्रकार पीसकर मधु में मिलाकर तण्डुलोदक के साथ पिलाना चाहिये ॥१०३-१०४॥

श्लैष्मिकायां तु कर्तव्यं यथावत्तन्निबोधत। कण्टकारी श्वदंष्ट्रा च अश्वत्थं चेति तत् समम् ॥१०५॥ संपन्नलवणं कृत्वा भोजयेत् पाययेदपि।

श्लैष्मिक परिकर्तिका में जो चिकित्सा करनी चाहिये उसे तू यथावत् सुन, कटेरी, गोखुरू तथा पीपल-इन तीनों को समान मात्रा में लेकर पीसकर तथा उसमें नमक मिलाकर भोजन तथा पान के रूप में प्रयोग करना चाहिये ॥१०५॥

अथ चेदत्र गर्भिण्याः पार्श्वस्योपग्रहो भवेत् ॥१०६॥ शालपर्णी पृश्निपर्णी बृहतीं कण्टकारिकम्। बिल्वाग्निमन्थश्योनाकं काश्मर्यमथ पाटलिम् ॥१०७॥

(इति ताडपत्रपुस्तके २२४ तमं पत्रम्)

यूषं कृत्वा तु संपन्नं भोजयेत् पाययेदपि।

४५६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अन्तर्वत्नीचिकित्सिताध्यायः १०]

यदि गर्भिणी को पार्श्वग्रह (पार्श्व का जकड़ जाना) हो जाय तो उसे शालपर्णी, पृश्निपर्णी, बृहती, कटेरी, बिल्व, अग्निमन्थ (अरणी), श्योनाक (अरलु), गंभारी तथा पाटला–इनका अच्छी प्रकार से यूष बनाकर गर्भिणी को भोजन तथा पान के रूप में प्रयोग कराये ।।१०६-१०७।।

अथ चेदत्र गर्भिण्या मुखपाको भवेदिह ।।१०८।।
हरिद्रदारुनिष्क्वाथं ग्राहयेत् कवलं ततः । ततः स्नेहेन कृत्वा तु ततः स्याच्छर्करोदकम् ।।१०९।।
लोध्रोदकेन कृत्वा तु कुर्यात्तत्प्रतिसारणम् । अनन्तां च समङ्गां च घृषी मोचरसं तथा ।।११०।।
मधुना सह(म)मश्नीयात्ततः संपद्यते सुखी ।

यदि गर्भिणी स्त्री को मुखपाक (Stomatitis) हो जाय तो पहले हल्दी तथा दारुहल्दी के क्वाथ के कवलधारण करे। तदनन्तर स्नेह के तथा फिर चीनी मिले पानी के तथा अन्त में लोध्र क्वाथ के कवलधारण करे उसके बाद लोध्र के चूर्ण का ही मुख में प्रतिसारण (Dusting) करे। अन्त में सारिवा, मंजीठ, घृषी तथा मोचरस के चूर्ण को मधु में मिलाकर सेवन (अन्तःप्रयोग) करना चाहिये। इससे वह रोगिणी स्वस्थ हो जाती है ।।१०८-११०।।

आक्षेपके समुत्पन्ने तथैवाप्यपतानके ।।१११।।
मातुलुङ्गरसः पेयो बिडसैन्धवसंयुतः । अग्निमन्थस्य निर्यूहः क्वथितो वरुणस्य वा ।।११२।।
लावो वा तैत्तिरो वाऽपि रसः स्निग्धः प्रशस्यते ।
पानार्थं वातशमनो ^१वादूलो रस एव च ।।११३।।
असंसृष्टे तु कर्तव्यो विधिरेष सुखावहः ।

