काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११] खिलस्थानम् ४७१
इसके बाद अब ज्वरों के लक्षण कहे जायेंगे—वातज्वर के लक्षण—शरीर में विषमरूप से ऊष्मा (उष्णतातापांश) का होना अर्थात् कभी तापांश अधिक होता है कभी कम अथवा शरीर के किसी अवयव में तापांश कम होता है किसी में अधिक, अङ्गमर्द (अङ्गों का टूटना), जंभाई, रोमहर्ष, मुख का स्वाद कषाय अथवा विरस (फीका) होना, शीत का अच्छा न लगना, उष्णता को चाहना, दन्तहर्ष, प्रलाप (Delirium), सूखी डकार, निद्रा न आना, आध्मान तथा अङ्गसंकोच (अङ्गों का सुकड़ जाना)—ये वातज्वर के लक्षण होते हैं ॥५४-५५॥
तृष्णा दाहः प्रलापश्च वमथुः कटुकास्यता ॥५६॥
पीतास्यनखदन्ताक्षिविण्मूत्रत्वं च लक्ष्यते । कण्ठस्य शोषः सर्वं च प्रदीप्तमिव मन्यते ॥५७॥
भ्रमः शीताभिलाषश्च पित्तज्वरनिदर्शनम् ।
पित्तज्वर के लक्षण—प्यास, शरीर में दाह, प्रलाप, वमन, मुख का स्वाद कड़वा होना, मुख, नख, दांत, आंखें, मल तथा मूत्र का रंग पीला होना (पित्त के कारण), कण्ठशोष (गले का सूखना), ऐसा प्रतीत होना मानों सम्पूर्ण शरीर जल रहा है, भ्रम (चक्कर) तथा शीत पदार्थों की इच्छा करना—ये सब पित्त ज्वर के लक्षण हैं ॥५६-५७॥
उष्णाभिकामता कासः शिरोरुग्गात्रगौरवम् ॥५८॥
मन्दोष्मता प्रतिश्यायः शुक्लमूत्रपुरीषता । निद्रा तन्द्रीर्हिमद्वेषः ष्ठीवनं मधुरास्यता ॥५९॥
गात्रसादोऽन्नविद्वेषः कफज्वरनिदर्शनम् ।
श्लेष्म ज्वर के लक्षण—उष्ण पदार्थों की इच्छा करना, कास, शिर में वेदना, शरीर का भारी होना, शरीर में तापांश (Temperature) की कमी, प्रतिश्याय, मूत्र तथा मल का रंग सफेद होना, अधिक नींद आना, तन्द्रा (आलस्य), शीतपदार्थों से द्वेष अर्थात् उनकी इच्छा न करना, बार २ थूकना, मुख का स्वाद मीठा होना, शरीर का अवसाद अर्थात् शरीर का भारी होना तथा अन्न में रुचि न होना—ये सब श्लेष्म ज्वर के लक्षण हैं ॥५८-५९॥
मुहुः शीतं मुहुर्दाहो मुहुरूष्मा समोऽसमः ॥६०॥
कृच्छ्रविण्मूत्रवातत्वं वाताङ्गान्त्रा¹भिसंजनम् । दाहस्तृष्णा प्रलापश्च पित्ताद्विक्षिप्तचित्तता ॥६१॥
गुरुत्वं कण्ठसंरोधः कफाच्च प्रतिशीत²ता । सन्निपातज्वरस्यैतल्लक्षणं समुदाहृतम् ॥६२॥
सन्निपात ज्वर के लक्षण—कभी शीत लगता है, कभी दाह होती है, तापांश भी कभी सम तथा कभी विषम हो जाता है, मल, मूत्र तथा वायु कष्ट से सरंते हैं तथा वायु के कारण अङ्गों तथा आंतों में कष्ट का अनुभव होता है। पित्त के कारण इसमें दाह, तृष्णा, प्रलाप होते हैं तथा चित्त (मन) विक्षिप्त रहता है। तथा कफ के कारण शरीर भारी रहता है, गला रुक जाता है तथा सर्दी पर पुनः सर्दी लगती है। ये सन्निपात ज्वर के लक्षण कहे गये हैं ॥६०-६२॥
तृतीयेऽह्नि चतुर्थे वा नार्याः स्तन्यं प्रवर्तते । पयोवहानि स्रोतांसि संवृतान्यभिघट्टयेत् ॥६३॥
करोति स्तनयोः स्तम्भं पिपासां हृदयद्रवम् । कुक्षिपार्श्वकटीशूलमङ्गमर्दं शिरोरुजाम् ॥६४॥
एतत् स्तन्यागमोत्थस्य ज्वरस्योक्तं स्वलक्षणम् । स हि पीयूषसंशुद्धौ क्रममात्रेण तिष्ठति ॥६५॥
स्तन्योत्पत्ति के कारण होने वाले ज्वर के लक्षण (Milkfever or fever of Lactation)—प्रसूता स्त्री के तीसरे या चौथे दिन स्तनों में दूध आता है (प्रथम तीन दिन तक स्तनों से शुद्ध दूध नहीं निकलता अपितु खीस या Collustrum नामक गाढ़ा द्रव्य निकलता है जो गुरु होने के कारण रेचक होता है)। इससे दुग्धवाही स्रोतों के मार्ग
१. वातेन अङ्गानामन्त्राणां चाऽभिधर्षणमित्यर्थः ।
२. शैत्योपरि शैत्यमित्यर्थः ।
४७२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११]
बन्द हो जाते हैं जिससे स्तनों में स्तम्भ (अकड़ाहट), पिपासा, हृदयद्रव (Palpitation of the Heart), कुक्षिशूल, पार्श्वशूल, कटिशूल, अङ्गमर्द तथा शिरोवेदना हो जाती है। ये स्तन्योत्पत्ति के कारण उत्पन्न ज्वर के अपने लक्षण कहे गये हैं। तथा दूध का शोधन होने पर क्रमशः ज्वर शान्त हो जाता है ॥६३-६५॥
ग्रहावलोकितत्रासवाताघातावधूननैः । ज्वर्यते चेत् प्रसूता स्त्री तस्य वक्ष्यामि लक्षणम् ॥६६॥ उद्वेपको निष्ठननं चक्षुषो विभ्रमः श्रमः । कम्पनं हस्तनेत्राणां हारिद्रमुखनेत्रता ॥६७॥ क्षणेन श्यावताऽज्ञानं क्षणेन च सवर्णता । सुप्रबोधः सह .... क्रोशः केशलुञ्चनम् ॥६८॥ पवनज्वररूपाणि भूयिष्ठानि करोति च । विधिर्ग्रहघ्नोऽस्य हितः क्रमो यश्चानिलज्वरे ॥६९॥
ग्रहोत्थ ज्वर के लक्षण—ग्रहों के देखने से, भय से, वायु के कारण और आघात तथा कम्पन के कारण यदि प्रसूता स्त्री को ज्वर हो जाय तो उसके लक्षण मैं कहूंगा। वे निम्न होते हैं—शरीर में वेपथु, अङ्गों में पीडा, नेत्रविभ्रम, थकावट तथा हाथों और नेत्रों में कम्पन होता है, मुख तथा नेत्रों का वर्ण हारिद्र (पीला-हल्दी के समान) हो जाता है। क्षण भर में अङ्ग कृष्णवर्ण के हो जाते हैं तथा अगले क्षण ही वर्ण ठीक हो जाता है, उस समय उसे अच्छी प्रकार ज्ञान होता है, वह चिल्लाती है, बालों को नोचती है तथा विशेषरूप से वातज्वर के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। इस अवस्था में ग्रहनाशक उपचार तथा वातज्वर की चिकित्सा करनी चाहिये ॥६६-६९॥
श्लेष्माभिष्यन्दिनीं स्थूलामक्लिन्नामल्पनिःस्रुताम् । विदग्धभक्तां स्निग्धां च लङ्घनेनोपपादयेत् ॥७०॥
यदि उस स्त्री का शरीर कफ एवं अभिष्यन्द से युक्त हो, स्थूल हो, क्लेदरहित तथा स्राव कम हुआ हो, उसका खाया हुआ भोजन विदग्ध हो जाता हो अर्थात् पूरा पाक न होता हो तो उसे स्नेहन कराकर लङ्घन का प्रयोग कराये ॥७०॥
रूक्षां निःस्रुतरक्तां च कृशां वातज्वरार्दिताम् । क्षुत्तृष्णाभिहतां क्लान्तां शमनेनोपपादयेत् ॥७१॥ तस्यास्तदहरेवेह पेयादिः क्रम इष्यते । लङ्घितायाश्च मण्डादिरित्येष द्विविधः क्रमः ॥७२॥
जो स्त्री रूक्ष हो, जिसका रक्त न निकला हो, जो कृश एवं वातज्वर से पीडित हो, जो भूख और प्यास से व्याकुल हो तथा शरीर क्लान्त हो—उसकी संशमन ओषधियों के द्वारा चिकित्सा करे। तथा उसे उसी दिन पेयादि क्रम से भोजन कराये। और जिसे लङ्घन कराया गया है उसे मण्ड आदि का भोजन कराना चाहिये। इस प्रकार यह दो प्रकार का भोजन का क्रम होता है।
