काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअन्तर्वत्नीचिकित्सिताध्यायः १०] खिलस्थानम् ४५७
यदि इनमें वायु तथा कफ का संयोग हो तो अम्ल और कटु रसों का सेवन कराना चाहिये अथवा जांगल मांसरस में यवक्षार मिलाकर देना चाहिये। तथा हाथों को गरम करके रोगी को मृदु ताप पहुँचाना लाभदायक होता है। परन्तु इसमें पित्त का प्रकोप नहीं होना चाहिये। अर्थात् यदि इसमें साथ में पित्त का भी प्रकोप सम्मिलित हो तो रोगी को ताप नहीं पहुंचाना चाहिये ॥११५-११६॥
घृतसेकोऽथवा कार्यो जीर्णे गर्भे विशेषतः ।
उष्णो वा यदि वा शीतो व्याधिमासाद्य तत्त्वतः ॥११९७॥
अथवा जीर्ण गर्भ में विशेषकर घृत का सेक करना चाहिये। यह सेक व्याधि के अनुसार उष्ण या शीत भी हो सकता है ॥११९७॥
अथ छर्दिचिकित्सां तु प्रोच्यमानां निबोधत । मातुलुङ्गरसो लाजाः कोलमज्जा तथाऽञ्जनम् ॥११९८॥
तथा दाडिमसारश्च शर्करा क्षौद्रमेव च । एष वातातिकां छर्दिं हन्ति लेहो विशेषतः ॥११९९॥
अब तू मेरे से छर्दि (वमन) की चिकित्सा को सुन, वातिक छर्दि—बिजौरे का रस, लाजा (धान की खील), कोल (बेर) की मींगी, अञ्जन (रसाञ्जन), अनारदाना, चीनी—इन सबका मधु के साथ बनाया हुआ यह अवलेह विशेषरूप से वातिक छर्दि को नष्ट करता है ॥११९८-११९९॥
दाडिमाम्लो रसः पक्वो हृद्यो लवणवर्जितः । वातच्छदिहरो राजन्! माहिषो वा सुसंस्कृतः ॥१२००॥
हे राजन् ! हृदय को अच्छा लगने वाला तथा लवणरहित खट्टेअनार का रस तथा पका हुआ मांसरस अथवा अच्छी प्रकार संस्कार किया हुआ भैंस का मांसरस खिलाने से वातिक छर्दि नष्ट होती है ॥१२००॥
शर्करामधुसंयुक्तं लाजचूर्णसमायुतम् । चातुर्जातककल्केन हृद्यं पुष्पैः सुवासितम् ॥१२०१॥
पित्तच्छर्दिप्रशमनं हितं तण्डुलधावने । हिता लाजमयी पेया सिताक्षौद्रेण संयुता ॥१२०२॥
जाङ्गलो वा रसः पथ्यः शर्करामधुरीकृतः ।
पैत्तिक छर्दि—इसमें चातुर्जातक (दालचीनी, छोटी इलायची, तेजपत्र, नागकेसर) के कल्क में लाजा का चूर्ण, शर्करा तथा मधु मिलाकर तथा उसे फूलों के द्वारा हृद्य एवं सुगन्धित करके तण्डुलोदक के साथ देना चाहिये। अथवा शर्करा एवं मधु मिश्रित लाजा (धान की खील) की पेया देनी चाहिये। अथवा जांगल पशुपक्षियों का मांसरस शर्करा के द्वारा मधुर करके पथ्य माना गया है ॥१२०१-१२०२॥
आम्रजम्बूप्रवालानि सितानि सुशृतानि तु ॥१२०३॥
क्षौद्रयुक्तानि पेयानि श्लेष्मच्छर्द्यां विशेषतः । भोजनार्थे हितं यूषं मुद्गैर्दाडिमसारि(धि)तम् ॥१२०४॥
व्यपेतस्नेहलवणं हृद्यं छर्दिविनाशनम् ।
श्लैष्मिक छर्दि—(श्लैष्मिकवमन) में विशेषकर आम एवं जामुन के शुभ्र कोमल पत्तों को पकाकर उसमें मधु मिलाकर पिलाना चाहिये। तथा भोजन में उसके लिये अनारदाने से सिद्ध किया हुआ तथा स्नेह और लवणयुक्त मूंगों का यूष हितकर है। यह हृदय को अच्छा लगता है तथा वमन को नष्ट करता है ॥१२०३-१२०४॥
सन्निपातसमुत्थायां संसृष्टान्यवचारयेत् ॥१२०५॥
सन्निपातज (त्रिदोषज) वमन में संसृष्ट योग देने चाहिये अर्थात् यदि वमन त्रिदोषजन्य हो तो उसकी चिकित्सा भी ऐसी होनी चाहिये जो तीनों दोषों को शान्त करे ॥१२०५॥