यदि गर्भिणी को आक्षेपक अथवा अपतानक रोग हो जावे तो बिजौरे नींबू के रस में विडनमक (बिरिया) तथा सैन्धव नमक डालकर पिलाना चाहिये। अथवा अग्निमन्थ क्वाथ या वरुण क्वाथ देना चाहिये। अथवा बटेर या तीतर के स्निग्ध (स्नेहयुक्त) मांंसरस देने चाहिये। तथा पीने के लिये चर्मचटी का रस देना चाहिये। यदि उपर्युक्त (आक्षेपक तथा अपतानक) रोगों में किसी दोष का विशेष रूप से प्राबल्य न हो तब यह विधि लाभप्रद होती है। आक्षेपक रोग—शरीर की मांसपेशियों में अकस्मात् तथा प्रबल जो संकोच होता है उसे आक्षेपक या (Convulsions) कहते हैं। यह कई रोगों में मुख्य लक्षण होता है जिनमें मस्तिष्क विकार-युक्त हो जाता है। अपतानक रोग—जिस रोग में शरीर की मांसपेशियों में तनाव उत्पन्न हो जाता है उसे अपतानक (Tetanus) कहते हैं। सुश्रुत नि. अ. १ में कहा है—सोऽपतानकसंज्ञो यः पातयत्यन्तराऽन्तरा ।।१११-११३।।

पित्तोपसृष्टे तु 'हितो जाङ्गलो मधुरो रसः ।।११४।।
शृतो मधुरकैः सर्वैर्दाडिमाम्लसमायुतः ।

यदि उपर्युक्त रोगों (आक्षेपक तथा अपनातक) में पित्त का संयोग हो तो उसमें मधुर जांगल मांंसरस का सेवन कराना चाहिये। अथवा मधुर वर्ग की सम्पूर्ण ओषधियों का क्वाथ बनाकर उसमें अनारदाने की खटाई डालकर देना चाहिये ।।११४।।

वातश्लेष्मसमुत्थे तु व्यम्लस्तु कटुको रसः ।।११५।।
यवक्षारेण संयुक्तो जाङ्गलः सततं हितः । मृदवः पाणितापाश्च पित्तवर्ज्ये हितास्तथा ।।११६।।


१. चर्मचट्या रस इत्यर्थः ।

अन्तर्वत्नीचिकित्सिताध्यायः १०] खिलस्थानम् ४५७

यदि इनमें वायु तथा कफ का संयोग हो तो अम्ल और कटु रसों का सेवन कराना चाहिये अथवा जांगल मांसरस में यवक्षार मिलाकर देना चाहिये। तथा हाथों को गरम करके रोगी को मृदु ताप पहुँचाना लाभदायक होता है। परन्तु इसमें पित्त का प्रकोप नहीं होना चाहिये। अर्थात् यदि इसमें साथ में पित्त का भी प्रकोप सम्मिलित हो तो रोगी को ताप नहीं पहुंचाना चाहिये ॥११५-११६॥

घृतसेकोऽथवा कार्यो जीर्णे गर्भे विशेषतः ।
उष्णो वा यदि वा शीतो व्याधिमासाद्य तत्त्वतः ॥११९७॥

अथवा जीर्ण गर्भ में विशेषकर घृत का सेक करना चाहिये। यह सेक व्याधि के अनुसार उष्ण या शीत भी हो सकता है ॥११९७॥

अथ छर्दिचिकित्सां तु प्रोच्यमानां निबोधत । मातुलुङ्गरसो लाजाः कोलमज्जा तथाऽञ्जनम् ॥११९८॥
तथा दाडिमसारश्च शर्करा क्षौद्रमेव च । एष वातातिकां छर्दिं हन्ति लेहो विशेषतः ॥११९९॥

अब तू मेरे से छर्दि (वमन) की चिकित्सा को सुन, वातिक छर्दि—बिजौरे का रस, लाजा (धान की खील), कोल (बेर) की मींगी, अञ्जन (रसाञ्जन), अनारदाना, चीनी—इन सबका मधु के साथ बनाया हुआ यह अवलेह विशेषरूप से वातिक छर्दि को नष्ट करता है ॥११९८-११९९॥

दाडिमाम्लो रसः पक्वो हृद्यो लवणवर्जितः । वातच्छदिहरो राजन्! माहिषो वा सुसंस्कृतः ॥१२००॥

हे राजन् ! हृदय को अच्छा लगने वाला तथा लवणरहित खट्टेअनार का रस तथा पका हुआ मांसरस अथवा अच्छी प्रकार संस्कार किया हुआ भैंस का मांसरस खिलाने से वातिक छर्दि नष्ट होती है ॥१२००॥

