भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 829

सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११] खिलस्थानम् ४६९

दुष्प्रजाता स्त्री के उपचारों में उन २ रोगों की चिकित्सा दी गई है। यहां मैं कुछ थोड़े से रोगों की चिकित्सा का वर्णन करूंगा ॥३७॥

सर्वेषामेव रोगाणां ज्वरः कष्टतमो मतः । तदस्यादौ विधिं वक्ष्ये निदानाकृतिभेषजैः ।।३८।।

सम्पूर्ण रोगों में ज्वर सबसे अधिक कष्टदायी रोग माना जाता है। इसलिये सबसे पहले मैं निदान, आकृति तथा ओषधि के द्वारा उस ज्वर की चिकित्सा का वर्णन करूंगा ॥३८॥

षड्विधस्तु प्रसूतानां नारीणां जायते ज्वरः । निजागन्तुविभागेन निदानं तस्य मे शृणु ।।३९।।

निज तथा आगन्तु भेद से प्रसूता स्त्रियों को ६ प्रकार का ज्वर हुआ करता है। उस ज्वर का तू कारण सुन।

वक्तव्य—इसी अध्याय में आगे निम्न ६ ज्वर दिये हैं—१. वातिक, २. पैत्तिक, ३ श्लैष्मिक, ४. सान्निपातिक, ५. स्तन्योत्थ, ६. ग्रहोत्थ ॥३९॥

वेगसंधारणाद्रौक्ष्याद्व्यायामादत्यसृक्क्षयात् । शोकादत्यग्निसंतापात् कट्वम्लोष्णातिसेवनात् ।।४०।।
दिवास्वप्नात् पुरोवाताद्गुर्विष्यन्दिभोजनात् । स्तन्यागमाद्ग्रहाबाधादजीर्णाद्दुष्प्रजायनात् ।।४१।।
ज्वरः संजायते नार्याः षड्विधो हेतुभेदतः ।

ज्वर का निदान—उपस्थित वेगों को रोकने, रूक्षता, व्यायाम, रक्त के अत्यधिक क्षय, शोक, अधिक अग्नि की गर्मी, अधिक कटु एवं अम्ल रस युक्त तथा उष्ण द्रव्यों के सेवन, दिवा स्वप्न, पुरोवात (पूर्व दिशा की वायु), गुरु और अभिष्यन्दि भोजन, दुग्ध की उत्पत्ति, ग्रहाबाधा (ग्रह रोगों का भय), अजीर्ण, तथा सम्यक् प्रकार से प्रसव न होने इत्यादि कारणों से प्रसूता स्त्रियों को कारण के भेद के अनुसार ६ प्रकार का ज्वर हो जाता है ॥४०-४१॥

स एव पूर्वरूपेषु व्यभिचीर्णो विरोधिभिः ।।४२।।
संसृष्टैः स्नेहशीताम्बुस्नानपानाशनादिभिः । सन्निपातज्वरो घोरो जायते दुरुपक्रमः ।।४३।।

इन्हीं छओं प्रकार के ज्वरों के पूर्वरूप—इन ज्वरों के पूर्वरूप—स्नेह, शीतल जल, स्नान पान तथा अशन (भोजन) आदि परस्पर मिले हुए विरोधी कारणों से परस्पर एकदम मिले हुए होते हैं। अर्थात् उन ६ प्रकार के ज्वरों के पूर्वरूप परस्पर इतने अधिक मिले हुए होते हैं कि केवल पूर्वरूपों को देखकर उन्हें पृथक् करना अत्यन्त कठिन होता है। इनमें से सन्निपात ज्वर अत्यन्त भयंकर होता है तथा उसकी चिकित्सा भी अत्यन्त कठिनता से हो सकती है ॥४२-४३॥

तस्य तीव्राभिरावीभिः प्रततं वाहनश्रमैः । शैथिल्यं चागते देहे संक्षुब्धेष्वनिलादिषु ।।४४।।
क्लान्तेष्विन्द्रियमार्गेषु सारशून्येषु धातुषु । एकोऽपि दोषः कुपितः कृच्छ्रतो वहते महत् ।।४५।।

उस प्रसूता स्त्री की तीव्र आवियों (प्रसवकालीन वेदनाओं-Labour-Pains) से, नौ मास तक निरन्तर गर्भ को धारण किये रहने के श्रम से, (प्रसव के बाद) देह के शिथिल हो जाने के कारण, वातादि दोषों के प्रकुपित हो जाने से, सम्पूर्ण इन्द्रियों के मार्गों के (प्रसव के कारण) थक जाने से तथा सम्पूर्ण शरीर की धातुओं के प्रसव के बाद रहित हो जाने से (चरक में कहा है—विशेषतो हि शून्यशरीराः स्त्रियः प्रजाता भवन्ति) यदि एक भी दोष प्रकुपित हो जाय तो वह इस शरीर को बड़े कष्टपूर्वक धारण करती है ॥४४-४५॥

परिजीर्णं यथा वस्त्रं मलदिग्धं समन्ततः । क्लेशेन शोध्यते तज्ज्ञैः प्रदृश्य तत्तदाश्रयम् ।।४६।।
तथा शरीरं सूतायाः परिक्लिष्टं परिस्रुतम् । भृशं दोषबलैर्दिग्धं क्लेशेन परिशोध्यते ।।४७।।