भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 827

सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११] खिलस्थानम् ४६७

वक्तव्य—कृशरा की परिभाषा भावप्रकाश में निम्न दी है—तण्डुला दालिसंमिश्रा लवणार्द्रकहिंंगुभिः । संयुक्ताः सलिले सिद्धाः कृशरा कथिता बुधैः ॥ यवागू की विधि से ही इसे पकाना चाहिये ॥२०-२१॥

स्विन्नामुष्णाम्बुना स्नातां विश्रान्तां विगतक्लमाम् । कुष्ठगुग्गुल्वल्वगुरुभिर्धूपयेद्घृतसंयुतैः ॥२२॥

तदुपरान्त स्वेदन हो जाने के बाद उसे उष्ण जल से स्नान कराके विश्राम देकर थकावट दूर हो जाने के बाद कुष्ठ, गूगल तथा अगर को घृत में मिलाकर उससे शरीर का धूपन करना चाहिये ॥२२॥

ततोऽग्निबलव(वि)द्वीक्ष्य त्र्यहं पञ्चाहमेव वा । मण्डानुपानमन्वक्षं पिबेत् स्नेहं हिताशिनी ॥२३॥

तब अग्निबल को जानने वाली स्त्री को अपनी अवस्था देख कर तीन या पांच दिन तक मण्ड का सेवन करना चाहिये । इसके बाद हितकर भोजन करने वाली स्त्री को स्नेह का पान करना चाहिये । यवादि से सिद्ध किये हुए सिक्थ (ठोस भाग) से रहित द्रव को मण्ड कहते हैं । सुश्रुत सू. अ. ४६ में कहा है—सिक्थकैर्विरहितो मण्डः ....... मदनपालनिघण्टु में कहा है—"मण्डश्र्चतुर्दशगुणे सिद्धस्तोये त्वसिक्थकः । उसे Barm of Barley or Rice कह सकते हैं ॥२३॥

स्नेहव्युपरमेऽश्रीयादल्पस्नेहामसैन्धवाम् । यवागूं त्र्यहमेवात्र पिप्पलीनागराश्रिताम् ॥२४॥ स्याद्व्यपेतौषधा पश्चात् सस्नेहलवणोत्तरा ।

स्नेह के जीर्ण हो जाने पर तीन दिन तक पिप्पली और सोंठ से बनी हुई यवागू का सेवन करना चाहिये जिसमें थोड़ा स्नेह डला हुआ हो तथा लवण बिलकुल न हो । तथा उसके बाद ओषधियों से बनी हुई तथा जिसमें स्नेह और लवण पर्याप्त मात्रा में डला हो—यवागू का सेवन करना चाहिये । चरक शा. अ. ८ में कहा है—जीर्णे तु स्नेह पिप्पल्यादिभिरेव सिद्धां यवागूं सुस्निग्धां द्रवां मात्रशः पाययेत् ॥२४॥

कुलत्थयूषः सस्नेहलवणाम्लस्ततः परम् ॥२५॥ तथैव जाङ्गलरसः शाकानीमानि चाप्यतः । घृतभृष्टानि कूष्माण्डमूलकैर्वारुकाणि च ॥२६॥

फिर स्नेह, लवण और अम्ल (खटाई) डला हुआ कुलत्थ का यूष तथा जांगल मांसरस का सेवन करे । उसके बाद फिर घी में तले हुए कूष्माण्ड, मूली तथा ककड़ी Cucumber के शाक खाये ॥२५-२६॥

स्नेहस्वेदौ च सेवेत मासमेकममन्दि्रता । उष्णोदकोपचारं च स्वस्थवृत्तमतः परम् ॥२७॥

प्रसव के बाद उस स्त्री को एक मास तक प्रमाद रहित हो कर स्नेहन, स्वेदन तथा उष्णजल का सेवन करना चाहिये । इसके बाद स्वस्थ व्यक्ति के आहार-विहार का सेवन करे । अर्थात् प्रसव के बाद एक मास तक उपर्युक्त विशेष आहार-विहार आदि का सेवन करना चाहिये । तदुपरान्त वह एक स्वस्थ व्यक्ति के समान सामान्य आहार-विहार का ग्रहण कर सकती है । इस एक मास तक वह प्रसूता कहलाती है ॥२७॥

त्रिविधं देशमाश्रित्य वक्ष्यामि त्रिविधं विधिम् । आनूपदेशे भूयिष्ठं वातश्लेष्मात्मका गदाः ॥२८॥ तत्राभिष्यन्दभूयस्त्वादादौ स्नेहो विगर्हितः । मण्डादिरत्र कर्तव्यः संसर्गोऽग्निबलावहः ॥२९॥ स्वेदो निवातशयनं सर्वमुष्णं च शस्यते ।

तीन प्रकार के देश के अनुसार मैं तीन प्रकार के स्वस्थवृत्त का वर्णन करूंगा । देश तीन प्रकार का होता है—१. आनूप, २. जांगल, ३. साधारण सुश्रुत सू. अ. ३५ में कहा है—'देशस्त्वानूपो जाङ्गलः साधारण इति' । आनूपदेश—आनूपदेश में मुख्यरूप से वात तथा कफ के रोग होते हैं । वहां पर क्लेद की प्रधानता से प्रारम्भ में स्नेह निन्दित माना