शर्करामधुसंयुक्तं लाजचूर्णसमायुतम् । चातुर्जातककल्केन हृद्यं पुष्पैः सुवासितम् ॥१२०१॥
पित्तच्छर्दिप्रशमनं हितं तण्डुलधावने । हिता लाजमयी पेया सिताक्षौद्रेण संयुता ॥१२०२॥
जाङ्गलो वा रसः पथ्यः शर्करामधुरीकृतः ।

पैत्तिक छर्दि—इसमें चातुर्जातक (दालचीनी, छोटी इलायची, तेजपत्र, नागकेसर) के कल्क में लाजा का चूर्ण, शर्करा तथा मधु मिलाकर तथा उसे फूलों के द्वारा हृद्य एवं सुगन्धित करके तण्डुलोदक के साथ देना चाहिये। अथवा शर्करा एवं मधु मिश्रित लाजा (धान की खील) की पेया देनी चाहिये। अथवा जांगल पशुपक्षियों का मांसरस शर्करा के द्वारा मधुर करके पथ्य माना गया है ॥१२०१-१२०२॥

आम्रजम्बूप्रवालानि सितानि सुशृतानि तु ॥१२०३॥
क्षौद्रयुक्तानि पेयानि श्लेष्मच्छर्द्यां विशेषतः । भोजनार्थे हितं यूषं मुद्गैर्दाडिमसारि(धि)तम् ॥१२०४॥
व्यपेतस्नेहलवणं हृद्यं छर्दिविनाशनम् ।

श्लैष्मिक छर्दि—(श्लैष्मिकवमन) में विशेषकर आम एवं जामुन के शुभ्र कोमल पत्तों को पकाकर उसमें मधु मिलाकर पिलाना चाहिये। तथा भोजन में उसके लिये अनारदाने से सिद्ध किया हुआ तथा स्नेह और लवणयुक्त मूंगों का यूष हितकर है। यह हृदय को अच्छा लगता है तथा वमन को नष्ट करता है ॥१२०३-१२०४॥

सन्निपातसमुत्थायां संसृष्टान्यवचारयेत् ॥१२०५॥

सन्निपातज (त्रिदोषज) वमन में संसृष्ट योग देने चाहिये अर्थात् यदि वमन त्रिदोषजन्य हो तो उसकी चिकित्सा भी ऐसी होनी चाहिये जो तीनों दोषों को शान्त करे ॥१२०५॥

४५८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अन्तर्वत्नीचिकित्सिताध्यायः १०]

कृमिजायां तु कर्तव्यं यत् पुरस्तात् प्रवक्ष्यते। वर्षाभूमूलनिष्क्वाथं योजयेद्भद्रदारुणा ।।१२६।।
तत् पिबेन्मधुसंयुक्तं शोफं स्त्री पूर्वया सह ।

यदि गर्भिणी स्त्री को कृमिजन्य वमन हो तो निम्नलिखित चिकित्सा करनी चाहिये—पुनर्नवा की मूल तथा देवदारु के क्वाथ में मधु मिलाकर उसे पिलाना चाहिये। यदि उस स्त्री को शोफ (शोथ) हो तो केवल ओषधि अर्थात् केवल पुनर्नवा का क्वाथ देना चाहिये ।।१२६।।

पिप्पल्यङ्कोठमूलानि वाजिलिण्डरसस्तथा ।।१२७।।
दधि माहिषमित्येतत् कामलायाश्चिकित्सितम् ।

गर्भिणी स्त्री के कामला रोग (Jaundice) पिप्पली, अङ्कोठमूल, घोड़े की लीद का रस और भैंस के दूध की दही सब मिलाकर सेवन कराना चाहिये ।।१२७।।

मातुलुङ्गरसः पेयः सैन्धवेन सुयोजितः ।।१२८।।
वातिके हृदि शूले तु प्रधान इति निश्चयः ।

गर्भिणी के वातिक हृदयशूल में मुख्यरूप से बिजौरै नींबू के रस में अच्छी प्रकार नमक मिलाकर पिलाना चाहिये। यह निश्चय से इसकी प्रधान ओषधि है ।।१२८।।

प्रियङ्गवोऽथ पिप्पल्यो भद्रमुस्ता हरेणवः ।।१२९।।
क्षौद्रं बदरचूर्णं च पिबेत् पित्तार्दिते हृदि ।

