भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 830

४७० | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११]

जिस प्रकार अत्यन्त जीर्ण वस्त्र चारों ओर से मैला होने पर उस वस्त्र के आश्रय को दृष्टि में रखते हुए धोने वाले अत्यन्त कठिनता से साफ कर पाते हैं उसी प्रकार प्रसूता स्त्री के शरीर का थके हुए एवं परिस्रुत (प्रसव के समय शरीर में से बहुत से स्त्राव निकल जाते हैं) होने के कारण तथा वातादि दोषों के बल से क्षीण होने के कारण अत्यन्त कठिनता से शोधन किया जा सकता है ॥४६-४७॥

यथा च जीर्णं भवनं सर्वतः श्लथबन्धनम्।
(इति ताडपत्रपुस्तके २२७ तमं पत्रम्।)
वर्षवातविकम्प्यानामसहं स्यात्तथाविधम् ॥४८॥
तथा शरीरं सूतायाः खिन्नं प्रस्त्रवणश्रमैः । वातपित्तकफोत्यानां व्याधीनामसहं भवेत् ॥४९॥

अथवा जिस प्रकार प्राचीन मकान सम्पूर्ण बन्धन ढीले हो जाने के कारण वर्षा, वायु तथा भूकम्प आदि को सहन नहीं कर सकते हैं अर्थात् तीव्र वर्षा, वायु आदि में ढह जाते हैं उसी प्रकार प्रसूता स्त्री का शरीर भी प्रसव के श्रम से खिन्न होने के कारण वात, पित्त तथा कफ से उत्पन्न होनेवाले रोगों को सहन नहीं कर सकता है अर्थात् उनसे आक्रान्त हो जाता है ॥४८-४९॥

दोषैरेव शरीराणि धार्यन्ते सर्वदेहिनाम् । तेषु क्षीणेषु सूताया ज्वरः संतापलक्षणः ॥५०॥
देहं सन्तापयत्याशु शुष्केन्धनमिवानलः ।

वातादि दोषों के द्वारा ही सम्पूर्ण प्राणियों के शरीर धारण किये जाते हैं। प्रसूता में इन दोषों के अपने योग्य परिमाण से क्षीण हो जाने पर ताप (उष्णता-Heat) लक्षणवाला ज्वर हो जाता है। जिस प्रकार अग्नि शुष्क ईन्धन को जला देती है उसी प्रकार यह ज्वर भी सारे शरीर में सन्ताप उत्पन्न कर देता है। वात, पित्त, कफ तीनों दोष मिलकर शरीर का धारण करते हैं-इसीलिये इन्हें धातु भी कहते हैं। इसी प्रकार सुश्रुत सू. अ. २१ में भी कहा है ॥५०॥

तद्धेतुमात्रवृद्धानां दोषाणां तु यथोच्छ्रयम् ॥५१॥
कुर्यादुपशमं धीमान् धातूनां च प्रसादनम् ।

बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि साधारण कारणों से भी बढ़े हुए दोषों की शान्ति करे तथा शरीर की धातुओं का प्रसादन करे ॥५१॥

षड्भिर्मासैः प्रसूताया धातवो रुधिरादयः ॥५२॥
प्रत्यागच्छन्त्यरोगाया यथास्वं परिसंस्थितिम् । एतच्चान्यच्च संचिन्त्य चिकित्सां संप्रयोजयेत् ॥५३॥

रोग रहित होने पर प्रसूता स्त्री की रक्त आदि धातुएं ६ मास के अन्दर पुनः अपनी पूर्व स्वाभाविक अवस्था में लौट आती हैं। इन सब बातों को दृष्टि में रखते हुए प्रसूता स्त्री की चिकित्सा करनी चाहिये। अर्थात् प्रसव के बाद ६ मास तक प्रसूता स्त्री के दोष तथा शारीरिक धातुयें अपनी २ पूर्व अवस्था में नहीं पहुंच पाती हैं। धीरे २ करके लगभग ६ मास में वे अपनी पूर्वस्वाभाविक अवस्था में पहुंच पाती हैं ॥५२-५३॥

अतः परं ज्वराणां तु लक्षणं संप्रवक्ष्यते । विषमोष्माऽङ्गमर्दश्च जृम्भथू रोमहर्षणम् ॥५४॥
कषायविरसास्यत्वं शीतद्वेषोष्णाकामते । दन्तहर्षः प्रलापश्च शुष्कोद्गारः प्रजागरः ॥५५॥
आध्मानमङ्गसंकोचो वातज्वरनिदर्शनम् ।