काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 820, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४६० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | अन्तर्वत्नीचिकित्सिताध्यायः १०] |
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सम्पूर्ण मूत्रग्रह रोगों में—शतावरी, दर्भमूल, मुलहठी, क्षीरमोरट (मूर्वाभेद-क्षीरचूरीनि या क्षीरमोरबेल), पाषाणभेद, खस तथा निर्मली बीजों का क्वाथ, कल्क अथवा इनसे सिद्ध दूध पिलाना चाहिये—ऐसा महर्षि कश्यप का मत है ॥१४५॥
वातगुल्मस्य भैषज्यं योनिगुल्मस्य चाप्यथ । यथावत् पूर्वमुद्दिष्टं समासेन चिकित्सितम् ॥१४६॥
वातगुल्म तथा योनिगुल्म (रक्तगुल्म) की चिकित्सा पहले संक्षेप में यथावत् कह दी गई है ॥१४६॥
वातिके पैत्तिके चैव श्लैष्मिके च विशेषतः ।
(इति ताडपत्रपुस्तके २२५ तमं पत्रम्।)
चतुर्थे मासि नारीणामिदं कुर्याच्चिकित्सितम् ॥१४७॥
चतुर्थ मास में गर्भिणी स्त्री के वातिक, पैत्तिक तथा श्लैष्मिक गुल्म की निम्न चिकित्सा करनी चाहिये ।
वक्तव्य—पहले भी कहा गया है कि गर्भवती स्त्रियों में चतुर्थ मास से पूर्व ओषधि नहीं देनी चाहिये क्योंकि तब तक गर्भ स्थिर नहीं होता है । चतुर्थ मास में गर्भ स्थिर हो जाता है । इसीलिये चतुर्थ मास से पूर्व इसकी चिकित्सा का विधान न देकर उसके बाद के मासों में क्रमशः चिकित्सा का क्रम दिया गया है ॥१४७॥
सर्पिर्भरन्नपानैर्वा क्षीरेणेक्षुरसेन वा । वामयेत् फलयुक्तेन यथावदिति कश्यपः ॥१४८॥
मदनफल से युक्त घृत, अन्नपान, दूध अथवा इक्षुरस के द्वारा यथावत् वमन कराना चाहिये । ऐसा महर्षि कश्यप का मत है ॥१४८॥
चतुर¹ङ्गुलसिद्धेन रसेन पयसाऽपि वा । विरेचयेत्तु मतिमान् य इच्छेत् सुखमात्मनः ॥१४९॥
अथवा स्वास्थ्य की इच्छा करनेवाले बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि अमलतास के रस से सिद्ध किये हुए मांसरस अथवा दूध के द्वारा गर्भिणी स्त्री को विरेचन कराये ॥१४९॥
पूतीकपत्रैर्भृष्टैर्वा पुष्पैर्वाऽट्यालकस्य वा । अम्लां यवागूं प्रपिबेन्नातिवेगा यथा भवेत् ॥१५०॥
अथवा पूतिकरञ्ज के तले हुए पत्तों अथवा पीली बला के फूलों से बनी हुई यवागू को अनारदाने से खट्टी करके पीनी चाहिये जिससे विरेचन के बहुत अधिक योग न हों । अर्थात् इस प्रयोग से विरेचन के थोड़े ही वेग होते हैं ॥१५०॥
एरण्ड(पत्रं)क्षीरेण वातरोगाम्विता पिबेत् । वातमूत्रनिरोधे तु शूले वाऽपि समुत्थिते ॥१५१॥
यदि गर्भिणी स्त्री को कोई वातिक रोग हो, वातिक मूत्रग्रह हो अथवा शूल हो तो दूध के साथ एरण्ड पत्र का चूर्ण दें अथवा दूध में एरण्ड के पत्तों को पकाकर दें ॥१५१॥
पञ्चमे मासि गर्भिण्या व्यक्ताम्ललवणं ततः । आस्थापनं हितं नार्या मधुरं चानुवासनम् ॥१५२॥
पांचवें मास में गर्भिणी स्त्री को अम्ल एवं लवण द्रव्ययुक्त आस्थापन तथा मधुर द्रव्यों की अनुवासन (स्नेह) बस्ति देनी चाहिये ॥१५२॥
ग्रन्थीनां पिडकानां च शोथे चैव विशाम्यते ! ।
रोहिण्यां विद्रधौ वाऽपि षष्ठमासे विशेषतः । यथास्वं भेषजं कुर्याद्दारुणं शास्त्रपारगः ॥१५३॥
१. आरग्वधरसेनेत्यर्थः ।