काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४५२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अन्तर्वत्नीचिकित्सिताध्यायः १०]
कन्दमूलफलैरामैर्दुष्टतोयनिषेवणात् ।।६८।। रौक्ष्याद्बुभुक्षया छो(शो)काद्गुर्वाभिष्यन्दिभोजनात् । अब्यातोश्च स(मु)द्रेकादतीसारः प्रवर्तते ।।६९।।
गर्भिणी स्त्री को अतिसार का कारण—विरुद्ध भोजन, अध्यशन (पूर्वकृत आहार के बिना पचे दूसरा भोजन करना), अजीर्ण, मात्रा से अधिक भोजन, भय तथा उद्वेग के विघात, संघात (दोषों के संघात), पूरण (सन्तर्पण), एवं क्षय से तथा कच्चे कन्द मूल, फल के प्रयोग एवं दूषित जल के सेवन से, क्षुधा के कारण उत्पन्न रूक्षता, शोक और गुरु एवं अभिष्यन्दि भोजन से अब धातु (जलीय अंशयुक्त धातु—लसीका) के उद्रेग के कारण अतिसार हो जाता है ।।६७-६९।।
आमातिसारे संजाते पाचनानि प्रदापयेत् । कुटजस्य च बीजानि मुस्ता पाठा तथैव च ।।७०।। अजमोदाऽथ सरलं तथा चातिविषा शुभा । आमे श्लेष्मान्विते पेयमेतत् पिष्टं सुखाम्बुना ।।७१।।
आमातिसार में आम के श्लेष्मा से युक्त होने पर उसे कुटज के बीज (इन्द्रजौ), नागरमोथा, पाठा, अजमोद, सरल (चीड़) तथा अतिविषा (अतीस) आदि पाचक ओषधियों को पीसकर ईषदुष्ण जल के साथ देना चाहिये ।।
पाठाचन्दनभागश्च कुटजस्य फलानि च । तथा चातिविषा मुख्या पिष्टमेतद्धिताम्बुना ।।७२।। आमे पित्तान्विते पेयमिति ह स्माह कश्यपः ।
आमातिसार में आम के पित्त से युक्त होने पर पाठा, चन्दन, कुटज के फल (इन्द्रजौ) तथा अतीस-आदि ओषधियों को पीसकर हितकर जल के साथ देना चाहिये ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।।७२।।
हिङ्गुसैन्धवनागाश्च बृहत्यौ कौटजं फलम् ।।७३।। तथा पिप्पलिमूलं च मुख्या चातिविषा नृप ! । आमे वातोत्थिते पेयमेतत् पिष्टं सुखाम्बुना ।।७४।।
हे राजन् ! आमातिसार में आम के वात से युक्त होने पर हींग, सैन्धव, नागकेसर, दोनों बृहती, इन्द्रजौ, पिप्पलीमूल तथा अतीस-उन्हें पीसकर ईषदुष्ण जल के साथ देना चाहिये ।।
बृहत्यादिस्तु पातव्यः सन्निपातसमुत्थिते । पक्वसंग्रहणे पथ्यः सर्वेषामिति निश्चयः ।।७५।।
सान्निपातिक आमातिसार में बृहत्यादि गण की ओषधियों का क्वाथ पिलाना चाहिये । आमदोष के पक जाने पर पक्वातिसार का स्तम्भन करना चाहिये—ऐसा सब आचार्यों का मत है ।।७५।।
श्लैष्मिके मधुसंयुक्तस्तण्डुलोदकसंयुतः । अम्बष्ठादिगणः पेयो भिन्नवर्चोविबन्धनः ।।७६।।
पक्वातिसार में श्लेष्मा का संयोग होने पर अर्थात् श्लैष्मिक अतिसार के स्तम्भन के लिये अम्बष्ठादि गण के क्वाथ में मधु तथा तण्डुलोदक मिलाकर पिलाना चाहिये । यह अतिसार को रोकता है ।।७६।।
अथवा कौटजं पिष्ट्वा फलं क्षौद्रेण संयुतम् । धातकी मरिचं लोध्रं कट्वङ्गं देवदारु च ।।७७।। तण्डुलोदकसंयुक्तं श्लेष्मातीसारनाशनम् ।
अथवा इन्द्रजौ, धाय के फूल, मरिच, लोध्र, कट्वङ्ग (श्योनाक अरलु) तथा देवदारु को मधु के साथ पीसकर तण्डुलोदक से पीना चाहिये । यह श्लेष्मातिसार को नष्ट करता है ।।७७।।
तण्डुलोदकपिष्टं वा केसरं नलिनस्य तु ।।७८।। मधुयुक्तं पिबेन्नारी श्लेष्मातीसारनाशनम् ।