पैत्तिक हृदयशूल में प्रियङ्गु, पिप्पली, भद्रमुस्ता, हरेणु, मधु तथा बेर का चूर्ण—इनका प्रयोग करना चाहिये ।।१२९।।

पिप्पली चूर्णकल्कस्तु पत्रं चोचं प्रियङ्गवः ।।१३०।।
मातुलुङ्गरसश्चैव लेहः श्लेष्मार्दिते हृदि ।

श्लैष्मिक हृदयशूल में पिप्पली का चूर्ण, तेजपत्र, चोच (दालचीनी का एक भेद जिसे बहलत्वक् कहते हैं) तथा प्रियङ्गु को बिजौरे नीम्बू के रस में मिलाकर अवलेह बनाकर देना चाहिये ।।१३०।।

कुलीरशृङ्गी शरटं भार्गी पिप्पल्य एव च ।।१३१।।
वातकासहरो लेहो मातुलुङ्गरसप्लुतः ।

कुलीरशृङ्गी (काकड़ाशृङ्गी), शरट, भार्ङ्गी तथा पिप्पली-इनके चूर्ण को बिजौरे नीम्बू के रस में मिलाकर बनाया हुआ अवलेह वातिक कास रोग को नष्ट करता है ।।१३१।।

मधूलिका तु गोक्षीरी पिप्पली शर्करा तथा ।।१३२।।
द्राक्षाक्षौद्रसमायुक्तो लेहो वै पित्तकासहा ।

मुलहठी, गोक्षीरी, पिप्पली तथा शर्करा इन सबके चूर्ण को मुनक्के तथा मधु के साथ पीसकर बनाया हुआ अवलेह पैत्तिक कास को दूर करता है ।।१३२।।

पिप्पल्यस्त्रिफला रास्ना भद्रदारु समाक्षिकम् ।।१३३।।
श्लेष्मकासहरो लेहः कुशलैः परिकीर्तितः ।

पिप्पली, त्रिफला, रास्ना तथा भद्रदारु के चूर्ण को मधु के साथ मिलाकर बनाया हुआ अवलेह चिकित्साकुशल व्यक्तियों द्वारा श्लैष्मिक कास को नष्ट करनेवाला कहा गया है ।।१३३।।

अन्तर्वलीचिकित्सिताध्यायः १०] खिलस्थानम् ४५९

मधुकं शङ्खचूर्णं च जीवलाक्षाऽथ माक्षिकम् ।। १३४ ।।
लेहः शर्करया युक्तः क्षतकासविनाशनः ।

मुलहठी, शंखपुष्पी, पीपल की लाख तथा मधु और चीनी इनका अवलेह क्षतज कास को नष्ट करता है ।। १३४ ।।

मयूरस्य तु रोमाणि श्वाविच्छल्यकयोरपि ।। १३५ ।।
पिप्पलीतण्डुलांश्चैव कोलमूलं च तत्समम् । चूर्णितं मधुसर्पिर्भ्यां लिहेच्छ्वासकफापहम् ।। १३६ ।।

मोर के रोंये (चंदोए) तथा सेही और शल्यक (छोटी सेही ) के बाल, पिप्पली, चावल तथा कोल (बेर) की जड़— समान मात्रा में लेकर चूर्ण करके उनका मधु और घृत (असमान मात्रा) के साथ अवलेह बना कर सेवन करने से श्वास तथा कफरोग नष्ट होते हैं ।। १३५-१३६ ।।

गुडो रास्नाऽथ पिप्पल्यो द्राक्षा समरिचा तथा । हरिद्रा च समङ्गानि चूर्णान्येतानि लेहयेत् ।। १३७ ।।
तैलेन श्वासकासेषु तमके चैव पूजितः ।

गुड, रास्ना, पिप्पली, द्राक्षा (मुनक्का), मरिच, हल्दी, मजीठ, इनका चूर्ण तैल के साथ मिलाकर श्वास, कास तथा तमक श्वास (Asthama) में चटाना चाहिये ।। १३७ ।।

अभयाऽऽमलकं वाऽपि शल्यकस्य त्वचा युतम् ।। १३८ ।।
अन्तर्गृहं सहोष्ट्रास्थि दधितैलेन लेहयेत् । पिप्पल्यामलकी मुस्ता तथा फाणितशर्करा ।। १३९ ।।
हरीतकीति चूर्णानि मधुतैलेन लेहयेत् । शमनं सर्वकासानां श्वासानां च प्रशस्यते ।। १४० ।।

