भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 810, कुल 942 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 810

४५० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अन्तर्वत्नीचिकित्सिताध्यायः १०]

नलवञ्जूलमूलानि गुन्द्रामूलानि चाहरेत् ।। ४८ ।।
सहां च सहदेवां च मार्कवं पाटलिं तथा । क्षीरिणां च प्रवालानि तथा जम्ब्वाम्रयोरपि ।। ४९ ।।
उत्पलं सारिवोशीरं चन्दनं पद्मपत्रकम् । श्लक्ष्णान्येतानि पिष्टानि प्रदेहः शीतलो भवेत् ।। ५० ।।
पित्तज्वरहरो नार्यास्तर्पणो घृतसंयुतः ।

नल (नड़), बेंत तथा गुन्द्रा के मूल, सहा, सहदेवा, मकोय, पाटली (पाटला), क्षीरी वृक्षों (प्लक्ष, न्यग्रोध, वट आदि) तथा आम्र और जामुन के नवीन पत्ते, कमल, सारिवा, खस, चन्दन तथा पद्मपत्रक—इन सबको बारीक पीसकर घी मिलाकर बनाया हुआ प्रदेह (प्रलेप) शीतल होता है । यह गर्भवती स्त्रियों के पित्तज्वर को नष्ट करता है तथा उनका तर्पण करता है ।।४८-५०।।

यवपिष्टस्य कुडवो मञ्जिष्ठार्धपलं तथा ।। ५१ ।।
अम्लप्रस्थशते ^१तैलं तैलप्रस्थं विपाचयेत् । दाहज्वरहरं तैलं प्रशस्तं ज्वरनाशनम् ।। ५२ ।।

पिसे हुए जौ १ कुडव, मंजीठ आधा पल, अम्ल (कांजी) १०० प्रस्थ, तिल तैल १ प्रस्थ । तैलपाक विधि से तैल को सिद्ध करे । यह तैल दाह तथा ज्वर को नष्ट करता है । तथा यह उत्तम ज्वरनाशक माना गया है ।।५१-५२।।

अथ श्लेष्मज्वरे नारीं रास्नाक्वाथं सुशीतलम् । क्षौद्रेण सह संयुक्तं पाययेदिति कश्यपः ।। ५३ ।।

महर्षि कश्यप का मत है कि श्लेष्मज्वर में गर्भवती स्त्री को रास्ना का क्वाथ ठण्डा करके उसमें मधु मिलाकर पिलाना चाहिये ।।५३।।

भद्रदारुकनिष्क्वाथो रास्नाक्षौद्रसमायुतः । अथवा चन्दनक्वाथः पिप्पलीक्षौद्रसंयुतः ।। ५४ ।।
श्लेष्मज्वरहरः पेयो रास्नावासाऽमृताशृतः ।

श्लेष्म ज्वर में क्वाथ—श्लेष्म ज्वर को नष्ट करने के लिये रास्ना तथा मधु मिश्रित देवदारु का क्वाथ, पिप्पली एवं मधु मिश्रित चन्दन का क्वाथ तथा रास्ना, बासा और गिलोय का क्वाथ—पिलाना चाहिये ।।५४।।

श्रीपर्णिकामृतानां तु निष्क्वाथो मधुयोजितः ।। ५५ ।।
पेयः सयष्टीमधुको ज्वरे श्लैष्मिकपैत्तिके ।

श्लेष्मपैत्तिक (द्विदोषज) ज्वर में श्रीपर्णिका (गंभारी), अमृता (गिलोय) तथा मधुयष्टि के क्वाथ में मधु मिलाकर देना चाहिये ।।५५।।

महतः पञ्चमूलस्य क्वाथः श्लैष्मिकवातिके ।। ५६ ।।
रास्नाकल्कसमायुक्तः पेयः कल्पमिति स्थितिः ।

श्लेष्मवातिक (द्विदोषज) ज्वर में बृहत् पञ्चमूल (बिल्व, अग्निमन्य, श्योनाक, पाटला, गंभारी) के क्वाथ में रास्ना का कल्क मिलाकर प्रातःकाल सेवन करना चाहिये ।।५६।।

क्वाथो विदारिगन्धादेः शर्करामधुयोजितः ।। ५७ ।।
वातपित्तज्वरे पेय इति ह स्माह कश्यपः ।

वातपित्त ज्वर में विदारीगन्धा आदि के क्वाथ में शर्करा तथा मधु मिलाकर पिलाना चाहिये—ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।।५७।।


१. तिलोद्भवमित्यर्थः ।