भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 806

४४६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अन्तर्वत्नीचिकित्सिताध्यायः १०]

बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिये कि यवागू के द्वारा दोषों के कुछ कम हो जाने पर यूषों के साथ अन्न का सेवन कराये। तथा फिर यूषों के द्वारा दोषों के और कम हो जाने पर मांंसरस अथवा दूध देवे। इस अवस्था में ओषधियों का प्रयोग अच्छा नहीं है। इसके बाद भी यदि कुछ दोष का अनुबन्ध शेष रहे अर्थात् दोष बचा रह जाय तो गर्भ के समय को देखकर चतुर्थ मास से लेकर चिकित्सक ओषधि का प्रयोग कर सकता है। अर्थात् गर्भ के चतुर्थ मास के बाद ओषधि का प्रयोग किया जा सकता है। उससे पूर्व ओषधि का प्रयोग बिलकुल नहीं करना चाहिये। चतुर्थ मास से पूर्व गर्भ स्थिर नहीं होता इस लिये ओषधियों का प्रयोग नहीं कराना चाहिये। चतुर्थ मास में गर्भ स्थिर हो जाता है। गर्भ के स्थिर हो जाने के बाद फिर विशेष डर नहीं रहता है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—'चतुर्थे मासि स्थिरत्वमापद्यते गर्भः'। चरक में तो गर्भावस्था में आठवें मास से पूर्व तक ओषधि का निषेध किया गया है उसके बाद भी जो केवल वमन आदि से साध्य रोग हैं अर्थात् जिनमें वमन, विरेचन आदि देना आवश्यक है उनमें मृदु वमन-विरेचन आदि अथवा तदर्थकारी (विरेचन ओषधि के स्थान पर गुदा में फलवर्ति आदियों का रखना तदर्थकारी कहलाता है अर्थात् जो उस प्रयोजन को सिद्ध करे) ओषधियों के प्रयोग का विधान दिया गया है ॥९-११॥

शारीरं तु ज्वरं ज्ञात्वा वातपित्तकफात्मकम् । मध्यां क्रियां प्रयुञ्जीत संचिन्त्य गुरुलाघवम् ॥१२॥
उपद्रवबलं ज्ञात्वा सत्त्वं चापि समीक्ष्य तु । गर्भावस्थां तु विज्ञाय लेखनानि प्रदापयेत् ॥१३॥

यदि गर्भिणी स्त्री को वातिक, पैत्तिक अथवा श्लैष्मिक आदि शारीरिक ज्वर हो तो गुरुता एवं लघुता का विचार करके मध्य क्रिया (चिकित्सा) का प्रयोग करना चाहिये। अर्थात् उस समय ऐसी चिकित्सा होनी चाहिये जो साधारणतया तीनों दोषों के प्रकोप में व्यवहृत हो सके। तथा रोग के उपद्रव एवं रोगी के बल और गर्भावस्था को ध्यान में रखते हुए लेखन ओषधियां देनी चाहिये ॥१२-१३॥

उत्पन्नायां तु तृष्णायां नात्युष्णं प्रपिबेज्जलम् । वातश्लेष्मसमुत्थे तु ज्वरे नीरं¹ विषायते ॥१४॥
अथ पित्तकृते चापि शृतशीतं प्रशस्यते । कुप्यपाषाणनिष्पक्वं शीतं तृष्णानिबर्हणम् ॥१५॥

ज्वर में तृष्णा (प्यास) लगने पर हल्का, उष्ण (सुखोष्ण) जल पीना चाहिये। विशेषकर वातिक और श्लैष्मिक ज्वर में तो शीतल जल बिलकुल ही विष के तुल्य है। पैत्तिक ज्वर में भी गरम करके ठण्डा किया हुआ पानी ही प्रशस्त माना गया है। कूपी तथा पत्थर के बर्तन में पकाकर ठण्डा किया गया जल प्यास को बुझाता है। अर्थात् वैसे तो साधारणतया सभी प्रकार के ज्वरों में उष्ण जल ही देना चाहिये। पैत्तिक ज्वर में चाहें तो थोड़ा बहुत शीतल जल दिया जा सकता है परन्तु वातिक और श्लैष्मिक ज्वर में तो शीतल जल का बिलकुल ही निषेध किया गया है तथा पैत्तिक में भी गर्म करके ठण्डा किया हुआ जल देना चाहिये। ज्वर में साधारणतया उष्ण जल ही क्यों देना चाहिये इस विषय में चरक वि. अ. ३ में कहा है। यहां भी पित्त के प्रयोग में जो शीतल जल का विधान दिया गया है, वह गरम करके ठण्डा किया हुआ जल ही समझना चाहिये ॥१४-१५॥

ज्वरे तु तरुणे दृष्टो विधिरेष विशेषतः । भग्नवेगे तु कर्तव्यं तृष्णाप्रशमनैः शृतम् ॥१६॥
ज्वरं ज्वरं समासाद्य शीतं वा यदि वेतरम्(त्) ।

यह उपर्युक्त विधान विशेषकर तरुण ज्वरों के लिये दिया गया है। अर्थात् साधारणतया सभी प्रकार के ज्वरों में इस विधान का पालन करना चाहिये परन्तु तरुण ज्वरों में तो इसका अवश्य ही पालन करना चाहिये। अन्य ज्वरों में


१. नीरं शीतलजलमित्यर्थः स्यात्।