भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 828
४६८काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११]

गया है। इस अवस्था में अग्नि-बल को बढ़ाने वाला मण्ड आदि का संसर्जन क्रम कराना चाहिये। वहां पर स्वेद, निवात (जहां सीधी हवा न आती हो) स्थान में शयन तथा आहार-विहार आदि सम्पूर्ण उष्ण विधि करनी चाहिये। आनूप देश से अभिप्राय जल प्रधान स्थान से है। सुश्रुत सू. अ. ३५ में कहा है—'तत्र बहूदकनिम्नोन्नतनदीवर्षगहनो मृदुशीतानिलो बहुमहापर्वतवृक्षो मृदुसुकुमारोपचितशरीरमनुष्यप्रायः कफवातरोगभूयिष्ठश्चानूपः'।'

नियतं जाङ्गले देशे वातपित्तात्मका गदाः ।।३०।।
तदत्र स्नेहसात्म्यत्वात् स्नेहादिः स्यादुपक्रमः। कार्यः प्रजातमात्राया विशेषश्चात्र बुध्यते ।।३१।।

जांगल देश—जांगल देश में वात और पित्त के रोग होते हैं। यहां पर स्नेह शरीर के लिये सात्म्य होने के कारण सद्यः प्रसूता स्त्री की स्नेह आदि के द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये। उसका विशेष विवरण आगे दिया जायगा। जांगल देश उसे कहते हैं जहां जलीय अंश की कमी हो तथा जंगल भूयिष्ठ हो। सुश्रुत सू. अ. ३५ में कहा है—'आकाशसमः प्रविरलाल्पकण्टकिवृक्षप्रायोऽल्पवर्षप्रस्रवणोदपानोदकप्राय उष्णदारुणवातः प्रविरलाल्पशैलः स्थिरकृशशरीरमनुष्यप्रायो वातपित्तरोगभूयिष्ठश्च जाङ्गलः'।।

कुमारप्रसवे तैलं कुमारीप्रसवे घृतम्। पिबेज्जीर्णे यवागूं च दीपनीयोपसंस्कृताम् ।।३२।।
पञ्चाहं सप्तरात्रं वा ततो मण्डाद्युपक्रमः।

प्रसूता स्त्री को पुत्र उत्पन्न होने पर तैल तथा पुत्री उत्पन्न होने पर घृत का पान करना चाहिये तथा घृत के जीर्ण होने पर पांच या सात दिन तक दीपनीय द्रव्यों से सिद्ध की हुई यवागू पीनी चाहिये। उसके बाद मण्ड आदि का क्रम होना चाहिये ।।३२।।

देशे साधारणे चास्या हितः साधारणो विधिः ।।३३।।

साधारण देश—साधारण देश में प्रसूता स्त्री के लिये साधारण विधि हितकर होती है। साधारण देश का लक्षण सुश्रुत में कहा है—'उभयदेशलक्षणः साधारण इति'। अर्थात् आनूप और जांगल दोनों के लक्षण जिसमें विद्यमान हों उसे साधारण समझा जाता है ।।३३।।

वैदेश्याश्च प्रयच्छन्ति विविधा म्लेच्छजातयः। रक्तं मांसस्य निर्यूहं कन्दमूलफलानि च ।।३४।।

अनेक विदेशी म्लेच्छ जाति के लोग इस अवस्था में रक्त, मांसनिर्यूह तथा कन्द मूल-फल आदि का व्यवहार कराते हैं।

कुलसात्म्यं च बुध्येत यस्मिन् यस्मिन् यथा यथा। औचित्यात् कुलसात्म्यस्य तत्तथैवानुवर्तते ।।३५।।

जिस २ देश में जैसा २ कुलसात्म्य हो उसके औचित्य को देखकर उसके अनुसार वैसा २ आचरण किया जाता है। अर्थात् जिस कुल या देश में जो व्यवहार उचित समझा जाता है अथवा जिसका प्रचलन हो–उसके अनुसार ही आचरण करना चाहिये ।।३५।।

अतो नैकान्तिकत्वाच्च सूतिकोपक्रमस्य च। देशं च जातिसात्म्यं च संप्रधार्य प्रयोजयेत् ।।३६।।

इसलिये सूतिका (प्रसूता स्त्री) की चिकित्सा को एकान्तिक (एकदेशीय) न समझे तथा देश और जाति सात्म्य को दृष्टि में रखते हुए उनका प्रयोग करे ।।३६।।

उक्तं तद्व्याधिभैषज्यं दुष्प्रजातोपचारिके। केषांचिदिह वक्ष्यामि व्याधीनामत उत्तरम् ।।३७।।