वक्तव्य—पेया तथा मण्ड यवागू के भेद होते हैं। सुश्रुत सू. अ. ४६ में कहा है—सिक्थकै रहितो मण्डः पेया सिक्थसमन्विता। अर्थात् पके हुए चावलों में से सिक्थ (ठोस भाग) को छोड़कर केवल ऊपर का द्रवभाग छान कर निकाल लिया जाय तो उस द्रवभाग को मण्ड कहते हैं। तन्त्रान्तर में कहा है—'नीरे चतुर्दशगुणे सिद्धो मण्डस्त्वसिक्थकः'। सिक्थ (ठोस भाग) से युक्त यवागू को पेया कहते हैं। यहां पर उसीप्रकार १४ गुने जल में चावलों को पकाया जाता है परन्तु पकाने के बाद उसे मण्ड की भांति छानना नहीं चाहिये। उस सिक्थ (ठोस भाग) से युक्त यवागू को पेया कहते हैं। इसमें सिक्थ (ठोस) भाग थोड़ा ही होना चाहिये अन्यथा सिक्थभाग के अधिक होने पर वह यवागू का अगला भेद विलेपी बन जाता है। कहा है—विलेपी बहुसिक्था स्याद् यवागूर्विरलद्रवा ॥७१-७२॥
पेया हि दीपयत्यग्निं धातून् संशमयत्यपि । गर्भदोषावशेषघ्नो मण्डो दोषविपाचनः ॥७३॥
पेया अग्नि को प्रदीप्त करती है तथा धातुओं का संशमन करती है। मण्ड गर्भ के अवशिष्ट दोषों को नष्ट करता है तथा दोषों का पाचन करता है ॥७३॥
तस्मात् पेया च मण्डश्च क्रमादौ विहितौ हितौ । अकृतश्च कृतश्चैव द्वित्रियूषरसौ तथा ॥७४॥
सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११] खिलस्थानम् ४७३
इसलिये चिकित्सा क्रम के प्रारम्भ में पेया और मण्ड का प्रयोग हितकर माना गया है। तथा दो-तीन दिन तक अकृत और कृत यूष तथा मांसरस का सेवन करना चाहिये।
वक्तव्य—मूंग आदि को १८ गुने पानी में पकाने से यूष बनता है। जो यूष स्नेह लवण आदि के द्वारा संस्कृत कर लिया जाता है उसे 'कृत' तथा स्नेह लवण आदि के द्वारा असंस्कृत यूष को 'अकृत' कहते हैं ॥७४॥
स्वेदोऽपतर्पणं युक्त्या पाचनौषधसेवनम्। कषायोऽभ्यञ्जनं सर्पिर्ज्वरघ्नः परमो विधिः ।।७५।।
ज्वर नाशक उपाय—स्वेद, युक्तिपूर्वक अपतर्पण, पाचन ओषधियों का सेवन, कषाय, अभ्यङ्ग एवं घृत-ये श्रेष्ठ ज्वरनाशक उपाय हैं ॥७५॥
शीतोपवासे व्यायाममायासमहिताशनम्। तद्धेतुसेवनं चैव क्षिप्रं ज्वरबलावहम् ।।७६।।
ज्वर को बढ़ाने वाले उपाय—शीत (ठण्ड लग जाना अथवा शीतल वस्तुओं का प्रयोग), उपवास, व्यायाम, परिश्रम, अहितकर भोजन तथा ज्वर को उत्पन्न करने वाले पदार्थों का सेवन करने से शीघ्र ही ज्वर के बल में वृद्धि हो जाती है अर्थात् उपर्युक्त कारणों से ज्वर की वृद्धि हो जाती है ॥७६॥
गर्भाशये च्युते नार्या दोषास्तदनुगामिनः। च्यवन्ति तस्माद्वमनं नस्यं बस्तिर्विरेचनम् ।।७७।। न कार्यमल्पदोषायाः शरीरे परिसंस्थिते। तदेव युक्तितः कार्यं वीक्ष्य दोषबलाबलम् ।।७८।।
प्रसूता स्त्री के गर्भाशय के अपने स्थान से च्युत हो जाने (नीचे आजाने) के कारण शरीरस्थित दोष भी उस गर्भाशय का अनुगमन करके नीचे की ओर आजाते हैं इसलिये उसे वमन, नस्य, बस्ति तथा विरेचन आदि नहीं कराने चाहिये। परन्तु यदि उसके शरीर में दोष अल्प मात्रा में ही विद्यमान हों तथा शरीर स्थित हो तो शरीर में दोषों के बलाबल को देखकर युक्तिपूर्वक उन सब का सेवन किया जा सकता है ॥
वमन वा विरेकं वा तीक्ष्ण तीक्ष्णौषधान्वितम्। न ह्यतिच्युतदोषायां ज्वरितायाः प्रशस्यते ।।७९।।
जिस ज्वरयुक्त प्रसूता स्त्री के शरीर में दोष बहुत अधिक मात्रा में अपने स्थान से च्युत हो गये हों-नीचे की ओर आ गये हों उसे तीक्ष्ण ओषधियों से युक्त तीक्ष्ण वमन एवं विरेचन नहीं देना चाहिये ॥७९॥
संतप्ते तूष्मणा देहे धातवः परिपाचिताः। भूयस्तीक्ष्णौषधं प्राप्य गच्छेयुरमितां गतिम् ।।८०।।
ज्वर की ऊष्मा (गरमी) के कारण संतप्त हुए शरीर में धातुओं का परिपाक हो जाता है। शरीर में पुनः तीक्ष्ण ओषधियों के पहुंचने से उन धातुओं का और अधिक पाक हो जाता है ॥८०॥
उत्क्लिश्यमाने हृदये कफे चाप्युरसि स्थिते। कफज्वरे क्षमे देहे विदध्याद्वमनं मृदु ।।८१।।
वमन का प्रयोग—कफ ज्वर में हृदय का उत्क्लेश होने पर, कफ के वक्षःस्थल में स्थित होने पर तथा शरीर के सहनशील होने पर मृदु वमन देना चाहिये ॥८१॥
अरुचौ कण्ठसंरोधे कफे चैव शिरोगते। अशक्यमाने कवले नस्यं तत्र विधापयेत् ।।८२।।
नस्य का प्रयोग—अरुचि और कण्ठरोध होने पर तथा कफ के सिर में स्थित होने पर यदि कवल का प्रयोग नहीं किया जा सकता हो तो नस्य का प्रयोग कराना चाहिये ॥८२॥
संसर्गपाचिते दोषे ज्वरे च मृदुतां गते। पञ्चाहात् सप्तरात्राद्वा कषायमवचारयेत् ।।८३।। पाचनीयं तु पञ्चाहात् सप्ताहादानुलोमिकम्।
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संसर्ग के कारण दोषों के पच जाने पर तथा ज्वर के मृदु हो जाने पर पांच या सात दिन में कषाय का प्रयोग करना चाहिये। इनमें से पाचन कषाय का पांच दिन बाद तथा अनुलोमन कषाय का प्रयोग सात दिन बाद करना चाहिये।
अनुलोम कषाय से अभिप्राय उस कषाय से है जो मल, मूत्र, वायु आदि का अनुलोमन करे ॥८३॥
कफपित्तज्वरे दद्यात् पञ्चाहे शमनौषधम् ॥८४॥
स्वभावतैक्ष्ण्यादल्पेन कालेन परिपच्यते । दुर्बलत्वाच्च धातूनां च्युतत्वाद्दामयस्य च ॥८५॥
कफ तथा पित्तज्वर में पांचवें दिन संशमन औषध का प्रयोग कराना चाहिये। क्योंकि इस रोग में पित्त की स्वाभाविक तीक्ष्णता के कारण, धातुओं के दुर्बल होने से तथा रोग के बहुत कुछ निकल जाने के कारण दोषों का पाचन शीघ्र ही हो जाता है ॥८४-८५॥
वातज्वरे जितेऽभ्यङ्गैस्तथैव रसभोजनैः । पक्वाशयस्थे विमले विदध्यादानुलोमिकम् ॥८६॥
भोजयेल्लघु चाप्यन्नं तनुभिर्जाङ्गलै रसैः ।
वातज्वर के अभ्यङ्ग (तैल मर्दन) तथा मांसरस के भोजन आदि द्वारा शान्त हो जाने पर तथा पक्वाशय स्थित दोष अर्थात् वायु के निर्मल (शान्त) हो जाने पर अनुलोमन का प्रयोग करना चाहिये। तथा उसके बाद उसे पतले जांगल मांसरसों के साथ लघु अन्न का भोजन कराना चाहिये ॥८६॥
यश्च नैवं शमं याति वातपित्तात्मको ज्वरः ॥८७॥
सर्पिस्तं शमयेदाशु दावाग्निमिव तोयदः ।
इन उपर्युक्त उपचारों के द्वारा जो ज्वर शान्त नहीं होता है उसे वातपित्तात्मक ज्वर समझना चाहिये। उस वातपित्तात्मक ज्वर को घृत शीघ्र ही शान्त कर देता है जिस प्रकार बादल दावाग्नि (जंगल की अग्नि) को शान्त कर देता है ॥८७॥
विमलेऽग्नौ मृदौ (व्याधौ) सपि रेव परायणम् ॥८८॥
स्नेहवध्यास्तु भूयिष्ठं व्याधयो दुष्प्रजातयः ।
