भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 804

४४४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् रक्तगुल्मविनिश्चयाध्यायः ९]

पत्रैलापिप्पलीशुण्ठीचूर्णं वा विडसंयुतम् ।।८२।।
नागरं शुक्तिचूर्णं वा पिबेद्गोमूत्रसंप्लुतम् ।

तेजपत्र, पिप्पली तथा सोंठ के चूर्ण में विडलवण मिलाकर अथवा सोंठ या मुक्ताशुक्ति (अथवा नखी) के चूर्ण को गोमूत्र में मिलाकर सेवन करना चाहिये ।।८२।।

सूक्ष्मैलाकुञ्चिकाचव्यपिप्पलीचित्रकस्य वा ।।८३।।
कल्कं बल्वजयूषाढ्यैः पिबेन्मण्डोदकेन वा ।

छोटी इलायची, कलौंजी, चव्य, पिप्पली तथा चित्रक के कल्क को बल्वज के यूष अथवा चावलों के मण्ड के साथ सेवन करना चाहिये ।।८३।।

अपरापातनोट्दिष्टैरोषधैश्चापि भेदयेत् ।।८४।।

अथवा अपरा (Placenta) पातन के लिये प्रयुक्त होने वाली (सु. शा. अ. १० में कथित) ओषधियों के द्वारा इसका भेदन करना चाहिये ।।८४।।

अतिप्रवृत्तं रुधिरं ग्लानिं जनयते यदि । विनिहृते गुल्मदोषे सावशेषेऽपि वा भिषक् ।।८५।।
पुनरास्थापनोक्तेन तत्र कुर्याद्द्विषग्जितम् । अनुबन्धभयाच्चैव शनैस्तदनुशोधयेत् ।।८६।।

यदि गुल्म के दोष के निकल जाने पर अथवा कुछ शेष रहने पर भी अत्यन्त प्रवृत्त होता हुआ रक्त शरीर में बहुत ग्लानि उत्पन्न करे तो पुनः आस्थापनोक्त विधि से उसकी (च. चि. अ. ५ में कथित) चिकित्सा करनी चाहिये । तथा अनुबन्ध के भय से उसके बाद उसका शनैः २ शोधन करना चाहिये ।।८५-८६।।

पद्मादीनि समूलानि दग्ध्वा तद्भस्म संहरेत् । गाढयित्वा च तत्क्वाथं चूर्णैरेतैर्विपाचयेत् ।।८७।।
शुण्ठीपिप्पलिकुष्ठैश्च चव्यचित्रकदारुभिः । दर्विप्रलेपितं सिद्धमभ्यस्येत्तेन शुद्ध्यति ।।८८।।
शिलाजत्वभयारिष्टं कल्पेनाभ्यस्य मुच्यते ।

मूल सहित पद्म आदि को जलाकर उसकी भस्म बनाले तथा उसके क्वाथ को गाढ़ा करके उसमें सोंठ, पिप्पली, कुष्ठ, चव्य, चित्रक, देवदारु आदि का चूर्ण डालकर पकायें । जब वह कलछी में लिप्त होने योग्य हो जाय तब उसका प्रयोग करे । उससे रोगी का शोधन होता है । और शिलाजीत तथा अभयारिष्ट के कल्प के सेवन से भी रक्तगुल्म नष्ट होता है ।।

यच्चापि पञ्चगुल्मीये चिकित्सितमुदाहृतम् ।।८९।।
तदिहापि प्रयोक्तव्यं प्रसमीक्ष्य बलाबलम् । इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।९०।।
(इति) खिलेषु रक्तगुल्मविनिश्चयो (नाम नवमोऽध्यायः) ।।९।।


इसके अतिरिक्त पञ्चगुल्मीय अध्याय में जो चिकित्सा कही गई है—रोगी के बलाबल को देखकर उस सबका भी यहां प्रयोग करना चाहिये ।
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।।८९-९०।।
(इति) खिलेषु रक्तगुल्मविनिश्चयो (नाम नवमोऽध्यायः)