भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 825

सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११] खिलस्थानम् ४६५

गर्भात् प्रभृति सूतायां भिषग्भवति कार्यवान् । कथं नु काले संपूर्णे सूयेदित्यपरापर^१म् ॥४॥ प्राप्ते प्रसवकाले च भयमुत्पद्यते यतः । अस्मिन्नेकः स्थितः पादो भवेदन्यो यमक्ष^२ये ॥५॥

प्रसूता स्त्रियों में चिकित्सक गर्भ धारण काल से लेकर प्रसव पर्यन्त इसी कार्य (चिन्ता) में लगा रहता है कि कब उसे पूर्ण समय (९ मास) व्यतीत होने पर उत्तरोत्तर प्रसव हो जाये तथा प्रसव काल के उपस्थित होने पर और भी भय रहता है । उस समय उस स्त्री का एक पैर इस लोक में तथा दूसरा यमलोक में होता है । अर्थात् गर्भधारण काल से प्रारंभ करके जब तक उसे प्रसव नहीं हो जाता तब तक वैद्य को सदा यही चिन्ता लगी रहती है कि किसी प्रकार विना विघ्न के कुशलपूर्वक यह कार्य सम्पन्न हो जाय । क्योंकि तबतक सदा किसी न किसी उपद्रव का भय बना ही रहती है । तथा प्रसव की अवस्था और भी भयंकर होती है । यह समय बड़ा ही (Critical) होता है । इस समय स्त्री के लिये जीवन तथा मृत्यु का प्रश्न होता है । बहुत सी स्त्रियों को प्रसव अत्यन्त कष्टपूर्वक होता है तथा कितने को तो इस समय प्राणों तक से भी हाथ धोना पड़ता है । यह अवस्था विशेषकर प्रथम प्रसव (Primipara) में होती है । अगले प्रसवों में इतना भय नहीं रहता है ॥४-५॥

सूतायाश्चापि तत्र स्यादपरा चेन्न निर्गता । प्रसूताऽपि न सूता स्त्री भवत्येवं गते सति ॥६॥

प्रसूता स्त्री की भी यदि अपरा (Placenta) न गिरे तो उस अवस्था में प्रसूता स्त्री भी अप्रसूता के ही समान होती है । अर्थात् यदि सुखपूर्वक प्रसव होने के बाद भी किसी कारण से अपरा नहीं गिर पाती है तो सब व्यर्थ है । उसे उस अवस्था में और भी अधिक कष्ट होता है ॥६॥

दुष्प्रजातामयाः सन्ति चतुःषष्टिरिति स्थितिः । योनिर्भ्रष्टा क्षता चैव विभिन्ना मूत्रसङ्गिनी ॥७॥ सशोफस्त्राविणी चैव प्रसुप्ता वेदनावती । पार्श्वपृष्ठकटीशूलं हृदि शूलं विषूचिका ॥८॥ प्लीहा महोदरत्वं च शाखावातोऽङ्गमर्दकः । भ्रूक्षेपको हनुस्तम्भो मन्यास्तम्भोऽपतानकः । (इति ताडपत्रपुस्तके २२६ तमं पत्रम् ।) मक्कल्लो विद्रधिः शोफः प्रलापोन्मादकामलाः ॥९॥ दौर्बल्यं भ्रमली कार्श्यं भक्तद्वेषोऽविपाचकः । ज्वरातिसारौ वैसर्पश्छर्दिस्तृष्णा प्रवाहिका ॥१०॥ हिक्का श्वासश्च कासश्च पाण्डुर्गुल्यश्च रक्तजः । आनाहाध्मापने चोभे वर्चोमूत्रग्रहावपि ॥११॥ मुखरोगोऽक्षिरोगश्च प्रतिश्यायगलग्रहौ । राजयक्ष्माऽर्दितं कम्पः कर्णस्त्रावः प्रजागरः ॥१२॥ उष्णवातो ग्रहावाधस्तनरोगोऽथ रोहिणी । वाताष्ठीला वातगुल्मरक्तपित्तविचर्चिकाः ॥१३॥

दुष्प्रजाता (यदि सम्यक् प्रकार से प्रसव न हो तो उस) स्त्री को ६४ रोग होते हैं । ६४ रोगों की संख्या केवल उपलक्षण मात्र है । इससे अतिरिक्त रोग भी हो सकते हैं । वे रोग निम्नहैं— १. योनिभ्रष्ट, २. योनिक्षत, ३. योनिभेदन, ४. मूत्रसङ्ग (मूत्र की रुकावट), ५. शोथ, ६. योनि से स्राव, ७. प्रसुप्ता, (शरीर का सोया हुआ सा-सुन्न सा रहना), ८. वेदना, ९. पार्श्वशूल, १०. पृष्ठशूल, ११. कटिशूल, १२. हृच्छूल, १३. विषूचिका, १४. प्लीहा, १५. महोदर (पेट का बड़ा होना), १६. शाखावात, १७. अङ्गमर्द, १८. भ्रूक्षेप, १९. हनुस्तम्भ, २०. मन्यास्तम्भ, २१. अपतानक, २२. मक्कल्ल (After pains), २३. विद्रधि, २४. शोफ, २५. प्रलाप, २६. उन्माद, २७. कामला, २८. दुर्बलता, २९. भ्रम (शिरोभ्रम आदि), ३०. कृशता, ३१. भक्तद्वेष (भोजन में अरुचि), ३२. अविपाक (भोजन का न पचना), ३३.


१. उत्तरोत्तरमित्यर्थः ।
२. यमलोके इत्यर्थः ।