भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

पृष्ठ 815, कुल 942 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 815

अन्तर्वलीचिकित्सिताध्यायः १०] खिलस्थानम् ४५५

वक्तव्य—इसमें दूध बकरी का लिया जाय तो विशेष गुणकारी होता है। चरक ने रक्तातिसार में बकरी के दूध का प्रयोग दिया है ॥९८॥

मौचो रसस्तिला लोध्रमुत्पलं कमलं तथा। पिबेत् क्षीरेण संयुक्तं रक्तातीसारनाशनम् ॥९९॥

मोचरस, तिल, लोध्र, नीलकमल, कमल-इनके चूर्ण का दूध के साथ सेवन करने से रक्तातिसार नष्ट होता है ॥९९॥

पयस्या चन्दनं लोध्रं पद्मकेंसरमेव च। पयसा मधुसंयुक्तं पिबेद्रक्तातिसारिणी ॥१००॥

रक्तातिसार के रोगिणी को पयस्या (क्षीरकाकोली), रक्तचन्दन, लोध्र तथा कमलकेसर-के चूर्ण को मधु में मिलाकर दूध के साथ सेवन करना चाहिये ॥१००॥

रक्तं निर्वा(र्वे)हते यावत् कृच्छ्रात् सगुदवेदनम्। कुप्यपाषाणतप्तेन पयसा भोजितां ततः ॥१०१॥ मधुकं घृतमण्डेन त्वथैनामनुवासयेत्।

जब तक गुदा में वेदना होती है तथा कष्टपूर्वक गुदा से रक्त आता है तब तक कुप्पी अथवा पत्थर के बर्तन में गरम किये हुए दूध के साथ मुलहठी का सेवन करना चाहिये। तदनन्तर घृतमण्ड के द्वारा उसे अनुवासन देना चाहिये। जमे हुए घी के ऊपर के स्वच्छ पतले भाग को घृतमण्ड कहते हैं ॥१०१॥

गर्भिण्या वातिकी यस्या जायते परिकी(क)र्तिका ॥१०२॥ बृहतीबिल्वमानन्तैर्यूषं कृत्वा तु भोजयेत्।

जिस गर्भवती स्त्री को वातिक परिकर्तिका (परिकर्तनवत् गुदा में पीडा) होती हो उसे बृहती, बिल्व तथा अनन्तमूल का यूष बनाकर खिलाना चाहिये ॥१०२॥

परिकी(क)र्तिकायां गर्भिण्याः पैत्तिकायामिदं हितम् ॥१०३॥ मधुकं हंसपदी च वितुन्नकमथापि च। पाययेन्मधुसंयुक्तं सुपिष्टं तण्डुलाम्बुना ॥१०४॥

गर्भवती स्त्री की पैत्तिक परिकर्तिका में मुलहठी, हंसपदी, तथा धनिये को अच्छी प्रकार पीसकर मधु में मिलाकर तण्डुलोदक के साथ पिलाना चाहिये ॥१०३-१०४॥

श्लैष्मिकायां तु कर्तव्यं यथावत्तन्निबोधत। कण्टकारी श्वदंष्ट्रा च अश्वत्थं चेति तत् समम् ॥१०५॥ संपन्नलवणं कृत्वा भोजयेत् पाययेदपि।

श्लैष्मिक परिकर्तिका में जो चिकित्सा करनी चाहिये उसे तू यथावत् सुन, कटेरी, गोखुरू तथा पीपल-इन तीनों को समान मात्रा में लेकर पीसकर तथा उसमें नमक मिलाकर भोजन तथा पान के रूप में प्रयोग करना चाहिये ॥१०५॥

अथ चेदत्र गर्भिण्याः पार्श्वस्योपग्रहो भवेत् ॥१०६॥ शालपर्णी पृश्निपर्णी बृहतीं कण्टकारिकम्। बिल्वाग्निमन्थश्योनाकं काश्मर्यमथ पाटलिम् ॥१०७॥

(इति ताडपत्रपुस्तके २२४ तमं पत्रम्)

यूषं कृत्वा तु संपन्नं भोजयेत् पाययेदपि।

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित) · पृष्ठ 815, कुल 942 में से · BharatKosha