भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 809

अन्तर्वत्नीचिकित्सिताध्यायः १० ] खिलस्थानम् ४४९

तत(सम ?)स्तमेषामङ्गानां निष्क्वाथं क्वायेद्भिषक् । भागांश्च दशमूलस्य कार्या द्विपलसंमिताः ।। ३७ ।।
बलातिबलयोश्चैव कुर्यादर्धपलं भिषक् । कोरण्डमधुशिग्रूणि मदयन्ती च ते त्रयः ।। ३८ ।।
यवकोलकुलत्थानां भागाः स्युः प्रस्थसंमिताः । निष्क्वाथ्यैतानपां द्रोणे शेषमाढकसंमितम् ।। ३९ ।।
तत्र दद्यात् प्रतीवापं यत् पूर्वमुपकल्पितम् । क्षीरं तथैव गोमूत्रं वारुणीं दधि चोत्तमम् ।। ४० ।।
भिषक्कुडवमात्राणि तिलतैलेन योजयेत् । अवहत्याग्निना सिद्धमीषत्क्षोदायितं यदि ।। ४१ ।।
उष्णेनैतेन तैलेन सर्वगात्राणि म्रक्षयेत् । वातज्वरं निहन्येतन्म्रक्षणैस्त्रिभिरेव तु ।। ४२ ।।
एषोऽभ्यङ्गः स्थिरे गर्भे यथावत् संप्रशस्यते ।

भोजन के जीर्ण होने पर पतली तथा लवण रहित पेया देनी चाहिये । अभ्यङ्गार्थ तैल-कुष्ठ मधुयष्टि, रास्ना, भूकदम्ब, सौंफ, पद्माख, सारिवा (अनन्तमूल), खश, नीलकमल, नागरमोथा, शृगालविन्ना (पृश्निपर्णी), करविन्दी, बच, पयस्या (क्षीरविदारी), हंसपादी तथा नागकेसर—प्रत्येक १ कर्ष लेकर इन्हें दही के पानी के साथ पीस ले । इन सबका क्वाथ बनाये । फिर दशमूल २ पल, बला तथा अतिबला आधा २ पल, कोरण्ड, मीठा सहिजना, मदयन्ती (मेंहदी), यव, कोल तथा कुलत्थ प्रत्येक १ प्रस्थ । इनका एक द्रोण जल में क्वाथ करके एक आढक जल शेष रखे । उस क्वाथ में उपरिलिखित कुष्ठ इत्यादि वाला क्वाथ डाल दें । फिर इसमें उत्तम दूध, गोमूत्र, वारुणी (मद्य) तथा दही-प्रत्येक १ कुडव तथा तिल तैल डालकर पकाये । तथा तैलसिद्ध होने पर उसे अग्नि पर से उतार ले । इस उष्ण तैल के द्वारा सम्पूर्ण शरीर पर मालिश करे । तीन दिन मालिश करने से यह वातज्वर को नष्ट कर देता है । स्थिर हुए गर्भ में (अर्थात् चतुर्थ मास के बाद) इस अभ्यङ्ग (तैल) का यथावत् प्रयोग प्रशस्त माना गया है ।।३४-४२।।

क्षीरं क्षीरयवागूर्वा रसो वा जाङ्गलो हितः ।। ४३ ।।
जीर्णज्वरे सदा नार्या वातघ्नैरोषधैः शृतः ।

जीर्णज्वर में गर्भवती स्त्री को सदा वातनाशक ओषधियों से सिद्ध किया दूध, क्षीरयवागू अथवा जांगल मांसरस देना चाहिये ।।४३।।

अथ पित्तकृते चापि क्वथितं सारिवादिकम् ।। ४४ ।।
शर्करामधुसंयुक्तं पाययेत् कल्यमुत्थितम् ।

यदि ज्वर में पित्त का प्रकोप हो तो सारिवा आदि के क्वाथ में शर्करा और मधु मिलाकर प्रातःकाल पिलाना चाहिये ।।

पयस्या क्षीरकाकोली मृद्वीका मधुकानि च ।। ४५ ।।
शर्करामधुसंयुक्तं पानकं पैत्तिके ज्वरे ।

पैत्तिकज्वर में पयस्या, क्षीरकाकोली, मुनक्का, मुलहठी, शर्करा तथा मधु मिला हुआ पानक (शर्बत-Syrup) देना चाहिये ।।४५।।

नीलोत्पलं पयस्या च सारिवा मधुकं मधु ।। ४६ ।।
पिप्पलयो मरिचोशीरं लोध्रं लाजा सशर्करा । एतत् क्षीरसमायुक्तं खजेन मथितं पिबेत् ।। ४७ ।।
गर्भिणी ज्वरिता क्षिप्रं पित्तात्तेन प्रशाम्यति ।

ज्वर की अवस्था में गर्भिणी स्त्री को नीलकमल, पयस्या, सारिवा, मुलहठी, मधु, पिप्पली, मरिच, खस, लोध्र, लाजा (धान की खील) तथा चीनी-इन सबको दूध में मिलाकर खोंचे से खूब मथकर पीना चाहिये । इससे पित्त का प्रकोप शीघ्र ही शान्त हो जाता है ।।४६-४७।।