भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 816

४५६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अन्तर्वत्नीचिकित्सिताध्यायः १०]

यदि गर्भिणी को पार्श्वग्रह (पार्श्व का जकड़ जाना) हो जाय तो उसे शालपर्णी, पृश्निपर्णी, बृहती, कटेरी, बिल्व, अग्निमन्थ (अरणी), श्योनाक (अरलु), गंभारी तथा पाटला–इनका अच्छी प्रकार से यूष बनाकर गर्भिणी को भोजन तथा पान के रूप में प्रयोग कराये ।।१०६-१०७।।

अथ चेदत्र गर्भिण्या मुखपाको भवेदिह ।।१०८।।
हरिद्रदारुनिष्क्वाथं ग्राहयेत् कवलं ततः । ततः स्नेहेन कृत्वा तु ततः स्याच्छर्करोदकम् ।।१०९।।
लोध्रोदकेन कृत्वा तु कुर्यात्तत्प्रतिसारणम् । अनन्तां च समङ्गां च घृषी मोचरसं तथा ।।११०।।
मधुना सह(म)मश्नीयात्ततः संपद्यते सुखी ।

यदि गर्भिणी स्त्री को मुखपाक (Stomatitis) हो जाय तो पहले हल्दी तथा दारुहल्दी के क्वाथ के कवलधारण करे। तदनन्तर स्नेह के तथा फिर चीनी मिले पानी के तथा अन्त में लोध्र क्वाथ के कवलधारण करे उसके बाद लोध्र के चूर्ण का ही मुख में प्रतिसारण (Dusting) करे। अन्त में सारिवा, मंजीठ, घृषी तथा मोचरस के चूर्ण को मधु में मिलाकर सेवन (अन्तःप्रयोग) करना चाहिये। इससे वह रोगिणी स्वस्थ हो जाती है ।।१०८-११०।।

आक्षेपके समुत्पन्ने तथैवाप्यपतानके ।।१११।।
मातुलुङ्गरसः पेयो बिडसैन्धवसंयुतः । अग्निमन्थस्य निर्यूहः क्वथितो वरुणस्य वा ।।११२।।
लावो वा तैत्तिरो वाऽपि रसः स्निग्धः प्रशस्यते ।
पानार्थं वातशमनो ^१वादूलो रस एव च ।।११३।।
असंसृष्टे तु कर्तव्यो विधिरेष सुखावहः ।

यदि गर्भिणी को आक्षेपक अथवा अपतानक रोग हो जावे तो बिजौरे नींबू के रस में विडनमक (बिरिया) तथा सैन्धव नमक डालकर पिलाना चाहिये। अथवा अग्निमन्थ क्वाथ या वरुण क्वाथ देना चाहिये। अथवा बटेर या तीतर के स्निग्ध (स्नेहयुक्त) मांंसरस देने चाहिये। तथा पीने के लिये चर्मचटी का रस देना चाहिये। यदि उपर्युक्त (आक्षेपक तथा अपतानक) रोगों में किसी दोष का विशेष रूप से प्राबल्य न हो तब यह विधि लाभप्रद होती है। आक्षेपक रोग—शरीर की मांसपेशियों में अकस्मात् तथा प्रबल जो संकोच होता है उसे आक्षेपक या (Convulsions) कहते हैं। यह कई रोगों में मुख्य लक्षण होता है जिनमें मस्तिष्क विकार-युक्त हो जाता है। अपतानक रोग—जिस रोग में शरीर की मांसपेशियों में तनाव उत्पन्न हो जाता है उसे अपतानक (Tetanus) कहते हैं। सुश्रुत नि. अ. १ में कहा है—सोऽपतानकसंज्ञो यः पातयत्यन्तराऽन्तरा ।।१११-११३।।

पित्तोपसृष्टे तु 'हितो जाङ्गलो मधुरो रसः ।।११४।।
शृतो मधुरकैः सर्वैर्दाडिमाम्लसमायुतः ।

यदि उपर्युक्त रोगों (आक्षेपक तथा अपनातक) में पित्त का संयोग हो तो उसमें मधुर जांगल मांंसरस का सेवन कराना चाहिये। अथवा मधुर वर्ग की सम्पूर्ण ओषधियों का क्वाथ बनाकर उसमें अनारदाने की खटाई डालकर देना चाहिये ।।११४।।

वातश्लेष्मसमुत्थे तु व्यम्लस्तु कटुको रसः ।।११५।।
यवक्षारेण संयुक्तो जाङ्गलः सततं हितः । मृदवः पाणितापाश्च पित्तवर्ज्ये हितास्तथा ।।११६।।


१. चर्मचट्या रस इत्यर्थः ।