काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 808, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें४४८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | अन्तर्वत्नीचिकित्सिताध्यायः १०]
आस्थापनं तु तरुणे गर्भे नार्या न शस्यते ।।२६।।
अनुवासनं च मतिमानिति शास्त्रविनिश्चयः ।
तरुण गर्भ में गर्भवती स्त्री को आस्थापन तथा अनुवासन दोनों प्रशस्त नहीं माने गये हैं—ऐसा शास्त्रों का कहना है ।।२६।।
आस्थापनं सानुवासं करोति स्वेन तेजसा ।।२७।।
हीनाङ्गं स्राविणं वाऽपि गर्भमित्येष निश्चयः ।
तरुण गर्भावस्था में आस्थापन तथा अनुवासन देने से उनके तेज के कारण गर्भ निश्चय से हीन अङ्गों वाला हो जाता है तथा गर्भस्राव हो जाता है । योगरत्नाकर में गर्भपात तथा गर्भस्राव का भेद कहते हुए कहा है कि चतुर्थमास तक गर्भस्राव (Abortion) होता है । तब तक गर्भ स्थिर नहीं होता है । उसके बाद पांचवें अथवा छठे मास में गर्भपात (Miscarriage) होता है ।।२७।।
तस्मादेतानि मतिमान् गर्भिण्या न प्रदापयेत् ।।२८।।
इसलिये बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि वह गर्भिणी को उपर्युक्त चीजों का प्रयोग न कराये ।।२८।।
इमानि दद्यात् संचिन्त्य रोगावस्थाविशेषवित् । विदारिगन्धां कलशीं तथा गन्धर्वहस्तकम् ।।२९।।
(इति ताडपत्रपुस्तके २२२ तमं पत्रम्)
मधुकं भद्रदारुं च क्वाथः शर्करया युतः । वातज्वरहरो देयो मातुलुङ्गरसाप्लुतः ।।३०।।
रोगों की भिन्न २ अवस्थाओं को जानने वाले व्यक्ति को चाहिये कि वह अच्छी प्रकार सोच-विचार कर गर्भिणी स्त्री को निम्न वस्तुओं का प्रयोग कराये—वातज्वरहर क्वाथ—विदारीगन्धा, कलशी (पृश्निपर्णी), एरण्ड, मुलहठी तथा देवदारु के क्वाथ में शर्करा और बिजौरे नींबू का रस मिलाकर देने से वह वातज्वर को नष्ट करता है ।।२९-३०।।
वर्गो विदारिगन्ध्यादिः क्वथितो नातिशीतलः । भद्रदारुसमायुक्तो वातज्वरहरो मतः ।।३१।।
विदारीगन्धा वर्ग की ओषधियों का क्वाथ बनाकर उसमें देवदारु मिलाकर ईषद् उष्ण अवस्था में देने से यह वातज्वर को नष्ट करता है ।।३१।।
एरण्डो वरुणश्चैव बृहत्यौ मधुकं तथा । वातज्वरहरः क्वाथो रास्नाकल्कसमायुतः ।।३२।।
एरण्ड, वरुण, दोनों बृहती (छोटी तथा बड़ी कटेरी), मुलहठी तथा रास्ना का कल्क—इनका क्वाथ वातज्वर को नष्ट करता है ।।३२।।
द्विपञ्चमूलनिष्क्वाथः कोष्णो वा यदि वा हिमः ।
रास्नाकल्कसमायुक्तो वातज्वरहितो मतः ।।३३।।
दोनों पञ्चमूल अर्थात् दशमूल के क्वाथ में रास्नाकल्क मिलाकर ईषदूष्ण अथवा शीतल अवस्था में वातज्वर में हितकर माना गया है ।।३३।।
जीर्णे तु भोजने पेया तन्वी लवणवर्जिता । कुष्ठं सयष्टीमधुकं रास्ना गिरिकदम्बकः ।।३४।।
शताह्वा पद्मकं चैव सारिवोशीरमुत्पलम् । मुस्ता शृगालविन्ना च करविन्दी तथा वचा ।।३५।।
पयस्या हंसपदी च तथा पुन्नागमेव च । कर्षप्रमाणान्येतानि दधिमण्डेन पेषयेत् ।।३६।।