सम्पूर्ण श्वास तथा कास रोगों में हरड़, आंवला, शल्यक (छोटी सेही) की त्वचा गृहधूम तथा ऊंट की हड्डियां इन सबको पीसकर दही तथा तेल के साथ चटाये । तथा पिप्पली, आंवला, नागरमोथा, राब, शर्करा तथा हरड़ का चूर्ण तैल और मधु में मिलाकर चटाना चाहिये ।। १३८-१४० ।।

भद्रदारुहरीतक्यौ सैन्धवं कुष्ठमेव च । घृतं च फाणितं चैव लेह ऊर्ध्वानिलापहः ।। १४१ ।।

भद्रदारु, हरड़, सैन्धव नमक, कुष्ठ, घृत तथा फाणित (राब) को मिलाकर बनाया हुआ अवलेह ऊर्ध्ववात (डकार) को नष्ट करता है ।। १४१ ।।

पिप्पली गैरिकं भार्गी हिङ्गु कर्कटकी तथा ।
समानि च भवेल्लेहो हिक्काप्रशमनः स्त्रियाः ।। १४२ ।।

पिप्पली, गेरु, भारंगी, हींग तथा काकड़ाशृङ्गी को समान मात्रा में लेकर बनाया हुआ अवलेह गर्भिणी स्त्री की हिक्का को शान्त करता है ।। १४२ ।।

(पिप्पली) पिप्पलीमूलं मुस्ता तगरमेव च । दीपनीयं भवेदेतत् क्षीरेण तु समाक्षिकम् ।। १४३ ।।

पिप्पली, पिप्पलीमूल, नागरमोथा तथा तगर के चूर्ण को मधु में मिलाकर दूध के साथ सेवन करने से अग्निदीप्त होती है अर्थात् यह (Stomachic) है ।। १४३ ।।

शतावरी दर्भमूलं मधुकं क्षीरमोरटः । पाषाणभेदकोशीरं कतकस्य फलानि च ।। १४४ ।।
एषां क्वाथरसं कल्कं क्षीरं वा पाययेद्भिषक् । मूत्रग्रहेषु सर्वेषु सिद्धमित्याह कश्यपः ।। १४५ ।।

४६०काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्अन्तर्वत्नीचिकित्सिताध्यायः १०]

सम्पूर्ण मूत्रग्रह रोगों में—शतावरी, दर्भमूल, मुलहठी, क्षीरमोरट (मूर्वाभेद-क्षीरचूरीनि या क्षीरमोरबेल), पाषाणभेद, खस तथा निर्मली बीजों का क्वाथ, कल्क अथवा इनसे सिद्ध दूध पिलाना चाहिये—ऐसा महर्षि कश्यप का मत है ॥१४५॥

वातगुल्मस्य भैषज्यं योनिगुल्मस्य चाप्यथ । यथावत् पूर्वमुद्दिष्टं समासेन चिकित्सितम् ॥१४६॥

वातगुल्म तथा योनिगुल्म (रक्तगुल्म) की चिकित्सा पहले संक्षेप में यथावत् कह दी गई है ॥१४६॥

वातिके पैत्तिके चैव श्लैष्मिके च विशेषतः ।
(इति ताडपत्रपुस्तके २२५ तमं पत्रम्।)

चतुर्थे मासि नारीणामिदं कुर्याच्चिकित्सितम् ॥१४७॥

चतुर्थ मास में गर्भिणी स्त्री के वातिक, पैत्तिक तथा श्लैष्मिक गुल्म की निम्न चिकित्सा करनी चाहिये ।

वक्तव्य—पहले भी कहा गया है कि गर्भवती स्त्रियों में चतुर्थ मास से पूर्व ओषधि नहीं देनी चाहिये क्योंकि तब तक गर्भ स्थिर नहीं होता है । चतुर्थ मास में गर्भ स्थिर हो जाता है । इसीलिये चतुर्थ मास से पूर्व इसकी चिकित्सा का विधान न देकर उसके बाद के मासों में क्रमशः चिकित्सा का क्रम दिया गया है ॥१४७॥

