काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 814, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें४५४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | अन्तर्वत्नीचिकित्सिताध्यायः १०]
कल्याणकावलेह—पिप्पली, धाय के फूल, लोध्र, मंजीठ, पद्मकेसर, पद्म, मोचरस, दीर्घवृन्त (श्योनाक) की छाल, तथा नागकेसर-इन सबको बारीक पीसकर चूर्ण करे। इनमें घी, मत्स्यण्डिका तथा मधु मिलाकर अवलेह बनाये। इसे कल्याणकावलेह कहते हैं। यह सब प्रकार के अतिसारों को नष्ट करता है ॥८८-८९॥
काश्मर्यमूलत्वक्कल्कः श्यामामूलं तथैव च ।।९०।। यवागूं दधिमण्डेन सिद्धामल्पघृतां पिबेत्। प्रवाहिकार्ता सततं तथा संपद्यते सुखी ।।९१।।
गंभारी की जड़ की छाल का कल्क तथा त्रिवृत् की मूल की दधिमण्ड (दही का पानी-Water floating on curd) के साथ यवागू बनाकर उसे थोड़े घृत के द्वारा सिद्ध करके निरन्तर पीने से प्रवाहिका (Dysentry) का रोगी स्वस्थ हो जाता है।
वक्तव्य—माधवनिदानकार अतिसार तथा प्रवाहिका में यह अन्तर माना है कि अतिसार में नाना प्रकार की द्रवधातुएं निकलती हैं और प्रवाहिका में केवल मात्र कफ ही निकलता है ॥९०-९१॥
किराततिक्तकं लोध्रं यष्टीमधुकमेव च। फाणितं तिलकल्कश्च शर्करामधुसंयुतम् ।।९२।। तण्डुलोदकमेत्येतत् प्रतिहन्ति प्रवाहिकाम्।
चिरायता, लोध्र, मुलहठी, फाणित (राव), तिलों का कल्क इन्हें पीसकर शर्करा तथा मधु मिलाकर तण्डुलोदक के साथ सेवन करने से प्रवाहिका नष्ट होती है ॥९२॥
कपित्थबिल्वमाषाणां कल्कानक्षसमान् पृथक् ।।९३।। तथा कोमलमोचाऽपि पिप्पलीशृङ्गवेरयोः। अर्धप्रस्थं भवेद्दध्नो गौडमद्यकृतः खटः (डः) ।।९४।। घृतक्षौद्रेण सहितः पीतो हन्ति चिरोत्थिताम्। वाहिकां जीर्णभक्षायाः प्राणस्य बलवर्धनः ।।९५।।
कपित्थ (कैथ), बिल्व, उड़द, कोमल शाल्लकी तथा पिप्पली और आर्द्रक—प्रत्येक का कल्क पृथक् २ एक अक्ष (तोला) तथा दही आधा प्रस्थ। इसमें गुड निर्मितद मद्य डालकर खड तैयार किया जाय। इसमें घी और मधु (असमान मात्रा में) डालकर भोजन के जीर्ण हो जाने पर सेवन करने से जीर्ण प्रवाहिका नष्ट होती है तथा प्राणों के बल की वृद्धि होती है। दही की लस्सी में कपित्थ, चांगेरी, मरिच तथा जीरा आदि डालकर पका लेने से उसे खड कहते हैं। कहा भी है—तक्रं कपित्थचांगेरीमरिचाजाजिचित्रकैः। सुपक्वः खडयूषोऽयम्॥ चरक चि. अ. १९ में भी प्रवाहिका के लिये खडयोग दिया है ॥९३-९५॥
बाणमूलस्य निष्क्वाथस्त्रपुषीबीजसंयुतः। शर्करामधुसंयुक्तो रक्तातीसारनाशनः ।।९६।।
रक्तातिसारनाशक योग—बाण (सहचर) की मूल के क्वाथ में खीरे के बीज तथा शर्करा और मधु मिलाकर सेवन करने से रक्तातिसार नष्ट होता है ॥९६॥
पद्मं समङ्गा मधुकं चन्दनं पद्मकेशरम्। पयसा मधुसंयुक्तं रक्तातीसारनाशनम् ।।९७।।
कमल, मंजीठ, मुलहठी, चन्दन, कमलकेसर, इनके चूर्ण को मधु मिलाकर दूध से सेवन करने से रक्तातिसार नष्ट होता है ॥९७॥
तिलान् कृष्णान् समङ्गा च यष्टीमधुकमुत्पलम्। पिबेदामेन पयसा रक्तातीसारनाशनम् ।।९८।।
काले तिल, मंजीठ, मधुयष्टि तथा नील कमल-इन्हें पीसकर कच्चे दूध के साथ सेवन करने से रक्तातिसार नष्ट होता है।