जाठराग्नि के निर्मल अर्थात् तीव्र हो जाने पर तथा रोग के हल्का पड़ जाने पर घृत ही मुख्य ओषधि है। दुष्प्रजाता (ठीक प्रकार से प्रसव न होने से उत्पन्न हुई) व्याधियां प्रधानरूप से स्नेह के द्वारा ही शान्त होती हैं ॥८८॥
सन्निपातज्वरे नार्या मारुते च बलीयसि ॥८९॥
(इति ताडपत्रपुस्तके २२८ तमं पत्रम्।)
संस्कृतं रसयूषाभ्यां पुराणं सर्पिरिष्यते ।
सन्निपात ज्वर में तथा वायु के बलवान् होने पर प्रसूता स्त्री को मांसरस तथा यूष के द्वारा संस्कृत किये हुए पुराने घी का प्रयोग कराना चाहिये ॥८९॥
तत्र वातज्वरे तावत् प्रवक्ष्यामि चिकित्सितम् ॥९०॥
क्रव्यादानां च मांसानि धान्यमाषतिला यवाः । दशमूलमपामार्गभण्ट्येरण्डाटरूषकाः ॥९१॥
अश्वगन्धां श्वदंष्ट्रां च वंशपत्रं च संहरेत् । इत्येष संकरस्वेदः सकरीषोऽम्लसंयुतः ॥९२॥
वातज्वरेऽवचार्यः स्यात् संसर्गादौ सुखावहः ।
सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११] खिलस्थानम् ४७५
अब मैं वातज्वर की चिकित्सा का वर्णन करूंगा—वातज्वर में संकर स्वेद—क्रव्याद (मांस खाने वाले पशु-पक्षियों) का मांस, धान्य, उड़द, तिल, यव (जौ), दशमूल, अपामार्ग, भण्टी (मंजिष्ठा), एरण्ड, बांसा, अश्वगन्धा, गोखरू, बांस के पत्ते तथा करीष (सूखे हुए कण्डों-गोबर का चूर्ण) इसमें अम्लद्रव्य (कांजी) आदि की खटाई डाल कर उससे संकर संकरस्वेद दिया जाता है। यह वातज्वर में प्रारम्भ में करने से सुखकारी होता है।
वक्तव्य—संकरस्वेद का ही चरक सू. अ. १४ में दूसरा नाम पिण्डस्वेद दिया है। अर्थात् धान्य, उड़द आदि सूखे पदार्थों को मांस तथा कांजी आदि के साथ पीसकर पिण्डाकार बनाकर उस पिण्ड को कपड़े में रखकर अथवा कपड़े में बिना रखे ही स्वेदन दिया जाता है ॥९०-९२॥
द्वे पञ्चमूल्यौ वृश्चीवमेकेषीकां पुनर्नवाम् ।।९३।।
सहस्रवीर्यां नादेयीं शतवीर्यां शतावरीम्। विश्वदेवां शुकनसं सहदेवां सनाकुलीम् ।।९४।।
रास्नाऽजगन्धे पूतीकं देवाह्वां देवताडकम् । बले द्वे हंसपादीं च क्वाथार्थमुपसंहरेत् ।।९५।।
कृष्णागरुं व्याघ्रनखं शतपुष्पां पलङ्कषाम्।
कायस्थां च वयस्थां च चोरकं जटिलां जटाम् ।।९६।।
अपेतराक्षसीं यक्षगुहां महोष्ट्रलोमिकाम्। हरेणुकां हैमवतीं कैरवं सुवहां वचाम् ।।९७।।
वृश्चिकालीं च भार्गीं च श्यामां शिग्रुं च कल्कशः। संहृत्य तैलं विपचेद्वातज्वरनिबर्हणम् ।।९८।।
वातज्वर नाशक तैल—स्वल्प एवं बृहत् पञ्चमूल (अर्थात् दशमूल-शालिपर्णी, पृश्निपर्णी, बड़ी कटेरी, छोटी कटेरी, गोक्षुर-बिल्व, अग्निमन्य, श्योनाक, पाटला, गम्भारी), वृश्चीव (श्वेत पुनर्नवा-विषखपरा), एकेषीका (त्रिवृत् अथवा शतावरी), पुनर्नवा, सहस्रवीर्या (दूर्वा), नादेयी (अरणी), शतवीर्या (द्राक्षा), शतावरी, विश्वदेवा (गोरक्षतण्डुली), शुकनस (श्योनाक), सहदेवा (बला), नाकुली (गन्धनाकुली), रास्ना, अजगन्धा, पूतीक (पूतिकरञ्ज), देवदारु, देवताडक (देवदाली), दोनों बला (बला तथा अतिबला) तथा हंसपदी इनका क्वाथ बनाये। तथा काला अगरु, व्याघ्रनख (बृहन्नखी), सौंफ, गूगल, कायस्था (हरड़), वयस्था (गिलोय) चोरक (गन्ध द्रव्य-भटेउर), जटिला (बचा), जटा (जटामांसी), अपेतराक्षसी (तुलसी), यक्षगुहा, उष्ट्रलोमिका, हरेणुका, हैमवती (श्वेत बच), कैरव (विडङ्ग), सुबहा (शेफालिका), वच, वृश्चिकाली (ईषद्रोमशा श्वेतपुष्पगुच्छा दक्षिणावर्तवल्ली मेषशृङ्गीभेदः), भार्गी, श्यामा (अनन्तमूल) तथा सहिजना-इन सब का कल्क बनाकर-उपर्युक्त क्वाथ के साथ यथाविधि तैल सिद्ध करे। यह तैल वातज्वर को नष्ट करता है ॥९३-९८॥
महत्तः पञ्चमूलस्य पिबेत् क्वाथं ससैन्धवम्। पेयो विदारिगन्धाया निष्क्वाथो वा ससैन्धवः ।।९९।।
तथा इसमें बृहत् पञ्चमूल अथवा विदारीगन्धा के क्वाथ में सैन्धव मिलाकर पीना चाहिये ॥९९॥
रास्नां सरलदेवाह्वयष्टीमधुकसंयुताम्। बृहतीं सरलं दारुं भार्गीं वरुCentुकं तथा ।।१००।।
एरण्डमूलं रास्नां च वृश्चिकालीं च संहरेत्। एतदुत्क्वथितं कोष्णं पिबेद्वातज्वरापहम् ।।१०१।।
पिबेदन्तरपानं च बिल्वमूलशृतं जलम्।
वातज्वर को नष्ट करने के लिये रास्ना, सरल (चीड़), देवदारु तथा मधुयष्टि का क्वाथ अथवा बृहती, सरल, देवदारु, भार्ङ्गी, एरण्डमूल, रास्ना तथा वृश्चिकाली का क्वाथ बनाकर ईषदुष्ण पीना चाहिये। तथा उसके बाद बिल्व की जड़ से सिद्ध किया हुआ (पकाया हुआ) जल पिलाना चाहिये।।
पञ्चमुष्टिकयूषेण युक्ताम्ललवणेन च ।।१०२।।
भुञ्जीत भोजनं काले जाङ्गलानां रसेन वा।
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उचित काल में योग्य मात्रा में खटाई तथा नमक डले हुए पञ्चमुष्टिकयूष अथवा जांगल-मांसरस के साथ भोजन कराये ॥१०२॥
यवकोलकुलत्थानां पञ्चमूलद्वयस्य च ।। १०३ ।।
क्वाथे दधियवक्षारचव्यचित्रकनागरैः । पिप्पलीभिश्च तत् सिद्धं सर्पिर्ज्वरहरं पिबेत् ।। १०४ ।।
वातश्लेष्मविबन्धघ्नं ग्रहणीदीपनं परम् । श्यामातिल्वकसिद्धेन सर्पिषा च विरेचयेत् ।। १०५ ।।
यव, कोल (बेर), कुलत्थ तथा लघु एवं बृहत् पञ्चमूल के क्वाथ में दही, यवक्षार, चव्य, चित्रक, सोंठ तथा पिप्पली डालकर सिद्ध किया हुआ घृत पिलाना चाहिये। यह ज्वर को नष्ट करता है, वायु तथा श्लेष्मा (कफ) के विबन्ध को दूर करता है तथा ग्रहणी को उत्तेजित करता है। इसके बाद श्यामा (त्रिवृत्) तथा तिल्वक (लोध्र) से सिद्ध किये हुए घृत के द्वारा विरेचन देना चाहिये ॥१०३-१०५॥
स चेद्वातोल्बणत्वाच्च वेपथुर्नोपशाम्यति । स्वभ्यक्तामुष्णतैलेन धूपयेत् सुरदारुणा ।। १०६ ।।
सुखोष्णैरम्लपिष्टैश्च सर्वगन्धैः प्रलेपयेत् ।
यदि वायु की प्रधानता के कारण उस ज्वर में वेपथु (कम्पन) शान्त न हो तो उसे शरीर पर उष्ण तैल की मालिश करके देवदारु की धूप देनी चाहिये। तथा सर्वगन्ध¹ द्रव्यों को कांजी में पीसकर उनका शरीर पर ईषदुष्ण लेप करना चाहिये ॥१०६॥
स्योनाकवासावंशानां तर्कर्येरण्डयोस्तथा ।। १०७ ।।
अपामार्गस्य काश्मर्या भङ्गोष्णाम्लेऽवगाहयेत् ।
अरलु, बांसा, बांस, तर्कारी (अग्निमन्थ-अरणी), एरण्ड, अपामार्ग, गंभारी तथा भांग के गरम काढ़े में कांजी डालकर उसमें उसका अवगाहन करे।
अवगाहन से अभिप्राय निमज्जन (Tub-bath) से है। अर्थात् एक टब में उपर्युक्त द्रव्यों के क्वाथ को भरके उसमें रोगी यथाविधि बिठाकर Bath देना चाहिये ॥१०७॥