सर्पिर्भरन्नपानैर्वा क्षीरेणेक्षुरसेन वा । वामयेत् फलयुक्तेन यथावदिति कश्यपः ॥१४८॥

मदनफल से युक्त घृत, अन्नपान, दूध अथवा इक्षुरस के द्वारा यथावत् वमन कराना चाहिये । ऐसा महर्षि कश्यप का मत है ॥१४८॥

चतुर¹ङ्गुलसिद्धेन रसेन पयसाऽपि वा । विरेचयेत्तु मतिमान् य इच्छेत् सुखमात्मनः ॥१४९॥

अथवा स्वास्थ्य की इच्छा करनेवाले बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि अमलतास के रस से सिद्ध किये हुए मांसरस अथवा दूध के द्वारा गर्भिणी स्त्री को विरेचन कराये ॥१४९॥

पूतीकपत्रैर्भृष्टैर्वा पुष्पैर्वाऽट्यालकस्य वा । अम्लां यवागूं प्रपिबेन्नातिवेगा यथा भवेत् ॥१५०॥

अथवा पूतिकरञ्ज के तले हुए पत्तों अथवा पीली बला के फूलों से बनी हुई यवागू को अनारदाने से खट्टी करके पीनी चाहिये जिससे विरेचन के बहुत अधिक योग न हों । अर्थात् इस प्रयोग से विरेचन के थोड़े ही वेग होते हैं ॥१५०॥

एरण्ड(पत्रं)क्षीरेण वातरोगाम्विता पिबेत् । वातमूत्रनिरोधे तु शूले वाऽपि समुत्थिते ॥१५१॥

यदि गर्भिणी स्त्री को कोई वातिक रोग हो, वातिक मूत्रग्रह हो अथवा शूल हो तो दूध के साथ एरण्ड पत्र का चूर्ण दें अथवा दूध में एरण्ड के पत्तों को पकाकर दें ॥१५१॥

पञ्चमे मासि गर्भिण्या व्यक्ताम्ललवणं ततः । आस्थापनं हितं नार्या मधुरं चानुवासनम् ॥१५२॥

पांचवें मास में गर्भिणी स्त्री को अम्ल एवं लवण द्रव्ययुक्त आस्थापन तथा मधुर द्रव्यों की अनुवासन (स्नेह) बस्ति देनी चाहिये ॥१५२॥

ग्रन्थीनां पिडकानां च शोथे चैव विशाम्यते ! ।
रोहिण्यां विद्रधौ वाऽपि षष्ठमासे विशेषतः । यथास्वं भेषजं कुर्याद्दारुणं शास्त्रपारगः ॥१५३॥


१. आरग्वधरसेनेत्यर्थः ।

सप्तमे मासि नारीणां सर्वमेतत् प्रयोजयेत्।

अन्तर्वलीचिकित्सिताध्यायः १०] खिलस्थानम् ४६१

हे राजन् ! शास्त्रकुशल चिकित्सा को छठे मास में गर्भिणी स्त्री की ग्रन्थिरोग, पिडका, शोथ तथा विशेषकर रोहिणी नामक विद्रधि की अपने २ रोग के अनुसार दारुण चिकित्सा करनी चाहिये।

वक्तव्य—रोहिणी रोग गला का एक संक्रामक रोग है जिसे हम आधुनिक परिभाषा के अनुसार (Diphtheria) कह सकते हैं। जिसमें गले में एक झिल्ली बन जाती है जिससे श्वासावरोध हो जाता है। यह रोग प्रायः बच्चों को होता है॥५३॥

पीनमांसोपशमनं क्षारकर्माग्निकर्म च। भग्नास्थिश्लेषणं चैव शस्त्रकर्म तथैव च ।। १५४ ।।
सप्तमे मासि नारीणां सर्वमेतत् प्रयोजयेत्।

सातवें मास में गर्भिणी स्त्री के उभरे हुए मांस की शान्ति (व्रण के भरने के बाद यदि मांसतन्तु की अधिक वृद्धि हो जाय तो उसे (Canterize) करके अथवा नीला थोथा आदि तीक्ष्ण द्रव्यों के द्वारा स्वस्थ मांस के समान स्तर में लाना होता है), क्षारकर्म, अग्निकर्म, टूटी हुई हड्डी का जोड़ना इत्यादि सब शस्त्रकर्म किये जा सकते हैं। अर्थात् सातवें मास में उपर्युक्त सब कर्म किये जा सकते हैं ॥१५४॥

