भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११] खिलस्थानम् ४७१

इसके बाद अब ज्वरों के लक्षण कहे जायेंगे—वातज्वर के लक्षण—शरीर में विषमरूप से ऊष्मा (उष्णतातापांश) का होना अर्थात् कभी तापांश अधिक होता है कभी कम अथवा शरीर के किसी अवयव में तापांश कम होता है किसी में अधिक, अङ्गमर्द (अङ्गों का टूटना), जंभाई, रोमहर्ष, मुख का स्वाद कषाय अथवा विरस (फीका) होना, शीत का अच्छा न लगना, उष्णता को चाहना, दन्तहर्ष, प्रलाप (Delirium), सूखी डकार, निद्रा न आना, आध्मान तथा अङ्गसंकोच (अङ्गों का सुकड़ जाना)—ये वातज्वर के लक्षण होते हैं ॥५४-५५॥

तृष्णा दाहः प्रलापश्च वमथुः कटुकास्यता ॥५६॥
पीतास्यनखदन्ताक्षिविण्मूत्रत्वं च लक्ष्यते । कण्ठस्य शोषः सर्वं च प्रदीप्तमिव मन्यते ॥५७॥
भ्रमः शीताभिलाषश्च पित्तज्वरनिदर्शनम् ।

पित्तज्वर के लक्षण—प्यास, शरीर में दाह, प्रलाप, वमन, मुख का स्वाद कड़वा होना, मुख, नख, दांत, आंखें, मल तथा मूत्र का रंग पीला होना (पित्त के कारण), कण्ठशोष (गले का सूखना), ऐसा प्रतीत होना मानों सम्पूर्ण शरीर जल रहा है, भ्रम (चक्कर) तथा शीत पदार्थों की इच्छा करना—ये सब पित्त ज्वर के लक्षण हैं ॥५६-५७॥

उष्णाभिकामता कासः शिरोरुग्गात्रगौरवम् ॥५८॥
मन्दोष्मता प्रतिश्यायः शुक्लमूत्रपुरीषता । निद्रा तन्द्रीर्हिमद्वेषः ष्ठीवनं मधुरास्यता ॥५९॥
गात्रसादोऽन्नविद्वेषः कफज्वरनिदर्शनम् ।

श्लेष्म ज्वर के लक्षण—उष्ण पदार्थों की इच्छा करना, कास, शिर में वेदना, शरीर का भारी होना, शरीर में तापांश (Temperature) की कमी, प्रतिश्याय, मूत्र तथा मल का रंग सफेद होना, अधिक नींद आना, तन्द्रा (आलस्य), शीतपदार्थों से द्वेष अर्थात् उनकी इच्छा न करना, बार २ थूकना, मुख का स्वाद मीठा होना, शरीर का अवसाद अर्थात् शरीर का भारी होना तथा अन्न में रुचि न होना—ये सब श्लेष्म ज्वर के लक्षण हैं ॥५८-५९॥

मुहुः शीतं मुहुर्दाहो मुहुरूष्मा समोऽसमः ॥६०॥
कृच्छ्रविण्मूत्रवातत्वं वाताङ्गान्‍त्रा¹भिसंजनम् । दाहस्तृष्णा प्रलापश्च पित्ताद्विक्षिप्तचित्तता ॥६१॥
गुरुत्वं कण्ठसंरोधः कफाच्च प्रतिशीत²ता । सन्निपातज्वरस्यैतल्लक्षणं समुदाहृतम् ॥६२॥

सन्निपात ज्वर के लक्षण—कभी शीत लगता है, कभी दाह होती है, तापांश भी कभी सम तथा कभी विषम हो जाता है, मल, मूत्र तथा वायु कष्ट से सरंते हैं तथा वायु के कारण अङ्गों तथा आंतों में कष्ट का अनुभव होता है। पित्त के कारण इसमें दाह, तृष्णा, प्रलाप होते हैं तथा चित्त (मन) विक्षिप्त रहता है। तथा कफ के कारण शरीर भारी रहता है, गला रुक जाता है तथा सर्दी पर पुनः सर्दी लगती है। ये सन्निपात ज्वर के लक्षण कहे गये हैं ॥६०-६२॥

तृतीयेऽह्नि चतुर्थे वा नार्याः स्तन्यं प्रवर्तते । पयोवहानि स्रोतांसि संवृतान्यभिघट्टयेत् ॥६३॥
करोति स्तनयोः स्तम्भं पिपासां हृदयद्रवम् । कुक्षिपार्श्वकटीशूलमङ्गमर्दं शिरोरुजाम् ॥६४॥
एतत् स्तन्यागमोत्थस्य ज्वरस्योक्तं स्वलक्षणम् । स हि पीयूषसंशुद्धौ क्रममात्रेण तिष्ठति ॥६५॥

स्तन्योत्पत्ति के कारण होने वाले ज्वर के लक्षण (Milkfever or fever of Lactation)—प्रसूता स्त्री के तीसरे या चौथे दिन स्तनों में दूध आता है (प्रथम तीन दिन तक स्तनों से शुद्ध दूध नहीं निकलता अपितु खीस या Collustrum नामक गाढ़ा द्रव्य निकलता है जो गुरु होने के कारण रेचक होता है)। इससे दुग्धवाही स्रोतों के मार्ग


१. वातेन अङ्गानामन्त्राणां चाऽभिधर्षणमित्यर्थः ।
२. शैत्योपरि शैत्यमित्यर्थः ।