काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअन्तर्वलीचिकित्सिताध्यायः १०] खिलस्थानम् ४६३
जो गर्भिणी स्त्री अग्नि को मोर की गरदन के समान नीली देखती है तथा उसके पैर और मुख सूजे हुए हों-वह मूढगर्भ वाली स्त्री जीवित नहीं रहती है ॥१६९॥
पार्श्वशूलं च तृष्णा च संज्ञानाशस्तथैव च।
श्वासश्च वर्त्मरोधश्च यस्याः साऽपि न जीवति ॥१७०॥
जिस गर्भिणी स्त्री को पार्श्वशूल, तृष्णा, संज्ञानाश, श्वास तथा मार्गों (रसवाही अथवा अन्नमार्ग) का अवरोध हो जाय वह स्त्री भी जीवित नहीं रहती है ॥१७०॥
कटिग्रहो योनिशूलं पूतिगन्धि मुखं तथा।
संज्ञानाशः प्रलापो वा गर्भिण्याः सा न जीवति ॥१७१॥
जिस गर्भिणी स्त्री को कटिग्रह, योनिशूल, मुख से दुर्गन्धि आना, संज्ञानाश तथा प्रलाप (Delirium) हो जाय वह स्त्री जीवित नहीं रहती है ॥१७१॥
नासा तु काकवद्यस्याः स्त्रस्तनेत्रा च या भवेत्।
तथा शकुन्तगन्धा च गर्भः शस्त्रेण मुच्यते ॥१७२॥
जिस गर्भवती स्त्री की नाक कौए की तरह हो, जिसके नेत्र कांपते हों तथा जिसमें से पक्षी की गन्ध आती हो उस स्त्री का गर्भ शस्त्रों के द्वारा बाहर निकालना पड़ता है। अर्थात् उसके गर्भ को बाहर निकालने के लिये उसका आपरेशन करना पड़ता है ॥१७२॥
अजाश्वगन्धा श्वेता या मायूरं मांसमिच्छति । गर्भस्तस्यापि शस्त्रेण नार्या निर्ह्रियते नृप ! ॥१७३॥
हे राजन् ! जिस गर्भवती स्त्री में से बकरी अथवा घोड़े की गन्ध आती हो, जो सफेद (पाण्डु) हो गई हो, जो मोर का मांस खाना चाहती हो-उस स्त्री का गर्भ भी शस्त्रों के द्वारा बाहर निकालना पड़ता है ॥१७३॥
रक्तवस्त्रपरीधाना रक्तमाल्यानुलेपना । स्मयते सा शयाना वा श्मशानं याऽधिरोहति ॥१७४॥
मूढगर्भा सगर्भा वा गर्भिणी सा विनश्यति ।
जो गर्भिणी स्त्री लाल वस्त्रों को धारण करती है, लाल मालायें पहनती है, सोते हुए जो मुस्कराती है अथवा श्मशान की ओर जाती है—वह मूढगर्भ वाली स्त्री. गर्भासहित नष्ट हो जाती है ॥१७४॥
खरं वराहं महिषं श्वानमुष्ट्रं तथैव च ॥१७५॥
स्वप्नेऽधिरोहते या तु सगर्भा सा विनश्यति ।
जो गर्भवती स्त्री स्वप्न में गदहे, सूअर, भैंस, कुत्ते अथवा ऊंट की सवारी करती है-वह स्त्री गर्भासहित नष्ट हो जाती है ॥
नित्यस्नाता च मृष्टा च शुक्लवस्त्रधरा शुचिः ॥१७६॥
देवविप्रपरा सौम्या गर्भिणी तु सदा भवेत् ।
गर्भिणी स्त्री नित्य स्नान करके, शरीर पोंछकर, श्वेत वस्त्रों को धारण करके तथा पवित्र और सौम्य होकर सदा देवताओं तथा ब्राह्मणों की पूजा करे ॥१७६॥
बहुपुत्रामनन्तां च ईश्वरीं मुदितां तथा ॥१७७॥
५२ का.सं.