काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअन्तर्वलीचिकित्सिताध्यायः १०] खिलस्थानम् ४५९
मधुकं शङ्खचूर्णं च जीवलाक्षाऽथ माक्षिकम् ।। १३४ ।।
लेहः शर्करया युक्तः क्षतकासविनाशनः ।
मुलहठी, शंखपुष्पी, पीपल की लाख तथा मधु और चीनी इनका अवलेह क्षतज कास को नष्ट करता है ।। १३४ ।।
मयूरस्य तु रोमाणि श्वाविच्छल्यकयोरपि ।। १३५ ।।
पिप्पलीतण्डुलांश्चैव कोलमूलं च तत्समम् । चूर्णितं मधुसर्पिर्भ्यां लिहेच्छ्वासकफापहम् ।। १३६ ।।
मोर के रोंये (चंदोए) तथा सेही और शल्यक (छोटी सेही ) के बाल, पिप्पली, चावल तथा कोल (बेर) की जड़— समान मात्रा में लेकर चूर्ण करके उनका मधु और घृत (असमान मात्रा) के साथ अवलेह बना कर सेवन करने से श्वास तथा कफरोग नष्ट होते हैं ।। १३५-१३६ ।।
गुडो रास्नाऽथ पिप्पल्यो द्राक्षा समरिचा तथा । हरिद्रा च समङ्गानि चूर्णान्येतानि लेहयेत् ।। १३७ ।।
तैलेन श्वासकासेषु तमके चैव पूजितः ।
गुड, रास्ना, पिप्पली, द्राक्षा (मुनक्का), मरिच, हल्दी, मजीठ, इनका चूर्ण तैल के साथ मिलाकर श्वास, कास तथा तमक श्वास (Asthama) में चटाना चाहिये ।। १३७ ।।
अभयाऽऽमलकं वाऽपि शल्यकस्य त्वचा युतम् ।। १३८ ।।
अन्तर्गृहं सहोष्ट्रास्थि दधितैलेन लेहयेत् । पिप्पल्यामलकी मुस्ता तथा फाणितशर्करा ।। १३९ ।।
हरीतकीति चूर्णानि मधुतैलेन लेहयेत् । शमनं सर्वकासानां श्वासानां च प्रशस्यते ।। १४० ।।
सम्पूर्ण श्वास तथा कास रोगों में हरड़, आंवला, शल्यक (छोटी सेही) की त्वचा गृहधूम तथा ऊंट की हड्डियां इन सबको पीसकर दही तथा तेल के साथ चटाये । तथा पिप्पली, आंवला, नागरमोथा, राब, शर्करा तथा हरड़ का चूर्ण तैल और मधु में मिलाकर चटाना चाहिये ।। १३८-१४० ।।
भद्रदारुहरीतक्यौ सैन्धवं कुष्ठमेव च । घृतं च फाणितं चैव लेह ऊर्ध्वानिलापहः ।। १४१ ।।
भद्रदारु, हरड़, सैन्धव नमक, कुष्ठ, घृत तथा फाणित (राब) को मिलाकर बनाया हुआ अवलेह ऊर्ध्ववात (डकार) को नष्ट करता है ।। १४१ ।।
पिप्पली गैरिकं भार्गी हिङ्गु कर्कटकी तथा ।
समानि च भवेल्लेहो हिक्काप्रशमनः स्त्रियाः ।। १४२ ।।
पिप्पली, गेरु, भारंगी, हींग तथा काकड़ाशृङ्गी को समान मात्रा में लेकर बनाया हुआ अवलेह गर्भिणी स्त्री की हिक्का को शान्त करता है ।। १४२ ।।
(पिप्पली) पिप्पलीमूलं मुस्ता तगरमेव च । दीपनीयं भवेदेतत् क्षीरेण तु समाक्षिकम् ।। १४३ ।।
पिप्पली, पिप्पलीमूल, नागरमोथा तथा तगर के चूर्ण को मधु में मिलाकर दूध के साथ सेवन करने से अग्निदीप्त होती है अर्थात् यह (Stomachic) है ।। १४३ ।।
शतावरी दर्भमूलं मधुकं क्षीरमोरटः । पाषाणभेदकोशीरं कतकस्य फलानि च ।। १४४ ।।
एषां क्वाथरसं कल्कं क्षीरं वा पाययेद्भिषक् । मूत्रग्रहेषु सर्वेषु सिद्धमित्याह कश्यपः ।। १४५ ।।