सुखावगाढामाश्वस्तां मांसाद्याजिनकम्बलैः ।। १०८ ।।
कुष्ठगुग्गुलुधूपेन घृतमिश्रेण धूपयेत् । उष्णानि चान्नपानानि ............. ।। १०९ ।।
तदनन्तर मांसरस खिलाकर तथा मृगचर्म एवं गरम कम्बलों से उसे सुखपूर्वक ढककर आश्वासन.देके तथा घी मिले हुए कुष्ठ, गूगल तथा धूप के द्वारा उसका धूपन करे। तथा उसके बाद उष्ण अन्नपान का प्रयोग कराये ॥१०८-१०९॥
उष्णो वर्ज्यश्च पवनः पित्ते चोष्णं विरुध्यते । अतीक्ष्णोपद्रवं तस्मात् पित्तज्वरमुपक्रमेत् ।। ११० ।।
कषायतिक्तमधुरैः प्रदेहाभ्यञ्जनौषधैः ।
उष्णता (गर्मी) पित्त की विरोधी है तथा उष्ण वायु भी इसमें वर्जित है अतः जिसमें तीक्ष्ण उपद्रव नहीं हैं ऐसे पित्तज्वर की कषाय, तिक्त एवं मधुर द्रव्यों तथा प्रदेह (लेप) और मालिश की ओषधियों के द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये ॥११०॥
१. सर्वगन्ध—चातुर्जातककर्पूरकक्कोलागुरूंकुङ्कुमम् । लवङ्गसहितञ्चैव सर्वगन्धं प्रकीर्तितम् ॥
सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११] खिलस्थानम् ४७७
शार्ङ्गेष्ठां मरुवां पाठां नक्तमालं सवत्सकम् ।।१११।। निम्बमारग्वधोशीरमासुतं^१ मधुना पिबेत्।
इसमें शार्ङ्गेष्ठा (काकजंघा-कुल इसका अर्थ काकमाची तथा गुंजा भी कहते हैं), मरवा, पाठा, नक्तमाल (करञ्ज), इन्द्रजौ, नीम, अमलतास तथा खस-इन ओषधियों का आसव बनाकर उसमें मधु मिलाकर सेवन करना चाहिये ॥१११॥
स्थिराद्यं पञ्चमूलं च केसरं संकशेरुकम् ।।११२।। गोपीं पर्पटकशीरं धान्यकं चेति साधयेत् । पादावशिष्टं तच्छीतं पिबेत् समधुशर्करम् ।।११३।।
स्थिरा (शालपर्णी) आदि ओषधियां, पञ्चमूल, नागकेशर, कशेरुक, गोपी (सारिवा), पित्तपापड़ा, खस तथा धनियां इन्हें सिद्ध करे अर्थात् १६ गुने पानी में डालकर क्वाथ बनाये। चतुर्थांश शेष रहने पर ठण्डा करके उसमें मधु एवं शर्करा मिलाकर पिलाना चाहिये ॥११२-११३॥
मुस्ताद्विसारिवोशीरयष्टिकारोध्रपद्मकैः । सप्तपर्णैरष्टाङ्गैरैर्वार्यर्धार्ढकमाप्लुतम् ।।११४।। तन्निशामुषितं पूतं पातव्यं शर्करायुतम् । कर्षेण कटुरोहिण्याः श्लक्ष्णपिष्टेन चान्वितम् ।।११५।। सर्वाभिषवराजोऽयं सर्वज्वरनिवारणः ।
नागरमोथा, दोनों सारिवा (कृष्ण तथा श्वेत), खस, मधुयष्टि, लोध्र, पद्माख तथा सप्तपर्ण इन आठ द्रव्यों को आधा आढक पानी में भिगोकर रख दे। रात भर पड़ा रहने के बाद प्रातः काल छानकर उसमें शर्करा तथा एक कर्ष (तोला) बारीक पिसा हुआ कटुरोहिणी का कल्क मिलाकर पिलाना चाहिये। यह उत्तम अभिषव है। यह सब प्रकार के ज्वरों को नष्ट करता है ॥११४-११५॥
मृद्वीका नागपुष्पं च मरिचान्यथ शर्करा ।।११६।। पत्रमेला च चव्यं च पानकं पैत्तिके ज्वरे।
पैत्तिक ज्वर में मुनक्का, नागकेशर, मरिच, शर्करा, तेजपत्र, छोटी इलायची तथा चव्य का पानक (शर्बत-Syrup)) बनाकर पिलाना चाहिये ॥११६॥
भद्रश्रीस्तिन्दुको मुस्ता पयस्या मधुकं वचा ।।११७।। कषाय एषां पातव्यो ज्वरातीसारनाशनः । पिबेन्मुद्गरसं वाऽपि पृश्निपर्णीस्थिरायुतम् ।।११८।।
ज्वरातीसार में भद्रश्री (चन्दन), तिन्दुक (तेंदूं- Diospyros Embroypteris), नागरमोथा, पयस्या (क्षीरकाकोली), मुलहठी तथा बच-इनका कषाय बनाकर पिलाना चाहिये। अथवा पृश्निपर्णी और शालपर्णी युक्त मुद्गयूष पिलाना चाहिये ॥११७-११८॥
सारिवाचन्दनोशीरद्राक्षापद्मकसाधिकम् । लाजपेयां पिबेच्छर्दिमूर्च्छादाहज्वरापहाम् ।।११९।। मुद्गयूषेण वाऽश्नीयान्मधुरेण रसेन वा।
छर्दि (वमन), मूर्च्छा, दाह तथा ज्वर को नष्ट करने के लिये सारिवा, चन्दन, खस, मुनक्का तथा पद्माख द्वारा सिद्ध की हुई लाजपेया अथवा उस लाजपेया में मुद्गयूष या मधुर रस युक्त द्रव्य मिलाकर पिलानी चाहिये। धान की खील से बनी पेया को लाजपेया कहते हैं ॥११९॥
१. आसवीकृतमित्यर्थः, “सन्धानाच्चिरकालाम्लमासुतं परिकीर्तितम्’।
४७८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११]
मधुकं केसरं गोपी निम्बपत्रं कशेरुकम् ।।१२०।। शर्करामधुसंयुक्तो लेहो मुखविशोधनः ।
मुलहठी, नागकेशर, गोपी (सारिवा), नीम के पत्ते तथा कसेरु के चूर्ण में शर्करा और मधु मिलाकर बनाया हुआ चूर्ण मुख का शोधन करता है ।।१२०।।
शान्तवेगे ज्वरे चास्यै दद्यान्मृदु विरेचनम् ।।१२१।। चतुरङ्गुलमृद्वीकात्रिवृत्कल्केन बुद्धिमान् । प्रदिहेद्दारुसंयुक्तैस्तालीसोशीरचन्दनैः ।।१२२।।
ज्वर का वेग शान्त हो जाने पर बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि उसे अमलतास, मुनक्का तथा त्रिवृत् के कल्क से मृदु विरेचन देवे । तथा उसके शरीर पर देवदारु, तालीशपत्र, खश तथा चन्दन का लेप करना चाहिये ।।१२१-१२२।।
मधुकस्य च कल्केन कल्केन तगरस्य च । तैलमभ्यञ्जनं सिद्धं पीतं ज्वरमपोहति ।।१२३।।
मुलहठी तथा तगर के कल्क से सिद्ध किया हुआ तैल मालिश तथा पीने से ज्वर को नष्ट करता है ।।१२३।।
पटोलस्य गुडूच्याश्च रोहिण्यारग्वधस्य च । चन्दनस्य च कल्केन सिद्धं सर्पिर्ज्वरापहम् ।।१२४।।
पटोल (परवल), गिलोय, कटुरोहिणी, अमलतास तथा चन्दन के कल्क से यथाविधि सिद्ध किया हुआ घृत ज्वर को नष्ट करता है ।।१२४।।
चन्दनाद्येन वा सिद्धं पटोलाद्येन वा घृतम् । पाययेत्तिक्तसर्पिर्वा तित्तिराद्यमथापि वा ।।१२५।।
अथवा चन्दन आदि या पटोलादि ओषधियों से सिद्ध किये हुए घृत का प्रयोग कराये अथवा तिक्तसर्पि या तित्तिराद्य घृत का पान कराना चाहिये ।।१२५।।
अम्लानि चान्नपानानि तथोष्णकटुकानि च । पित्तज्वरे विवर्ज्यानि प्रत्यनीकानि चाचरेत् ।।१२६।।
पित्तज्वर में अम्ल, उष्ण तथा कटु अन्नपान आदि का त्याग कर देना चाहिये तथा इनसे विपरीत गुण वाले अन्नपान आदि का सेवन करना चाहिये । अर्थात् मधुर, तिक्त एवं कषाय रसयुक्त तथा शीतल अन्न-पान का सेवन करना चाहिये ।।१२६।।
सम्यक्संसर्गयोगेन भग्नवेगं कफज्वरम् । जयेद्भेषज्यपानैश्च सपिषाऽभ्यञ्जनेन च ।।१२७।।
जिसका वेग शान्त हो गया है ऐसे कफ ज्वर को अच्छी प्रकार औषध, पान, घृत तथा अभ्यङ्ग (मालिश) के संसृष्टयोग के द्वारा शान्त करे । अर्थात् उपर्युक्त सब उपायों को अच्छी प्रकार यथावश्यक मिलाकर चिकित्सा करनी चाहिये ।।
बृहत्यौ पुष्करं दारु पिप्पल्यो नागरं शटी । क्वाथमेषां पिबेदुष्णामादौ दोषविपाचनम् ।।१२८।।
