काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअन्तर्वलीचिकित्सिताध्यायः १०] खिलस्थानम् ४४५
अथ अन्तर्वत्नीचिकित्सिताध्यायो दशमः ।
अथातोऽन्तर्वत्नीचिकित्सितमध्यायं वक्ष्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् कश्यपः ॥२॥
अब हम अन्तर्वत्नी चिकित्सित अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। अर्थात् इस अध्याय में गर्भिणी स्त्रियों की चिकित्सा का वर्णन किया जायेगा ॥
सूक्ष्मां चिकित्सां वक्ष्यामि गर्भिणीनां विभागशः ।
तथा गर्भश्च नारी च वर्धते रक्ष्यतेऽपि च ॥३॥
अब मैं गर्भिणी स्त्रियों की सूक्ष्म चिकित्सा का विभागपूर्वक वर्णन करूंगा जिससे गर्भ और नारी (गर्भवती स्त्री) दोनों की वृद्धि होती है तथा उनकी रक्षा भी होती है ॥३॥
गर्भिणीनां ज्वरः कष्टः सर्वव्याधिषु पार्थिव ! । ज्वरोष्मणाऽभितप्तस्तु गर्भो यात्येव विक्रियाम् ॥४॥
तस्माज्ज्वरचिकित्सां तु पूर्वमेव निबोध मे ।
हे पार्थिव ! गर्भिणी स्त्रियों के सम्पूर्ण रोगों में ज्वर सबसे अधिक कष्टदायी रोग होता है। ज्वर की ऊष्मा (गर्मी) से सन्तप्त हुए गर्भ में विकृति उत्पन्न हो जाती है। इसलिये सबसे पहले तू मेरे से ज्वर की चिकित्सा सुन ॥४॥
क्षुच्छ्रमाभ्यञ्जनाद्रौक्ष्यादौष्ण्यापक्वविधारणात् ॥५॥
स्नेहस्वेदौषधानां च विभ्रमात्तेजसोऽपि च । सन्तापान्मनसश्चापि पर्वता¹नां तथैव च ॥६॥
गन्धाच्च तृणपुष्पाणां गर्भिण्या जायते ज्वरः ।
क्षुधा, श्रम, अभ्यञ्जन, रूक्षता, उष्णता, अपक्व के धारण स्नेहन, स्वेदन तथा ओषधियों और तेज के विभ्रम, मन के सन्ताप तथा पहाड़ों पर चढ़ने और तृण एवं पुष्पों की गन्ध इत्यादि से गर्भिणी स्त्री को ज्वर हो जाता है ॥५-६॥
गर्भिणीं ज्वरितां नारीमेकाहमुपवासयेत् ॥७॥
ततो दद्यादलवणां पेयां स्नेहविवर्जिताम् ।
ज्वरयुक्त गर्भिणी स्त्री को पहले एक दिन उपवास कराके फिर लवण एवं स्नेह से रहित पेया देनी चाहिये ॥७॥
तीक्ष्णानि त्वन्नपानानि स्वेदमायासमॆव च ॥८॥
वर्जयेज्ज्वरिता नारी यवागूं केवलां पिबेत् ।
गर्भिणी स्त्री को ज्वर हो जाने पर तीक्ष्ण अन्नपान, स्वेदन और आयास (परिश्रम वाले कार्य) का त्याग कर देना चाहिये। तथा केवल यवागू का सेवन करना चाहिये ॥८॥
यवाग्वा ह्रसिते दोषे यूषैरन्नानि दापयेत् ॥९॥
यूषैस्तु ह्रसिते दोषे रसं वा क्षीरमेव वा । दापयेन्मतिमान् प्राज्ञो न त्वौषधविधिर्हितः ॥१०॥
अनुबन्धे तु दोषस्य गर्भकालमपेक्ष्य च । मासाच्चतुर्थात् प्रभृति भिषग्भेषजमाचरेत् ॥११॥
¹ आरोहणादिति पूरणीयम् । किं वा 'पर्वतारोहणात्तथा' इति वा पाठः स्यात् ? ।