काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 822, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें४६२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् अन्तर्वत्नीचिकित्सिताध्यायः १०]
नेत्रे मुस्तोत्थिताकारे कर्णौ पादौ च शीतलौ। केशाश्च जटिला यस्यास्तस्या गर्भो विपद्यते ।।१६२।।
जिस गर्भिणी स्त्री के नेत्र मोथे के समान उभरे हुए हों, कान तथा पैर ठण्डे पड़े हुए हों तथा बाल जटिल (वक्र) हों उसका गर्भ नष्ट हो जाता है ॥१६२॥
उपरिष्टात्तु यो नाभ्या उभे पार्श्वे निषेवते। मध्ये वा तिष्ठते नार्याः सोऽपि गर्भो विपद्यते ।।१६३।।
जो गर्भ स्त्री के पेट में नाभि के ऊपर दोनों पार्श्वों में अथवा मध्य में स्थित होता है वह गर्भ भी नष्ट हो जाता है ॥
रुक् सन्धिमोक्षे यस्याः स्यान्मृष्टान्ने चारुचिस्तथा। निश्चेष्टस्वप्रकामायास्तस्या गर्भो विपद्यते ।।१६४।।
जिस स्त्री के सन्धिबन्धनों में पीडा होती हो तथा अन्न में अरुचि हो एवं चेष्टा से शून्य तथा अधिक होने की इच्छा वाली उस स्त्री का गर्भ नष्ट हो जाता है ॥१६४॥
सन्धिशोथोऽङ्गपाकश्च विक्रामश्च¹ गुरुर्भवेत्। यस्यास्तस्याः सुतो जातो म्रियते नात्र संशयः ।।१६५।।
जिस स्त्री के सन्धियों में शोथ हो जाये, अङ्गों में पाक हो जाये तथा पदन्यास भारी हो जाये अर्थात् वह कष्ट पूर्वक चल सके-उसका उत्पन्न हुआ पुत्र निःसन्देह मर जाता है ।।
शोचन्त्याः परिदेविन्याः प्रध्यायिन्यास्तथैव च। अङ्गुलीस्फोटशीलाया जातः पुत्रो न जीवति ।।१६६।।
जो स्त्री गर्भावस्था में बहुत शोक, दुःख तथा चिन्ता करती हो और जो अङ्गुलियों को चटकावती रहती हो—उसका उत्पन्न हुआ पुत्र जीवित नहीं रहता है ॥१६६॥
दुर्गन्धि च पयो यस्या जटिलाश्च शिरोरुहाः । मलिनाश्च ततस्तस्या जातः पुत्रो न जीवति ।।१६७।।
जिसका दूध दुर्गन्धियुक्त हो तथा जिसके बाल जटिल तथा मैले हों उसका उत्पन्न हुआ पुत्र जीवित नहीं रहता है ॥
पूतिगन्धि मुखं यस्याः शूलं चैवोपजायते। निद्रा वाऽभिद्रवत्येनां मूढगर्भा न जीवति ।।१६८।।
जिसके मुख में से दुर्गन्धि आती हो, पेट में शूल (वेदना) होती हो तथा सदा नींद आती रहती हो-वह मूढ गर्भ वाली स्त्री जीवित नहीं रहती है।
वक्तव्य—मूढ गर्भ उस गर्भ को कहते हैं जो सम्पूर्ण अवयवों से युक्त होता हुआ भी अपत्य मार्ग में अयोग्य (अस्वाभाविक) रीति से उपस्थित हो जाये। अर्थात् Mal-Presentation of foetus को मूढगर्भ कहते हैं। कहा भी है—सर्वावयवसंपूर्णो मनोबुद्ध्यादिसंयुतः। विगुणापानसंमूढो मूढगर्भोऽभिधीयते ।। गर्भावस्था में गर्भ की स्वाभाविक स्थिति का चरक शा. अ. ६ में बड़ा सुन्दर वर्णन किया है—गर्भस्तु खलु मातुः पृष्ठाभिमुख ऊर्ध्वशिराः सङ्कुच्याङ्गान्यस्ते जरायुवृतः कुक्षौ। स चोपस्थितकाले जन्मनि प्रसूतिमारुतयोगात् परिवृत्त्यावाक्शिरा निष्क्रामत्यपत्यपथेन। एषा प्रकृतिः, विकृतिः पुनरतोऽन्यथा। अर्थात् प्रसवावस्थां में गर्भ (Vertex Presentation) से गर्भाशय से बाहर आता है। अर्थात् उसका शिर नीचे होता है तथा चूतड़ ऊपर को होते हैं। तथा क्रमशः सिर, ग्रीवा, कन्धे, ऊर्ध्वशाखायें, उदर, चूतड़ तथा अधोशाखायें क्रमशः बाहर निकलती हैं। यह उसका स्वाभाविक मार्ग है। प्रसव के समय इस उपर्युक्त अवस्था के अतिरिक्त शेष सब अवस्थायें मूढगर्भ समझी जाती हैं ॥१६८॥
मयूरग्रीवसंकाशं या पश्यति हुताशनम्। शूनपादमुखी चैव मूढगर्भा न जीवति ।।१६९।।
१. पादन्यास इत्यर्थः । दुःखेन मादन्यास इति यावत् ।