कफ ज्वर के प्रारम्भ में दोषों का पाचन करने के लिये दोनों बृहती, पुष्करमूल, देवदारु, पिप्पली, सोंठ तथा कचूर का गरम २ क्वाथ पिलाना चाहिये ।।१२८।।
द्विपञ्चमूलीं भार्गीं च कर्कटाख्यां दुरालभाम् । नागरं पिप्पलीं दारुं पिबेद्वा सैन्धवान्वितम् ।।१२९।। (इति ताडपत्रपुस्तके २२९ तमं पत्रम्)
अथवा दोनों पञ्चमूल (बृहत् तथा लघु अर्थात् दशमूल), भारंगी, काकड़ाशृंगी, दुरालभा, सोंठ, पीपल तथा देवदारु के क्वाथ में लवण डालकर पीना चाहिये ।।१२९।।
सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११] खिलस्थानम् ४७९
पटोलं धान्यकं मुस्ता मूर्वा पाठा निदिग्धिका । कषाय एषां पातव्यः षडङ्गो मधुसंयुतः ।। १३० ।।
पटोल (परवल), धनियां, नागरमोथा, मरोड़फली, पाठा तथा छोटी कटेरी इन ६ चीजों का क्वाथ मधु डालकर पीना चाहिये ।। १३० ।।
नागरामरदारुभ्यां शृतमुष्णं पिबेज्जलम् । बालमूलकयूषेण जाङ्गलानां रसेन वा ।। १३१ ।। कटूष्णद्रव्ययुक्तेन मन्दस्निग्धेन भोजयेत् ।
सोंठ तथा देवदारु से पकाया हुआ उष्ण जल पीना चाहिये । तथा कच्ची मूली के यूष अथवा जांगल मांसरस में कटु एवं उष्ण द्रव्य तथा थोड़ा स्नेह डालकर भोजन कराना चाहिये ।। १३१ ।।
पिबेद्गोमूत्रसंयुक्तं त्रिवृत्कल्कविरेचनम् ।। १३२ ।। काले कल्याणकं सर्पिः पिबेद्वा दाशमौलिकम् ।
विरेचन के लिये उचित काल में त्रिवृत् के कल्क में गोमूत्र मिलाकर पिलाना चाहिये अथवा कल्याणक घृत या दशमूल घृत का सेवन कराना चाहिये ।। १३२ ।।
लाक्षा मुस्ता हरिद्रे द्वे शताह्वा भद्ररोहिणी ।। १३३ ।। देवपुष्या वचा दारु सरलं चेति तैः समैः । पचेत्तैलं तदेतेन कुर्यादभ्यञ्जनं भिषक् ।। १३४ ।।
लाक्षा, नागरमोथा, हरिद्रा, दारुहरिद्रा, सोया, भद्ररोहिणी, लौंग, बच, देवदारु तथा सरल (चीड़) सब समभाग लेकर यथाविधि तैलपाक करे । उस तैल के द्वारा वैद्य रोगी का अभ्यङ्ग कराये ।। १३३-१३४ ।।
कुष्ठागरुव्याघ्रनखं मांसी धान्यकसामकम् । वक्रं हरेणुं ह्रीबेरं स्थौणेयं केसरं त्वचम् ।। १३५ ।। एले द्वे सरलं दारु मूर्वा कालानुसारिवा । बर्हिष्ठं शतपुष्या च पृथ्वीका देवपुष्पकम् ।। १३६ ।। एतैर्हि समभागैस्तु तैलं धीरो विपाचयेत् । एतदभ्यञ्जनादेव कफज्वरमपोहति ।। १३७ ।। शेषं वातज्वरहितं कार्यमत्र चिकित्सितम् ।
कुष्ठ, अगर, व्याघ्रनख (बृहन्नखी), जटामांसी, धनियां, सामक, वक्र (कुटिल-तगर), हरेणु, गन्धबाला, स्थौणेयक (सुगन्ध औषध विशेष-थुनेर-Clerodendron-Infortunatum) नागकेसर, दालचीनी, छोटी तथा बड़ी इलायची, सरल (चीड़), देवदारु, मरोड़फली, कालानुसारिवा (उत्पलसारिवा), बर्हिष्ठ (नेत्रबाला), सौंफ, पृथ्वीका (स्थूलजीरा), लौंग-समभाग लेकर बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि यथाविधि तैलपाक करे । इस तैल के मर्दन से ही कफज्वर नष्ट हो जाता है । शेष जो वातज्वर में हितकारी चिकित्सा है वह सारी यहां भी करनी चाहिये ।। १३५-१३७ ।।
मधुराण्यन्नपानानि स्निग्धानि च गुरूणि च ।। १३८ ।। कफज्वरे विवर्ज्यानि प्रत्यनीकानि चाचरेत् ।
कफज्वर का पथ्यापथ्य—कफज्वर में मधुर, स्निग्ध एवं गुरु अन्नपान का त्याग कर देना चाहिये तथा इनसे विपरीत गुण वाले पदार्थों का सेवन करना चाहिये अर्थात् कटुरस युक्त रूक्ष तथा लघु अन्न-पान का सेवन करना चाहिये ।। १३८ ।।
सन्निपातज्वरस्यातः प्रवक्ष्यामि चिकित्सितम् ।। १३९ ।। स सर्वलक्षणोऽसाध्यः कृच्छ्रसाध्योऽल्पलक्षणः । बलहीनस्य नष्टाग्नेः सर्वथा नैव सिद्ध्यति ।। १४० ।। किमङ्ग ! सूतिकानां तु क्षीणधातुबलौजसाम् । तथाऽपि यत्नमातिष्ठेदानृशंस्याद्भिषग्वरः ।। १४१ ।।
५३ का.सं.
४८० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११]
अब मैं सन्निपात ज्वर की चिकित्सा.का वर्णन करूंगा। हे प्रिय ! सम्पूर्ण लक्षणों वाला सन्निपात ज्वर असाध्य होता है तथा अल्प लक्षणों वाला कृच्छ्रसाध्य होता है। तथा जिसका शारीरिक बल एवं अग्नि नष्ट हो गई है तथा जिन प्रसूता स्त्रियों का धातु, बल एवं ओज क्षीण हो चुका हो उनमें सन्निपात ज्वर सर्वथा (बिलकुल) ठीक नहीं होता। अथवा सर्वथा ठीक नहीं होता का अभिप्राय यह है कि पूर्णरूप से ठीक नहीं हो पाता है—(अन्त में कुछ न कुछ कसर अवश्य रह ही जाती है)। तथापि चिकित्सक को रोगी की मृत्युपर्यन्त चिकित्सा का प्रयत्न अवश्य करते रहना चाहिये ॥
सन्निपातेषु दोषेषु यो दोषो बलवान् भवेत्। तमेवादौ प्रशमयेच्छेषदोषमतः परम् ।।१४२।।
अल्पान्तरबलेष्वेषु दोषेषु (मति)मान् भिषक् । श्लेष्माणमादौ शमयेत् स ह्येषामनुबन्धकृत् ।।१४३।।
गुरुत्वात् कृच्छ्रपाकत्वादूर्ध्वकायाश्रयात्तथा। तस्माज्ज्वरेण दुर्दिष्टं वातपित्तकफात्मके ।।१४४।।
सन्निपात ज्वर में जो दोष सबसे अधिक बलवान् हो सबसे पहले उसी की चिकित्सा करनी चाहिये। उसके बाद शेष (बचे हुए) दोषों की चिकित्सा करनी चाहिये। यदि वात, पित्त, कफ रूप सन्निपात ज्वर से आक्रान्त व्यक्ति में तीनों दोषों के बलों में विशेष अन्तर न हो अर्थात् तीनों दोष लगभग समान बल वाले हों तो बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि वह पहले श्लेष्मा की चिकित्सा करे क्योंकि गुरु, कृच्छ्रपाकी तथा शरीर के ऊर्ध्वभाग में स्थित होने के कारण श्लेष्मा ही इनमें अनुबन्ध कारक होता है। चरक चि. अ. ३ में भी सन्निपात ज्वर में पहले कफ की चिकित्सा का ही विधान किया गया है। उसके बाद पित्त तथा वात की चिकित्सा करनी चाहिये ॥
तस्यां तस्यामवस्थायां तत्तत् कार्यं चिकित्सितम् । सामान्येन तु वक्ष्यामि तद्विशेषं भिषग्जितम् ।।१४५।।
इसलिये सन्निपात ज्वर की उस २ अवस्था में वह २ चिकित्सा करनी चाहिये अर्थात् ज्वर में जैसी अवस्था हो उसके अनुसार चिकित्सा करनी चाहिये। फिर भी सामान्यरूप से उनमें जो विशेषता है उसका मैं वर्णन करता हूँ ।। १४५ ।।
कुशकाशश्वदंष्ट्रार्कसुधैरण्डपरू(षकैः) । ...... त्रयवद्रोणं चर्मण्यास्तीर्य युक्तितः ।।१४६।।
स्वेदयेत् सूतिकां तत्र गुरुप्रावरणावृताम् ।
सन्निपात ज्वर में स्वेदन—कुश, काश, गोखुरू, आक, थूहर, एरण्ड, परूषक (फालसा) तथा ....जौ—इन सबको एक द्रोण परिमाण में लेकर चमड़े पर फैलाकर प्रसूता स्त्री को भारी वस्त्रों से ढककर तदनन्तर उसे युक्तिपूर्वक स्वेदन देना चाहिये ।। १४६ ।।
