भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 824

४६४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११]

ब्राह्मीं च सहदेवां च तथा चैवेन्द्रवारुणीम् । जीवकर्षभकौ भार्गी समङ्गां च तथैव च ॥१७८॥ रोहपादान् वटशुङ्गानात्मगुप्तां तथैव च । अरिष्टं पूतनां केशीं शतवीर्यां च पार्थिव ! ॥१७९॥ सहस्रवीर्यां चैतानि प्राजापत्येन संहरेत् । संदधेतथ पुष्येण धारयेदुत्तरेषु च ॥१८०॥

हे राजन् ! गर्भिणी स्त्री की चाहिये कि वह कण्टकारी, अनन्तमूल, शिवलिङ्गी, ब्राह्मी, सहदेवी, इन्द्रवारुणी, जीवक, ऋषभक, भारंगी, मजीठ, रोहपाद, वटाङ्कुर, कौंच, नीम, पूतना (हरड़), केशी (सुगन्ध जटामांसी-कुछ लोक शतावरी का ग्रहण करते हैं), शतवीर्या (शतावरी) तथा सहस्रवीर्या (श्वेत दूर्वा) आदि ओषधियों को प्रजापत्य विधि से उखाड़े तथा उसके बाद पुष्य नक्षत्र में उनको धारण करे ॥१७७-१८०॥

त्रैवृत्तं तु मणिं कृत्वा तं श्रोण्यां गर्भिणी सदा । प्रजाता शिरसा राजन् ! धारयेत् कारयेत्तथा ॥१८१॥ सूतिकाया विशेषेण रक्षोघ्नानि हितानि च ।

हे राजन् ! गर्भिणी स्त्री को चाहिये कि त्रिवृत् की मणि बनाकर वह श्रोणि में धारण करे । प्रसव के बाद फिर वह उसे सिर पर धारण करे । तथा प्रसूता स्त्री के लिये विशेषरूप से हितकर एवं रक्षोघ्न विधान का पालन करना चाहिये ॥१८१॥

ज्वराद्यानां विंकाराणां यत्र यत्रेह लक्षणम् ॥१८२॥ अन्नादानां प्रवक्ष्यामि तज्ज्ञेयं गर्भिणीष्वपि । इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥१८३॥

(इति) खिलेष्वन्तर्वत्नीचिकित्सितं नाम दशमोऽध्यायः ॥१०॥


ज्वर आदि विकारों के जो २ लक्षण अन्नाद (अन्न का सेवन करने वाले-दो वर्ष से बड़े) बालकों के कहे जायेंगे गर्भिणी के भी वे ही लक्षण समझने चाहिये ।

ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१८२-१८३॥

(इति) खिलेस्त्वन्तर्वत्नीचिकित्सितं नाम दशमोऽध्यायः ॥


सूतिकोपक्रमणीयाध्याय एकादशः ।

अथातः सूतिकोपक्रमणीयं नामाध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥

अब हम सूतिकोपक्रमणीय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे । ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥

उपक्रमं तु सूतानां सविशेषमतः परम् । संप्रवक्ष्यामि कात्स्न्र्येन तन्निबोध यथाक्रमम् ॥३॥

अब मैं विस्तार से प्रसूता स्त्रियों की विशेष चिकित्सा का वर्णन करूंगा । उसे तू क्रमशः सुन ॥३॥