दष्टा सर्पेण पीता वा या विषं गर्भिणी नृप ! ।। १५५ ।।
वमनादिर्विषघ्नैस्तु संसृष्टः स्यादुपक्रमः।

जिस गर्भवती स्त्री को सांप ने काट लिया हो अथवा उसने कोई विषपान कर लिया हो उसकी विषनाशक वामक ओषधियों के द्वारा संसर्जन क्रम से चिकित्सा करनी चाहिये ॥१५५॥

पाठाऽमृता सोमवल्कं द्वे सहे कुटजं तथा ।। १५६ ।।
क्षीरक्वथितमेतत्तु पेयं नार्या विषापहम्।

पाठा, गिलोय, सोमवल्क (श्वेत खदिर), दोनों सहा (सहा तथा अतिसहा) तथा कुटज—इसमें दूध डालकर उसका क्षीरपाक करके क्वाथ बनाकर पिलाये। यह क्वाथ विष को नष्ट करता है ॥१५६॥

शिरीषं पाटलीमूलं तण्डुलीयकमैव च ।। १५७ ।।
सिन्दुवारितमूलं च मूलं सहचरस्य च। निष्क्वाथ्य साधयेत् पेयां प्रक्षुद्रां विषनाशिनीम् ।। १५८ ।।

शिरीष, पाटलामूल, चौलाई तथा निर्गुण्डी तथा सहचर (नीलझिण्टी काला बांसा) की जड़-इनका क्वाथ बनाकर पतली पेया बनाये-यह विष को नष्ट करती है ॥१५७-१५८॥

खडयूषाधिकं चापि युक्त्याऽन्नमशितं हितम्। द्वितीये वक्ष्यते यच्च स्थाने तच्चापि कारयेत् ।। १५९ ।।

इसमें खडयूष तथा युक्तिपूर्वक सेवन किया गया अन्न हितकर होता है। तथा इस विषय में अन्य स्थानों पर भी जो कुछ कहा जायगा उन सबों का प्रयोग करना चाहिये ॥१५९॥

गर्भिणी दुर्बलाकारा या भवत्यासिता सती। ज्वरश्चाभिद्रवत्येनां तस्या गर्भो विपद्यते ।। १६० ।।

जो गर्भवती स्त्री दुर्बल तथा एकदम सफेद (पाण्डु वर्ण वाली) हो जाती है तथा उसे ज्वर होने लगे। उसका गर्भ नष्ट हो जाता है ॥१६०॥

बहु भुङ्क्ते तु याऽत्यर्थं बहुशो बहुमूर्च्छिता। भवेत्तस्याः पतेद्गर्भो गर्भिण्यास्तु न संशयः ।। १६१ ।।

जो गर्भिणी स्त्री बहुत खाती हो, बार २ खाती हो तथा इतना खाती हो कि खाते २ बार २ मूर्च्छित हो जाती हो उस स्त्री का निःसन्देह गर्भपात हो जाता है ॥१६१॥

४६२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अन्तर्वत्नीचिकित्सिताध्यायः १०]

नेत्रे मुस्तोत्थिताकारे कर्णौ पादौ च शीतलौ। केशाश्च जटिला यस्यास्तस्या गर्भो विपद्यते ।।१६२।।

जिस गर्भिणी स्त्री के नेत्र मोथे के समान उभरे हुए हों, कान तथा पैर ठण्डे पड़े हुए हों तथा बाल जटिल (वक्र) हों उसका गर्भ नष्ट हो जाता है ॥१६२॥

उपरिष्टात्तु यो नाभ्या उभे पार्श्वे निषेवते। मध्ये वा तिष्ठते नार्याः सोऽपि गर्भो विपद्यते ।।१६३।।

जो गर्भ स्त्री के पेट में नाभि के ऊपर दोनों पार्श्वों में अथवा मध्य में स्थित होता है वह गर्भ भी नष्ट हो जाता है ॥