नागरं दशमूलं च कट्वङ्गं दारुकद्वयम् ।।१४७।।
पिप्पलीस्त्रिफला भार्गी कर्कटाख्या दुरालभा । ससैन्धवः कषायोऽयं ज्वरे पूर्वापराह्निके ।।१४८।।
मधुहिङ्गुसमायुक्तो देयः सायाह्निके ज्वरे ।
पूर्वाह्न (दिन के पूर्व भाग १२ बजे से पूर्व) तथा अपराह्न (दिन के पिछले पहर ३ बजे के बाद) काल में होने वाले सान्निपातिक ज्वर में सोंठ, दशमूल, कट्वङ्ग (श्योनाक), हरिद्रा, दारुहरिद्रा, पिप्पली, त्रिफला, भारंगी, कर्कट (काकड़ाशृङ्गी अथवा बिल्वशलाटु) तथा दुरालभा के क्वाथ में लवण मिलाकर देना चाहिये। तथा सायंकाल होने वाले ज्वर में उपर्युक्त कषाय में मधु एवं हींग मिलाकर देना चाहिये ॥
पटोलमुस्तामधुकरोहि ........................... ।।१४९।।
सर्पिषा सह पातव्यं सन्निपातेऽनिलोत्तरे ।
यदि सन्निपात ज्वर में वायु की प्रधानता हो तो पटोल (परवल), नागरमोथा, मधुक (मुलहठी) तथा रोहिणी ..... आदि द्रव्यों के क्वाथ को घृत के साथ सेवन कराना चाहिये ॥
सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः १९] खिलस्थानम् ४८१
एतदेव त्रिफलया युक्तं च सुरदारुणा ।।१५०।।
पाययेन्मधुनाऽऽलोड्य सन्निपाते कफोत्तरे।
यदि सन्निपात ज्वर में कफ की प्रधानता हो तो उपर्युक्त क्वाथ में ही त्रिफला तथा देवदारु डालकर उसे मधु में मिलाकर पिलाना चाहिये ।।१५०।।
एलामधूकमधुकशीतपाकीपरूषकैः ।।१५१।।
त्रिफलासारिवापाठामञ्जिष्ठाचतुरङ्गुलैः। पित्तोत्तरे त्वभि(न्यासे) पिबेत् समधुशर्करम् ।।१५२।।
यदि सन्निपात ज्वर में पित्त की अधिकता हो तो छोटी इलायची, महुआ, मुलहठी, शीतपाकी (गुंजा), फालसा, त्रिफला, सारिवा, पाठा, मंजीठ तथा अमलतास के क्वाथ में मधु एवं शर्करा मिलाकर पिलाना चाहिये ।।१५१-१५२।।
भार्गी शृङ्गी त्रिवृद्दन्ती दशमूली दुरालभा।
कट्वङ्गं त्रिफला शुण्ठी पिप्पली चेति तैः शृतम् ।।१५३।।
क्वाथं ससैन्धवक्षारं पाययेच्चानुलोमिकम्। गोमूत्रयुक्तां त्रिवृतां केवलां वा वचां पिबेत् ।।१५४।।
अनुलोमन (Lexative) के लिये भारंगी, काकड़ाशृङ्गी, त्रिवृत् (निसोथ), दन्ती (जमालगोटा), दशमूल, दुरालभा, कट्वङ्ग (श्योनाक), त्रिफला, सोंठ तथा पिप्पली-इत्यादि ओषधियों द्वारा पकाकर बनाये हुए क्वाथ में सैन्धव तथा क्षार मिलाकर पिलाना चाहिये अथवा गोमूत्र में मिलाकर त्रिवृत् या अकेली घृच का सेवन कराये ।।१५३-१५४।।
अनुलोमं गते दोषे संजाते ग्रहणीबले। ........... ततः सर्पिर्वा साधु संस्कृतम् ।।१५५।।
दोषों के अनुलोम हो जाने पर अर्थात् उनकी गति अनुलोम (नीचे की ओर) हो जाने पर तथा ग्रहणी के बलवान् हो जाने पर .... अच्छी प्रकार संस्कृत किया हुआ घृत पिलाना चाहिये ।।
मधुकेनातिविषया रोहिण्या भद्रदारुणा। सिद्धं सर्पिः पिबेत् काले सन्निपातज्वरापहम् ।।१५६।।
कल्याणकं महान्तं वा पञ्चगव्यमथापि वा।
अथवा सन्निपात ज्वर को नष्ट करने के लिये उचित काल में मुलहठी, अतीस, रोहिणी तथा देवदारु से सिद्ध किया हुआ घृत पिलाना चाहिये। अथवा महान् कल्याण घृत या पञ्चगव्य घृत का सेवन कराना चाहिये ।।१५६।।
शीतोष्णैरौषधैस्तैलं सर्वैरिवोपसंस्कृतम् ।।१५७।।
अभ्यञ्जनं विधातव्यं यच्चान्यन्त्रि मलापहम्।
सम्पूर्ण शीत एवं उष्ण ओषधियों से सिद्ध किये हुए तैल का अभ्यङ्ग (मर्दन-मालिश) करना चाहिये। तथा अन्य जो भी त्रिदोषनाशक आहार-विहार आदि हैं, वे सब करने चाहिये ।।१५७।।
हरीतक्या प्रियंग्वा च मालत्याऽऽम(लकेन) च ।।१५८।।
मु(ख)प्रक्षालनं कार्यं वासया खदिरेण वा।
हरड़, प्रियङ्गु, मालती (चमेली), आंवला, बांसा और खदिर (के क्वाथ) से मुखप्रक्षालन करना चाहिये ।।१५८।।
श्लक्ष्णपिष्टं तथाऽऽम्रास्थि रसाञ्जनसमन्वितम् ।।१५९।।
दन्तमांसौष्ठजिह्वानां प्रधानं प्रतिसारणम्।
बारीक पिसी हुई आम की गुठली तथा रसौंत के चूर्ण का दन्तमांस (मसूड़े), होंठ तथा जिह्वा पर प्रतिसारण (Dust) करना चाहिये ।।१५९।।
४८२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् सूतिकोपक्रमणीयाध्यायः ११]
सन्तप्यमाने शिरसि दधिसर्ज्जरसाक्षतैः ।। १६० ।।
साश्वगन्धैर्मधुयुतैर्ललाटमुपलेहयेत् ।
यदि सिर में बहुत सन्ताप हो तो दही, राल, अक्षत (चावल) तथा असगन्ध (अश्वगन्धा) को मधु में मिला कर मस्तिष्क पर लेप करना चाहिये ॥१६०॥
लघ्वन्नकृतसंसर्गे निरष्टाह¹परे ज्वरे ।। १६१ ।।
संसर्गे सन्निपाते वा सप्रलापेऽनिलोत्तरे । सशूलबद्धविण्मूत्रे सश्वासे च विशेषतः ।। १६२ ।।
पुराणसर्पिः संस्कारो विधेयो जाङ्गलो रसः । दशमूलकुलत्थानां यवानां कुवलस्य च ।। १६३ ।।
कुलीरशृङ्ग्या रास्नायाः शटीपुष्करमूलयोः । भार्ग्या दुरालभायाश्च निर्यूहे साधु साधितः ।। १६४ ।।
तेनास्य विगुणो वायुर्ज्वरश्चास्य प्रशाम्यति ।
ज्वर में आठ दिन व्यतीत हो जाने पर लघु अन्न का प्रयोग करने पर यदि प्रलाप (Delirium) युक्त द्वन्द्वज या सन्निपात ज्वर में वायु की प्रधानता हो तथा यदि उसमें विशेष रूप से शूल, मलमूत्र की रुकावट तथा श्वास की कठिनता हो तो उसे पुराण सर्पि से संस्कृत जांगल मांसरस देना चाहिये । तथा दशमूल, कुलत्थ, यव, कुबल (बेर या पद्म), कुलीरशृंगी (काकड़ाशृङ्गी), रास्ना, शटी (कपूर कचरी), पुष्करमूल, भारंगी तथा दुरालभा को अच्छी प्रकार सिद्धकर निर्यूह बनाना चाहिये । इससे रोगी का विगुण (प्रकुपित) हुआ वायु तथा ज्वर नष्ट हो जाते हैं ।। १६१-१६४।।
पाचनीयैरुपक्रान्ते भग्नवेगे सति ज्वरे ।। १६५ ।।
पक्वावशेषे च मले बले मन्दत्वमागते । पेयं सुशीतं सक्षौद्रमिदं संशमनद्वयम् ।। १६६ ।।
पिप्पली सदुरालम्भा मृद्वीका वा सपिप्पली ।
पाचन द्रव्यों का प्रयोग करने से ज्वर का वेग शान्त हो जाने पर, मल के पचने से कुछ शेष रहने पर तथा बल के कुछ कम हो जाने पर निम्न दो शीतल संशमन योगों में मधु मिलाकर पिलाना चाहिये— १. पिप्पली तथा दुरालभा तथा २. मुनक्का और पिप्पली ।। १६५-१६६।।
गुडूच्यामलकानां च स्वरसे साधितं घृतम् ।। १६७ ।।
कल्केन सारिवाशुण्ठीलोध्रदाडिमचन्दनै । तद्धि मङ्गल्यकं नाम विषमज्वरनाशनम् ।। १६८ ।।
ज्वराणां चापि सर्वेषामेतदेवामृतोपमम् ।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। अचूष्के (१७४)
(इति) खिलेषु सूतिकोपक्रमणीयो (नामैकादशोऽध्यायः) ।।
