काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४५८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अन्तर्वत्नीचिकित्सिताध्यायः १०]
कृमिजायां तु कर्तव्यं यत् पुरस्तात् प्रवक्ष्यते। वर्षाभूमूलनिष्क्वाथं योजयेद्भद्रदारुणा ।।१२६।।
तत् पिबेन्मधुसंयुक्तं शोफं स्त्री पूर्वया सह ।
यदि गर्भिणी स्त्री को कृमिजन्य वमन हो तो निम्नलिखित चिकित्सा करनी चाहिये—पुनर्नवा की मूल तथा देवदारु के क्वाथ में मधु मिलाकर उसे पिलाना चाहिये। यदि उस स्त्री को शोफ (शोथ) हो तो केवल ओषधि अर्थात् केवल पुनर्नवा का क्वाथ देना चाहिये ।।१२६।।
पिप्पल्यङ्कोठमूलानि वाजिलिण्डरसस्तथा ।।१२७।।
दधि माहिषमित्येतत् कामलायाश्चिकित्सितम् ।
गर्भिणी स्त्री के कामला रोग (Jaundice) पिप्पली, अङ्कोठमूल, घोड़े की लीद का रस और भैंस के दूध की दही सब मिलाकर सेवन कराना चाहिये ।।१२७।।
मातुलुङ्गरसः पेयः सैन्धवेन सुयोजितः ।।१२८।।
वातिके हृदि शूले तु प्रधान इति निश्चयः ।
गर्भिणी के वातिक हृदयशूल में मुख्यरूप से बिजौरै नींबू के रस में अच्छी प्रकार नमक मिलाकर पिलाना चाहिये। यह निश्चय से इसकी प्रधान ओषधि है ।।१२८।।
प्रियङ्गवोऽथ पिप्पल्यो भद्रमुस्ता हरेणवः ।।१२९।।
क्षौद्रं बदरचूर्णं च पिबेत् पित्तार्दिते हृदि ।
पैत्तिक हृदयशूल में प्रियङ्गु, पिप्पली, भद्रमुस्ता, हरेणु, मधु तथा बेर का चूर्ण—इनका प्रयोग करना चाहिये ।।१२९।।
पिप्पली चूर्णकल्कस्तु पत्रं चोचं प्रियङ्गवः ।।१३०।।
मातुलुङ्गरसश्चैव लेहः श्लेष्मार्दिते हृदि ।
श्लैष्मिक हृदयशूल में पिप्पली का चूर्ण, तेजपत्र, चोच (दालचीनी का एक भेद जिसे बहलत्वक् कहते हैं) तथा प्रियङ्गु को बिजौरे नीम्बू के रस में मिलाकर अवलेह बनाकर देना चाहिये ।।१३०।।
कुलीरशृङ्गी शरटं भार्गी पिप्पल्य एव च ।।१३१।।
वातकासहरो लेहो मातुलुङ्गरसप्लुतः ।
कुलीरशृङ्गी (काकड़ाशृङ्गी), शरट, भार्ङ्गी तथा पिप्पली-इनके चूर्ण को बिजौरे नीम्बू के रस में मिलाकर बनाया हुआ अवलेह वातिक कास रोग को नष्ट करता है ।।१३१।।
मधूलिका तु गोक्षीरी पिप्पली शर्करा तथा ।।१३२।।
द्राक्षाक्षौद्रसमायुक्तो लेहो वै पित्तकासहा ।
मुलहठी, गोक्षीरी, पिप्पली तथा शर्करा इन सबके चूर्ण को मुनक्के तथा मधु के साथ पीसकर बनाया हुआ अवलेह पैत्तिक कास को दूर करता है ।।१३२।।
पिप्पल्यस्त्रिफला रास्ना भद्रदारु समाक्षिकम् ।।१३३।।
श्लेष्मकासहरो लेहः कुशलैः परिकीर्तितः ।
पिप्पली, त्रिफला, रास्ना तथा भद्रदारु के चूर्ण को मधु के साथ मिलाकर बनाया हुआ अवलेह चिकित्साकुशल व्यक्तियों द्वारा श्लैष्मिक कास को नष्ट करनेवाला कहा गया है ।।१३३।।