भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 813

अन्तर्वलीचिकित्सिताध्यायः १० ] खिलस्थानम् ४५३

अथवा नलिन (कमल) के पुंकेसर (Pallens) को तण्डुलोदक में पीसकर उसमें मधु मिलाकर पीने से श्लेष्मातिसार नष्ट होता है ॥७८॥

न्यग्रोधादिस्तु निर्यूहः क्षौद्रेण मधुरीकृतः ।।७९।।
पित्तातिसारशमनः कुशलैः परिकीर्तितः ।

कुशल चिकित्सकों की राय में न्यग्रोधादि गण के क्वाथ को मधु के द्वारा मधुर करके पीने से पित्तातिसार नष्ट होता है ॥

कणा धातकिपुष्पं च मधुकं बिल्वपेशिका ।।८०।।
शर्करामधुसंयुक्तं पित्तवृद्धिविनाशनम् ।

अथवा पिप्पली, धाय के फूल, मुलहठी, कच्चे बिल्व का गूदा-इनके क्वाथ को शर्करा एवं मधु मिलाकर पिलाने से पित्तातिसार नष्ट होता है ॥८०॥

पद्मं समङ्गाम्रास्थि मधुकं पद्मकेसरम् ।।८१।।
लोध्रं मोचरसश्चैव शर्कराक्षौद्रसंयुतः । पित्तातिसारशमनो योग एष विधीयते ।।८२।।

कमल, मंजीठ, आम की गुठली, मुलहठी, पद्मकेसर, लोध्र तथा मोचरस को शर्करा तथा मधु के साथ देने से पित्तातिसार शान्त होता है ॥८१-८२॥

एरण्डवर्त्तं क्षुड्डाकं पञ्चमूलं शृतं हितम् । कालाकट्वङ्गसंयुक्तं वातातीसारनाशनम् ।।८३।।

एरण्ड को छोड़कर स्वल्प पञ्चमूल का क्वाथ बनाकर उसमें काला (नीलिनी अथवा सारिवा) और कट्वङ्ग (श्योनाक) मिलाकर देने से वातातिसार नष्ट होता है ॥८३॥

पद्मं समङ्गाम्रास्थि बृहती बिल्वपेशिका । श्लक्ष्णपिष्टं पिबेद्दध्ना वातातीसारनाशनम् ।।८४।।

कमल, मंजीठ, आम की गुठली, बृहती, कच्चे बिल्व का गूदा—इन सबको बारीक पीसकर दही के साथ सेवन करने से वातातिसार नष्ट होता है ॥८४॥

पिप्पल्यो धातकी पद्मं समङ्गा मोचजो रसः । मत्स्यण्डिकेन्द्रधान्यं च पिष्टमेतन्नृपोत्तम ! ।।८५।।
तण्डुलोदकसंयुक्तं सशूले वातिके हितम् ।

हे राजन् ! वातातिसार में पिप्पली, धाय के फूल, कमल, मंजीठ, मोचरस, मत्स्यण्डिका (मीजां खाण्ड), इन्द्रजौ—इनको पीसकर तण्डुलोदक के साथ देना चाहिये ॥८५॥

मुस्ताबिल्वशलाटूनि अनन्ता मधुकं तथा ।।८६।।
श्लक्ष्णपिष्टं पिबेद्दध्ना सर्पिर्गुडसमायुतम् । वातातीसारशान्त्यर्थं यथावदिति कश्यपः ।।८७।।

नागरमोथा, बिल्वशलाटु (कच्चे बिल्व), सारिवा, मुलहठी इन्हें बारीक पीसकर उसमें घृत तथा गुड मिलाकर यथावत् दही के साथ सेवन करने से वातातिसार नष्ट होता है-ऐसा महर्षि कश्यप का मत है ॥८६-८७॥

पिप्पल्यो धातकी लोध्रं समङ्गा पद्मकेसरम् । पद्मा मोचरसश्चैव दीर्घवृन्ततरोस्त्वचः ।।८८।।
केसरं चेति चूर्णानि श्लक्ष्णान्येतानि चूर्णयेत् । घृतं मत्स्यण्डिका क्षौद्रं लेहीभूतानि लेहयेत् ।।८९।।
लेहः कल्याणकस्त्वेष सर्वातीसारनाशनः ।