गिलोय और आंवले के रस में सारिवा, सोंठ, लोध्र, अनार और चन्दन का कल्क डालकर घृत सिद्ध किया जाय । यह मङ्गल्यक नाम का घृत है । इसके सेवन से विषमज्वर नष्ट हो जाता है तथा अन्य ज्वरों में भी यह अमृत के समान है ॥
१. अष्टौ दिनान्यतिक्रान्त इत्यर्थः ।
जातकर्मोत्तराध्यायः १२] खिलस्थानम् ४८३
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। अचूष्फ (१७४)
(इति) खिलेषु सूतिकोपक्रमणीयो (नामैकादशोऽध्यायः) ॥११॥
अथ जातकर्मोत्तराध्यायो द्वादशः।
अथातो जातकर्मोत्तरमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥
अब हम जातकर्मोत्तर अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। इस अध्याय में उन क्रियाकर्मों का वर्णन किया जायेगा जो शिशु की उत्पत्ति के बाद किये जाते हैं ॥१-२॥
अथ खलु शिशोर्जातस्य तत्कर्मण्यभिनिवृत्ते प्रथम एव मासि कृतरक्षाहोममङ्गलस्वस्त्ययनस्य सूर्योदयदर्शनोपस्थानं, प्रदोषे चन्द्रमसः ॥३॥
अब शिशु की उत्पत्ति के बाद उस उत्पत्तिकर्म (प्रसव) के निवृत्त हो जाने पर प्रथम मास में ही उसकी रक्षा, होम, मङ्गल तथा स्वस्त्ययन (स्वस्तिवाचन) कराकर सूर्योदय का दर्शन एवं पूजा तथा रात्रि में चन्द्रमा का दर्शन कराना चाहिये। वेदों में भी सूर्यदर्शन का विधान दिया है। कहा है—आ तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत् पश्येम शरदः शतम् ॥३॥
चतुर्थे मासि स्नातालङ्कृतस्याहतवाससा संवीतस्य ससिद्धार्थकमधुसर्पिषा रोचनया चान्वालब्धस्य धात्र्या सहान्तर्गृहान्निष्क्रमणं देवतागारप्रवेशनं च। तत्राग्निं प्रज्वलन्तं घृताक्षतैरभ्यर्च्य ब्रह्माणमीश्वरं विष्णुं स्कन्दं मातृश्चान्यानि च कुलदेवतानि गन्धपुष्पधूपमाल्योपहारैर्भक्ष्यैश्च बहुभिर्बहुविधैः संपूज्य, ततो ब्राह्मणवाचनं कृत्वा, तेषामाशिषो गृहीत्वाऽभिवाद्य च गुरून् पुनः स्वमागारं प्रविशेत्। प्रविष्टं चैनमनेन मन्त्रेणाभ्युक्ष्य भिषग्वर्तेत ॥४॥
'शरच्छतं जीव शिशो! त्वं देवैरभिरक्षितः।
द्विजैरप्याशिषा पूतो गुरुभिश्चाभिनन्दितः' इति ॥५॥
चतुर्थ मास में उस शिशु को स्नान तथा अलंकार (आभूषणों) से युक्त करके नये वस्त्र पहना कर तथा सिद्धार्थक (श्वेत सरसों), मधु तथा घृत से अथवा गोरोचन से युक्त करके धात्री के साथ उसे प्रथम बार घर से बाहर निकाला जाता है तथा मन्दिर में प्रवेश कराया जाता है। वहां मन्दिर में प्रज्वलित हुई अग्नि की घृत तथा अक्षत (चावलों) के द्वारा अभ्यर्थना करके ब्राह्मण, भगवान् विष्णु, स्कन्द, मातृकाओं तथा अन्य भी कुलदेवताओं की गन्ध, पुष्प, धूप एवं माला आदि के उपहारों तथा नाना प्रकार के भक्ष्य पदार्थों द्वारा अनेकविध पूजा करके, ब्राह्मणों को नमस्कार करके तथा उनसे आशीर्वाद लेकर और गुरुओं को अभिवादन करके पुनः लौटकर अपने घर में प्रवेश करे। घर में प्रविष्ट होने पर वैद्य निम्न मन्त्र के द्वारा उसकी अभ्यर्थना करे—शरच्छतं जीव शिशो ! त्वं देवैरभिरक्षितः। द्विजैरप्याशिषा पूतो गुरुभिश्चाभिनन्दितः॥ (अर्थात् हे शिशु ! तुम देवताओं के द्वारा रक्षित, ब्राह्मणों के आशीर्वादों से पवित्र तथा गुरुओं के द्वारा प्रशंसित हुए सौ वर्ष तक जीओ) ॥४-५॥
षष्ठे मासि पुण्याहेऽभ्यर्च्य देवतां, द्विजांश्च भोजनेन सन्तर्प्य दक्षिणाभिः स्वस्ति वाच्य च, गृहमध्ये वास्तुमध्ये वा शुचौ देशे गोमयेनाद्भिश्च चतुर्हस्तमात्रं स्थण्डिलमुपलिप्य मण्डलं चतुरस्रं वा,
४८४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | जातकर्मोत्तराध्यायः १२]
हिरण्यसुवर्णरजतताम्रकांस्यसीसायसानि मणयो मुक्ताप्रवाला(दयः) सर्वे, सर्वाणि धान्यानि व्रीहयः सर्वसतालेष्टक(?) क्षीरदधिघृतमधुगोमयगोमूत्रकार्पासादीनि, बालक्रीडनकानि पिष्टमयानि, तद्यथा- गोगजोष्ट्राश्वगर्दभमहिषमेषच्छागमृगवराहवानररुरुशरभसिंहव्याघ्रकपिनरक्षुद्रककूर्ममीनशुकसारिकाकोकिलक-लविङ्कचक्रवाकहंसक्रौञ्चसारसम्यूरक्रकरचकोरकपिञ्जलचरणाधुधवर्तकाकाराणि, शैल^१कगृह(क)रथकयान-कस्यन्दनकशल्लिकाजिञ्झरिकाखैरिकेशीकातुम्बीकादुष्प्रवाहकभद्रकसंचोल्लकपीठप.......न्दिका-दुहितृकाकुमारकगोलगण्डुकादीन्यन्यानि च स्त्रीकौतुकानीति, भिषक् तस्य मण्डलं सन्निधाय वसुधायै अर्ध्यं दत्त्वाऽनेन मन्त्रेण- ।।६।।
त्वमग्रजा त्वं प्रभवाऽव्यया च लोकस्य धात्री सचराचरस्य ।
त्वमीज्यसे त्वं यजसे महीह मात्रेऽव नः (पा) हि कुमारमेनम् ।।७।।
तं ब्रह्मा अनुमन्यतां स्वाहा ।
छठे मास में किसी शुभ दिन देवता की पूजा करके और ब्राह्मणों को भोजन एवं दक्षिणा से सन्तुष्ट करके तथा स्वस्तिवाचन करके, घर या वास्तु (बड़े भवन) के मध्य में पवित्र स्थान पर गोबर तथा पानी के द्वारा चार हाथ प्रमाण की एक गोल या चौकोर वेदी लीप कर बनाये। उस वेदी के पास वैद्य सुन्दर तथा ऐश्वर्य युक्त, सोने, चांदी, तांबा, कांसी, सीसा तथा लोहे की सब प्रकार की मणियां और मुक्ता, प्रबाल आदि सम्पूर्ण व्रीहि (चावल) आदि धान्य, सर्वसतालेष्टक (?) दूध, दही, घृत, मधु, गोबर, गोमूत्र तथा कपास आदि तथा पिष्टयुक्त (खोये इत्यादि के बनाये हुए) निम्न आकृति वाले खिलौने यथा—गौ, हाथी, ऊंट, घोड़ा, गदहा, भैंस, मेंढा, बकरी, मृग, सूअर, बन्दर, रुरु तथा शरभ जाति के मृग, सिंह, व्याघ्र, कपि, चीता, भेड़िया, कछुआ, मछली, तोता, मैना, कोयल, कलविङ्क, चक्रवाक, हंस, क्रौञ्च, सारस, मोर, क्रकर (केंकड़ा), चकोर कपिञ्जल (गौरय्या), चरपायुध तथा बत्तख के आकार के तथा शिला, गृह, रथ, यान (सवारी), स्यन्दन, शल्लिका, झञ्झर, खैरिका, ईशीका (सरकण्डा), तुम्बी, दुष्प्रवाह, भद्र, संचोल्ल, पीठप... (नना) न्दिका (ननद), दुहिता (लड़की), कुमार, गोलगन्दुक (गेद) इत्यादि आकार वाले तथा अन्य भी स्त्रियों की पसन्द वाले खिलौने इत्यादि रखकर निम्न मन्त्र के द्वारा पृथ्वी को अर्ध्य देवे—त्वमग्रजा त्वं प्रभवाऽव्यया च लोकस्त धात्री सचराचरस्य। त्वमीज्यसे त्व यजसे महीह मात्रेऽव नः (पा) हि कुमारमेनम् ।। तं ब्रह्मा अनुमन्यतां स्वाहा । (अर्थात् हे पृथिवि ! तू सबसे प्रथम हुई है। तू प्रभवा—प्रकृष्ट उत्पत्तिवाली तथा अव्यया—क्षय न होने वाली है। और तू सम्पूर्ण जड़ एवं चेतन जगत् की धात्री धारण करने वाली-पोषक है। हम तेरी पूजा एवं यज्ञ करते हैं। तू हमारी माता के समान है। तू इस बालक की रक्षा कर। ब्रह्मा उसका अनुमोदन करे—इत्यादि) ।।
