काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअन्तर्वलीचिकित्सिताध्यायः १०] खिलस्थानम् ४६१
हे राजन् ! शास्त्रकुशल चिकित्सा को छठे मास में गर्भिणी स्त्री की ग्रन्थिरोग, पिडका, शोथ तथा विशेषकर रोहिणी नामक विद्रधि की अपने २ रोग के अनुसार दारुण चिकित्सा करनी चाहिये।
वक्तव्य—रोहिणी रोग गला का एक संक्रामक रोग है जिसे हम आधुनिक परिभाषा के अनुसार (Diphtheria) कह सकते हैं। जिसमें गले में एक झिल्ली बन जाती है जिससे श्वासावरोध हो जाता है। यह रोग प्रायः बच्चों को होता है॥५३॥
पीनमांसोपशमनं क्षारकर्माग्निकर्म च। भग्नास्थिश्लेषणं चैव शस्त्रकर्म तथैव च ।। १५४ ।।
सप्तमे मासि नारीणां सर्वमेतत् प्रयोजयेत्।
सातवें मास में गर्भिणी स्त्री के उभरे हुए मांस की शान्ति (व्रण के भरने के बाद यदि मांसतन्तु की अधिक वृद्धि हो जाय तो उसे (Canterize) करके अथवा नीला थोथा आदि तीक्ष्ण द्रव्यों के द्वारा स्वस्थ मांस के समान स्तर में लाना होता है), क्षारकर्म, अग्निकर्म, टूटी हुई हड्डी का जोड़ना इत्यादि सब शस्त्रकर्म किये जा सकते हैं। अर्थात् सातवें मास में उपर्युक्त सब कर्म किये जा सकते हैं ॥१५४॥
दष्टा सर्पेण पीता वा या विषं गर्भिणी नृप ! ।। १५५ ।।
वमनादिर्विषघ्नैस्तु संसृष्टः स्यादुपक्रमः।
जिस गर्भवती स्त्री को सांप ने काट लिया हो अथवा उसने कोई विषपान कर लिया हो उसकी विषनाशक वामक ओषधियों के द्वारा संसर्जन क्रम से चिकित्सा करनी चाहिये ॥१५५॥
पाठाऽमृता सोमवल्कं द्वे सहे कुटजं तथा ।। १५६ ।।
क्षीरक्वथितमेतत्तु पेयं नार्या विषापहम्।
पाठा, गिलोय, सोमवल्क (श्वेत खदिर), दोनों सहा (सहा तथा अतिसहा) तथा कुटज—इसमें दूध डालकर उसका क्षीरपाक करके क्वाथ बनाकर पिलाये। यह क्वाथ विष को नष्ट करता है ॥१५६॥
शिरीषं पाटलीमूलं तण्डुलीयकमैव च ।। १५७ ।।
सिन्दुवारितमूलं च मूलं सहचरस्य च। निष्क्वाथ्य साधयेत् पेयां प्रक्षुद्रां विषनाशिनीम् ।। १५८ ।।
शिरीष, पाटलामूल, चौलाई तथा निर्गुण्डी तथा सहचर (नीलझिण्टी काला बांसा) की जड़-इनका क्वाथ बनाकर पतली पेया बनाये-यह विष को नष्ट करती है ॥१५७-१५८॥
खडयूषाधिकं चापि युक्त्याऽन्नमशितं हितम्। द्वितीये वक्ष्यते यच्च स्थाने तच्चापि कारयेत् ।। १५९ ।।
इसमें खडयूष तथा युक्तिपूर्वक सेवन किया गया अन्न हितकर होता है। तथा इस विषय में अन्य स्थानों पर भी जो कुछ कहा जायगा उन सबों का प्रयोग करना चाहिये ॥१५९॥
गर्भिणी दुर्बलाकारा या भवत्यासिता सती। ज्वरश्चाभिद्रवत्येनां तस्या गर्भो विपद्यते ।। १६० ।।
जो गर्भवती स्त्री दुर्बल तथा एकदम सफेद (पाण्डु वर्ण वाली) हो जाती है तथा उसे ज्वर होने लगे। उसका गर्भ नष्ट हो जाता है ॥१६०॥
बहु भुङ्क्ते तु याऽत्यर्थं बहुशो बहुमूर्च्छिता। भवेत्तस्याः पतेद्गर्भो गर्भिण्यास्तु न संशयः ।। १६१ ।।
जो गर्भिणी स्त्री बहुत खाती हो, बार २ खाती हो तथा इतना खाती हो कि खाते २ बार २ मूर्च्छित हो जाती हो उस स्त्री का निःसन्देह गर्भपात हो जाता है ॥१६१॥