रुक् सन्धिमोक्षे यस्याः स्यान्मृष्टान्ने चारुचिस्तथा। निश्चेष्टस्वप्रकामायास्तस्या गर्भो विपद्यते ।।१६४।।

जिस स्त्री के सन्धिबन्धनों में पीडा होती हो तथा अन्न में अरुचि हो एवं चेष्टा से शून्य तथा अधिक होने की इच्छा वाली उस स्त्री का गर्भ नष्ट हो जाता है ॥१६४॥

सन्धिशोथोऽङ्गपाकश्च विक्रामश्च¹ गुरुर्भवेत्। यस्यास्तस्याः सुतो जातो म्रियते नात्र संशयः ।।१६५।।

जिस स्त्री के सन्धियों में शोथ हो जाये, अङ्गों में पाक हो जाये तथा पदन्यास भारी हो जाये अर्थात् वह कष्ट पूर्वक चल सके-उसका उत्पन्न हुआ पुत्र निःसन्देह मर जाता है ।।

शोचन्त्याः परिदेविन्याः प्रध्यायिन्यास्तथैव च। अङ्गुलीस्फोटशीलाया जातः पुत्रो न जीवति ।।१६६।।

जो स्त्री गर्भावस्था में बहुत शोक, दुःख तथा चिन्ता करती हो और जो अङ्गुलियों को चटकावती रहती हो—उसका उत्पन्न हुआ पुत्र जीवित नहीं रहता है ॥१६६॥

दुर्गन्धि च पयो यस्या जटिलाश्च शिरोरुहाः । मलिनाश्च ततस्तस्या जातः पुत्रो न जीवति ।।१६७।।

जिसका दूध दुर्गन्धियुक्त हो तथा जिसके बाल जटिल तथा मैले हों उसका उत्पन्न हुआ पुत्र जीवित नहीं रहता है ॥

पूतिगन्धि मुखं यस्याः शूलं चैवोपजायते। निद्रा वाऽभिद्रवत्येनां मूढगर्भा न जीवति ।।१६८।।

जिसके मुख में से दुर्गन्धि आती हो, पेट में शूल (वेदना) होती हो तथा सदा नींद आती रहती हो-वह मूढ गर्भ वाली स्त्री जीवित नहीं रहती है।

वक्तव्य—मूढ गर्भ उस गर्भ को कहते हैं जो सम्पूर्ण अवयवों से युक्त होता हुआ भी अपत्य मार्ग में अयोग्य (अस्वाभाविक) रीति से उपस्थित हो जाये। अर्थात् Mal-Presentation of foetus को मूढगर्भ कहते हैं। कहा भी है—सर्वावयवसंपूर्णो मनोबुद्ध्यादिसंयुतः। विगुणापानसंमूढो मूढगर्भोऽभिधीयते ।। गर्भावस्था में गर्भ की स्वाभाविक स्थिति का चरक शा. अ. ६ में बड़ा सुन्दर वर्णन किया है—गर्भस्तु खलु मातुः पृष्ठाभिमुख ऊर्ध्वशिराः सङ्कुच्याङ्गान्यस्ते जरायुवृतः कुक्षौ। स चोपस्थितकाले जन्मनि प्रसूतिमारुतयोगात् परिवृत्त्यावाक्शिरा निष्क्रामत्यपत्यपथेन। एषा प्रकृतिः, विकृतिः पुनरतोऽन्यथा। अर्थात् प्रसवावस्थां में गर्भ (Vertex Presentation) से गर्भाशय से बाहर आता है। अर्थात् उसका शिर नीचे होता है तथा चूतड़ ऊपर को होते हैं। तथा क्रमशः सिर, ग्रीवा, कन्धे, ऊर्ध्वशाखायें, उदर, चूतड़ तथा अधोशाखायें क्रमशः बाहर निकलती हैं। यह उसका स्वाभाविक मार्ग है। प्रसव के समय इस उपर्युक्त अवस्था के अतिरिक्त शेष सब अवस्थायें मूढगर्भ समझी जाती हैं ॥१६८॥

मयूरग्रीवसंकाशं या पश्यति हुताशनम्। शूनपादमुखी चैव मूढगर्भा न जीवति ।।१६९।।


१. पादन्यास इत्यर्थः । दुःखेन मादन्यास इति यावत् ।