काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअन्तर्वत्नीचिकित्सिताध्यायः १०] खिलस्थानम् ४४७
इस विषय में थोड़ी बहुत ढील की जा सकती है परन्तु तरुण ज्वर में बिलकुल नहीं। ज्वर के वेग के समाप्त हो जाने पर प्रत्येक ज्वर के अनुसार तृष्णाशामक ओषधियों के द्वारा पकाया हुआ शीतल या उष्ण जल देना चाहिये ॥१६॥
शिरोरोगे तु कर्तव्यो यथावद्भेषजक्रमः । भग्नवेगे ज्वरे कृत्स्ने गुरु नैव प्रशस्यते ॥१७॥
गर्भिणी स्त्री को यदि शिरोरोग हो जाय तो यथावत् चिकित्सा करनी चाहिये। ज्वर का वेग पूर्णरूप से शान्त हो जाने पर भी गुरु भोजन नहीं देना चाहिये ॥१७॥
तरुणे तु ज्वरे नार्या अभ्यङ्गो न प्रशस्यते । गर्भे तु तरुणे दत्तो गर्भघाताय कल्पते ॥१८॥
तरुण ज्वर में गर्भवती स्त्री को अभ्यङ्ग (मालिश) नहीं देना चाहिये। गर्भावस्था में तरुण ज्वर में अभ्यङ्ग देने से गर्भ नष्ट हो जाता है ॥१८॥
गर्भिणीनां तु नारीणां नस्ततो नानुसेचयेत् । नस्यदानेन गर्भिण्याः प्राणस्तु परिहीयते ॥१९॥
नस्य के द्वारा गर्भिणी स्त्री के दोषों को नहीं निकालना चाहिये अर्थात् उसे नस्य नहीं देना चाहिये। नस्य देने से गर्भिणी स्त्री के प्राण नष्ट हो जाते हैं ॥१९॥
कुणिर्वा यदि वाऽन्यश्च जायते दुर्बलेन्द्रियः । धूमपानेन गभिण्या धूमतेजोहतो भृशम् ॥२०॥
विवर्णो जायते गर्भः पतेद्वाऽपि विशांपते ! ।
हे राजन् ! गर्भिणी के धूम्रपान करने से उत्पन्न हुई सन्तान धूम्र की तेजी से नष्ट हुई लूली (जिसके हाथ निकम्मे हों), अन्धी अथवा दुर्बल होती है। वह वर्णरहित (कान्तिहीन) होती है अथवा गर्भपात ही हो जाता है ॥२०॥
शिरोविवेके गर्भिण्याः संक्षोभात्तु भयेन वा ॥२१॥
मारुतः कुपितो देहे गर्भघाताय कल्पते । अथवा वातरोगी तु गर्भो भवति पार्थिव ! ॥२२॥
हे पार्थिव ! गर्भिणी को शिरोविरेचन देने से संक्षोभ और भय के कारण गर्भिणी के शरीर में वायु का प्रकोप होकर गर्भ नष्ट हो जाता है अथवा यदि वह उत्पन्न होता है तो उसे वातिक रोग हो जाते हैं ॥२१-२२॥
स्वेदेन तरुणे गर्भे पित्तं प्रकुपितं भृशम् । च्यावयेदाशु गर्भं तु तस्मात् स्वेदं विवर्जयेत् ॥२३॥
स्वेदः स्थिरे तु विहितो गर्भवैवर्ण्यकारकः ।
तरुण गर्भ में स्वेद देने से पित्त प्रकुपित हो जाता है। वह प्रकुपित हुआ पित्त शीघ्र ही गर्भ को गिरा देता है। इसलिये गर्भावस्था में स्वेद नहीं देना चाहिये। तथा गर्भ के स्थिर होने पर दिया गया स्वेद गर्भ को विवर्ण (कान्तिहीन) कर देता है ॥२३॥
वमनं तरुणे गर्भे स्वैर्गुणैर्गर्भघातकम् ॥२४॥
तरुण गर्भ में दिया गया वमन अपने गुणों के द्वारा गर्भ को नष्ट कर देता है ॥२४॥
नाभिप्रपीडनोत्कारात् संक्षोभाच्च विशेषतः । गर्भिण्यास्तरुणे गर्भे स्रंसनं न प्रशस्यते ॥२५॥
गुरुत्वादुष्णतीक्ष्णत्वाद्वहनाच्चास्य घातकम् ।
विशेष रूप से नाभि का पीडन करने अथवा संक्षोभ के कारण गर्भिणी को तरुण गर्भावस्था में दिया गया विरेचन प्रशस्त नहीं माना गया है। यह गुरु, उष्ण, तीक्ष्ण तथा वाहन गुण के कारण गर्भ को नष्ट कर देता है ॥२५॥
५१ का.सं.