भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

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पृष्ठ 826

४६६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११]

ज्वर, ३४. अतिसार, ३५. विसर्प, ३६ छर्दि (वमन), ३७. तृष्णा, ३८. प्रवाहिका, ३९. हिक्का, ४०. श्वास, ४१. कास, ४२. पाण्डु ४३. रक्तगुल्म, ४४. आनाह, ४५. आध्मान, ४६. वर्चोग्रह (मलबन्ध), ४७. मूत्रग्रह, ४८. मुखरोग, ४९. अक्षिरोग, ५०. प्रतिश्याय, ५१. गलग्रह, ५२. राजयक्ष्मा, ५३. अर्दित, ५४. कम्पन, ५५. कर्णस्राव, ५६. प्रजागर (Insomnia), ५७. उष्णवात, ५८. ग्रहाबाध (ग्रहरोगों का भय), ५९. स्तनरोग, ६०. रोहिणी, ६१. वाताष्ठीला, ६२. वातगुल्म, ६३. रक्तपित्त, ६४. विचर्चिका ॥७-१३॥

इत्येते सूतिकारोगाश्चतुःषष्टिरुदाहृताः । तेभ्यः सर्वेभ्य एवासौ रक्षितव्या कथं त्विति ॥१४॥

इस प्रकार ये ६४ रोग कहे गये हैं । उन सब रोगों से उस प्रसूता स्त्री की किस प्रकार रक्षा की जाय यह एक विचारणीय प्रश्न होता है ॥१४॥

तद्विदामपि संमोहो भिषजामुपजायते । किं पुनर्य्येऽल्पमतयः परतन्त्रोपशिक्षिताः ॥१५॥

इस विषय में ज्ञानी वैद्यों को भी मतिभ्रम हो जाता है, तब जो कम बुद्धि वाले हैं तथा जिन्होंने दूसरे सम्प्रदायों के ग्रन्थों से शिक्षा ग्रहण की है उनका तो फिर कहना ही क्या है ।

तस्मात् सुनिश्चितार्थेन तद्विद्येनाऽनुदर्शिना । अप्रमत्तेन संभाव्यं सूतिकानामुपक्रमे ॥१६॥

इसलिये प्रसूता स्त्रियों में वैद्य को निश्चित अर्थ (विषय) को जानने वाला, तद्विद्य, अनुदर्शी (सब कुछ देखने वाला) होना चाहिये तथा सावधान हो कर चिकित्सा करनी चाहिये ।

तदुपक्रमसामान्यं विशेषापक्रमं तथा । वक्ष्यामि व्यासतो देशविदेशकुलसात्म्यतः ॥१७॥

अब मैं देश, विदेश तथा कुल सात्म्य के अनुसार उनकी सामान्य तथा विशेष चिकित्सा को कहूंगा ॥१७॥

प्रजातमात्रामाश्वास्यसूतां शक्ला¹ विजा(प्रसा)विका(?) । न्युब्जां शयानां संवाह्य पृष्ठे संश्लिष्य कुक्षिणा ॥१८॥ पीडयेद्धृष्टमुदरं गर्भदोषप्रवृत्तये । महताऽदुष्टपट्टेन कुक्षिपाश्र्वें च वेष्टयेत् ॥१९॥ तेनोदरं स्वसंस्थानं याति वायुश्च शाम्यति ।

प्रसव कराने वाली स्त्री को चाहिये कि वह मधुर भाषण करने वाली हो तथा वह प्रसव होते ही प्रसूता को आश्वासन देकर अधोमुख लेटी हुई उस प्रसूता की पीठ में संवाहन (मुट्ठी या चापी मारना-धीरे २ दबाना) करके फिर गर्भ के बाद बचे हुए दोषों को निकालने के लिये कुक्षि पर मालिश करके ढीले हुए पेट का पीडन करे-उसे दबाये । फिर एक साफ सुथरा कपड़ा कुक्षि के चारों ओर लपेट दे । इससे ढीला हुआ पेट अपने स्थान पर चला जाता है तथा वायु की शान्ति हो जाती है । अर्थात् पेट को बांध देने से वह ढीला नहीं रहता जिससे वायु का प्रवेश नहीं हो सकता है । तथा इससे ढीली हुई उदर की मांसपेशियों को बहुत आराम मिलता है । इसी प्रकार चरक शा. अ. ८ में भी कहा है ॥१८-१९॥

चर्मावनद्धामासन्दीं बलातैलोष्णपूरिताम् ॥२०॥ अप्यासीत सदा सूता तथा योनिः प्रसीदति । प्रियङ्गुकानां कृसरैः स्वभ्यक्तां स्वेदयेत्ततः ॥२१॥

प्रसूता स्त्री को चाहिये कि वह एक गरम २ बला तैल से भरी हुई तथा चमड़े से मढ़ी हुई आसन्दी (लघु खट्टिका) में बैठे । इससे उसकी योनि निर्मल हो जाती है । उसके बाद तैल की मालिश करके प्रियङ्गु आदि की गरम २ कृशरा (खिचड़ी) बनाकर उससे उसका स्वेदन करे ।


१. 'शल्कः प्रियंवदे' इत्यमरः, प्रियवदा प्रसाविका इति स्यात् ।

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