भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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अन्तर्वलीचिकित्सिताध्यायः १०] खिलस्थानम् ४५१

पित्तज्वरे हिमा पेया पथ्या क्षीरमथापि च ।।५८।।
जीर्णे पित्तहरैः पक्वो यूषस्तु चणकैस्तथा।

पित्त ज्वर में शीतल पेया अथवा दूध पथ्य होता है। जीर्ण पित्त ज्वर में पित्तनाशक ओषधियों द्वारा पकाया हुआ तथा चने का यूष पथ्य माना गया है ।।५८।।

श्लेष्मज्वरे सुखोष्णा तु पेया नार्याः प्रशस्यते ।।५९।।
तथैव मुद्गयूषोऽथ मौलको रस एव च । सुसात्म्यश्चेति कर्तव्यो व्याधावस्मिन् विशेषतः ।।६०।।

श्लेष्म ज्वर में गर्भवती स्त्री को सुखोष्ण (ईषदूष्ण) पेया, मूंग का यूष अथवा मूली का रस देना चाहिये। तथा इस रोग में विशेषकर ऐसी वस्तुओं का प्रयोग कराना चाहिये जो शरीर के लिये सात्म्य हों ।।५९-६०।।

संसृष्टे तु भिषक् प्राज्ञो योजयेत यथाबलम् । सन्निपातसमुत्थाने त्रिदोषशमनं हितम् ।।६१।।

संसृष्ट दोषों में (दो दोषों के मिले होने पर) विद्वान् चिकित्सक को बल के अनुसार ओषधियों का प्रयोग करना चाहिये। तथा सन्निपात (तीनों दोषों के संमिलित प्रकोप) में त्रिदोषशामक चिकित्सा करनी चाहिये ।।६१।।

अथ या मद्यपा नारी शृणु तस्याश्चिकित्सितम् ।
वातिके पैत्तिके वाऽपि श्लैष्मिके च विशांपते ! ।।६२।।
ज्वरे दद्यात् सुरां नार्या जलेनार्धेन योजिताम् । सुरया वासयित्वैनां ततः १कल्पं प्रदापयेत् ।।६३।।

हे विशांपते (राजन्) ! जो स्त्री मद्य का सेवन करती है उसकी चिकित्सा सुनो—वातिक, पैत्तिक अथवा श्लैष्मिक ज्वर में गर्भवती स्त्री को मद्य (शराब) में आधा पानी मिलाकर देना चाहिये। अथवा भिन्न २ कल्प को सुरा के द्वारा सुगन्धित करके उसे देना चाहिये ।।६२-६३।।

हरेणुमुद्गचुच्चू२नां कर्कट्याश्च रसेन तु । रसेन किञ्चिदम्लेन लघून्यन्नानि भोजयेत् ।।६४।।
लवणस्नेहहीनानि मृदूनि सुरभीणि च । आहारेण गदे भग्ने मद्यस्योपरमे कृते ।।६५।।

उपर्युक्त आहार के द्वारा रोग के नष्ट हो जाने तथा मद्य की शान्ति हो जाने पर उस स्त्री को हरेणु, मूंग तथा चुच्चू नामक शाक अथवा काकड़ाशृङ्गी के रस या कुछ अम्ल रस के साथ लवण तथा स्नेह से रहित मृदु एवं सुगन्धियुक्त भोजन कराये ।।६४-६५।।

यथोक्ता तु क्रिया पथ्या यथास्वमिति कश्यपः । अतिसारे तु गर्भिण्याः समुत्पन्ने भिषग्जितम् ।।६६।।
वातिके पैत्तिके चैव श्लैष्मिके च प्रवक्ष्यते ।

गर्भिणी स्त्री को अतिसार हो जाने पर वातिक, पैत्तिक एवं श्लैष्मिक दोष के अनुसार उस २ दोष की यथोक्त चिकित्सा करनी चाहिये ।।६६।।

विरुद्धाध्यशनाजीर्णैस्तथैवात्यशनादपि ।।६७।।
भयोद्वेगविधाताद्वा संघातात् पूरणात् क्षयात् ।
(इति ताडपत्रपुस्तके २२३ तमं पत्रम् ।)


१. कल्पं तत्तत्प्रयोगोक्तम् ।
२. चुच्चूः शाकविशेषः ।