वक्तव्य—यद्यपि यहां उपर्युक्त मन्त्रों के अर्थ दे दिये गये हैं परन्तु यहां मूल मन्त्र ही अभिप्रेत है ।।६-७।।
ततस्तं मण्डलमध्ये तथैव स्नातमलङ्कृतमहतवाससं कुमारं प्राङ्मुखमुपवेशयेन्मुहूर्तं, मुहूर्तमुपविश्य यद्धस्ताभ्यां प्रथमं गृहीत परिमृशेद्वा कृष्याद्वा तद्भागी भविष्यतीति हृदि निमित्तं कृत्वोत्थाप्योत्तरकालमवहितया धात्र्याऽन्वितः कुमारेण वा एतैरेव क्रीडनकैस्तैजसैरितरैश्च लघुभिरखरैरतीक्ष्णैरवक्रङ्गमैरनवोपस्करैराकर्षण-हरणशक्तै रुचिरभिर्घोषवद्भिर्विनोद्यमानः सोपाश्रयास्तरणोपेतायां भूमौ प्रतिदिनमभ्यासार्थं सकृदुपविशेदिति ।।
इसके बाद उस बालक को उसी प्रकार स्नान, अलंकार (आभूषण) तथा नवीन वस्त्रों से भूषित करके उस मण्डल के मध्य में पूर्व दिशा की ओर मुख करके थोड़ी देर के लिये बिठा दें। थोड़ी देर बैठने के बाद वह बालक अपने हाथों
१. प्राचीनास्तत्तदाकाराः क्रीडनकविशेषा इमे। प्रतिकृत्यर्थे कप्रत्ययः।
जातकर्मोत्तराध्यायः १२] खिलस्थानम् ४८५
के द्वारा वहां उपस्थित पदार्थों में से जिस पदार्थ का सर्वप्रथम ग्रहण, स्पर्श या कर्षण (खींचना) करेगा वह उसी का भागी होगा-ऐसा मनमें सोच ले । उसके बाद उस बालक को उठाकर प्रमाद रहित धात्री अथवा दूसरे बालक के साथ उपर्युक्त अथवा अन्य तेजयुक्त, हल्के, जो खर (कठोर) न हों, जो बहुत तेज न हों, जो बहुत वक्र (टेड़े मेड़े) न हों, जो बिलकुल नवीन न हों, जो खींचकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाये जा सकते हों तथा रुचिकारक एवं शब्दयुक्त (नाना प्रकार के शब्द करने वाले) खिलौनों से विनोद करता हुआ प्रतिदिन किसी के सहारे तथा बिछौने से युक्त भूमि पर अपने खेल आदि के अभ्यास के लिये प्रवेश करे । बालकों के खिलौनों के विषय में चरक शा. अ. ८ में भी कहा है—क्रीडनकानि खल्वस्य विचित्राणि घोषवन्त्यभिरामाण्यगुरूरायतीक्ष्णाग्राण्यनास्यप्रवेशीन्यप्राणहराण्यवित्रासनानि च स्युः ॥८॥
तत्र श्लोकाः— उपलिप्ते शुचौ देशे शस्त्रतोयाग्निवर्जिते । उपविष्टं सकृच्चैनं न चिरात् स्थापयेद् बुधः ॥९॥
गोबर, मिट्टी आदि से लिपी हुई, पवित्र तथा शस्त्र, जल एवं अग्नि आदि से रहित भूमि में एक बार बैठ हुए शिशुको लगातार बहुत देर तक बुद्धिमान् व्यक्ति न बैठा रहने दे । अर्थात् निरन्तर बहुत देर तक उस अवस्था में न बैठा रहने दे ॥९॥
स्तैमित्यं कटिदौर्बल्यं पृष्ठभङ्गः श्रमो ज्वरः । विण्मूत्रानिलसंरोधाध्मानं चात्युपवेशनात् ॥१०॥
लगातार बहुत अधिक देर तक बैठे रहने से शिशु के शरीर में स्तिमितता, कटि में दुर्बलता, पृष्ठभङ्ग (सीधा न बैठ सकना), श्रम, ज्वर, मल, मूत्र एवं वायु का अवरोध तथा आध्मान हो जाते हैं ॥१०॥
आसीनस्यातिबालस्य सततं भूमिसेवनात् । आसन्नान्येव दुःखानि निर्घातं गात्रभेदनम् ॥११॥ निर्घाताज्जर्जराङ्गत्वं वेदना ज्वर संभवः । ततो न वृद्धर्बालस्य कठोराङ्गत्वमेव च ॥१२॥
अत्यन्त छोटे बालक के निरन्तर बहुत देर तक भूमि पर बैठे रहने से उसे दुःख (रोग) बहुत शीघ्र हो जाते हैं । इससे उसे निर्घात (शरीर का बहुत अधिक हिलना) तथा अङ्गभेद (शरीर का भेदन) हो जाता है । निर्घात के कारण उसके सम्पूर्ण अङ्ग जर्जर हो जाते हैं और शरीर में वेदना तथा ज्वर हो जाता है । इस प्रकार बालक के शरीर की वृद्धि नहीं हो पाती है तथा उसके अङ्ग भी कठोर (दृढ़) नहीं हो पाते हैं ॥११-१२॥
मक्षिकाकृमिकीटानां वेलाझञ्झानिलस्य च । सर्पाखुनकुलादीनां गम्यो भवति नित्यशः ॥१३॥
तथा बहुत देर तक लगातार भूमि पर बैठने से बालक मक्खी, कृमि तथा कीड़े आदियों से उत्पन्न होने वाले रोगों, झञ्झावात (तेज वायु) तथा सांप, चूहे एवं नेवले आदि प्राणियों से आक्रान्त हो जाता है । अर्थात् लगातार बैठे रहने से बालक को उपर्युक्त प्राणियों का भय रहता है । मक्खी, मच्छर, कीड़े आदि उसे तंग कर सकते हैं । तेज हवा लग सकती है अथवा सांप, विच्छू आदि उसे काट सकते हैं ॥१३॥
तस्मान्नातिचिरं नैको न बालो न च रोगितः । उपवेश्यो भवेद्बालो नापुण्याहकृतादिकः ॥१४॥ इति ॥
इसलिये छोटे बालक रो रोगो अवस्था में तथा अशुभ दिन आदि के समय अकेले बहुत देर तक न बैठे रहने दे ॥१४॥
तस्मिन्नेव मासि विविधानां फलानां प्राशनं, भिषगनुतिष्ठेत् । तद्धिं दन्तजातस्यान प्राशनं दशमे वा मासि प्रशस्तेऽहनि प्राजापत्ये नक्षत्रेऽऽभ्यर्च्य देवतां ब्राह्मणांश्च समासेनान्नेन दक्षिणावता स्वस्ति वाच्य गोमयोपलिप्ते स्थण्डिले दर्भानास्तीर्य सुमनसोऽवकीर्य चतुर्षु स्थानेषु गन्धमाल्यालङ्कृतान् पूर्णकलशान्
४८६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | जातकर्मोत्तराध्यायः १२]
स्वस्तिकांश्च स्थाप्य क्रीडनकविहितानि पूर्ववदुपकरणानि सर्वाण्येवोपकल्प्य लावककपिञ्जल-तित्तिरचरणायुधानामन्यतमस्य मांसेनान्यैश्च विचित्रसुसंस्कृतकामिकैर्व्यञ्जनैः समुदितमन्नपानं मध्ये निधाय ततो भिषक् सुतमलङ्कृतमहतवस्त्रपरिहितमनुष्ठितरक्षाविधानं कुमारं प्राङ्मुखः प्रत्यङ्मुखमुपवेश्याग्निं प्रज्वाल्यान्नं सर्वव्यञ्जनोपेतं गृहीत्वाऽनेन मन्त्रेण जुहुयात्—।।१५।।
(इति ताडपत्रपुस्तके २३१ तमं पत्रम्)
फिर वैद्य को चाहिये कि उसी अर्थात् छठे मास में वह बालक को विविध प्रकार के फलों का सेवन कराये। उसके बाद दांत निकलने पर दसवें महीने में प्राजापत्य नक्षत्र के समय किसी शुभ दिन में देवताओं तथा ब्राह्मणों की अभ्यर्थना करके मांसयुक्त अन्न की दक्षिणा सहित स्वस्तिवाचन करके गोबर से लिपे हुए स्थण्डिल (वेदी) पर दर्भ डालकर तथा उस पर चमेली के फूल बिखेर कर चारों ओर गन्धद्रव्य एवं मालाओं से अलंकृत किये हुए जलपूर्ण घड़े तथा स्वस्तिक आदि के चिन्हों को स्थापित करके तथा खिलौनों की विधि के समय बनाये हुए सम्पूर्ण उपकरणों को पूर्ववत् तैयार करके लाव (बटेर), गौरय्या, तीतर, चरणायुध (कुक्कुट-मुर्गा) आदियों में से किसी एक का मांस तथा अन्य भी नाना प्रकार के सुसंस्कृत तथा मन को प्रसन्न करनेवाले व्यञ्जनों से सिद्ध किया हुआ अन्न-पान आदि मध्य में रख दे। तदनन्तर वैद्य को चाहिये कि वह पूर्व दिशा की ओर मुख करके आभूषणों से अलंकृत, नवीन वस्त्र पहने हुए तथा जिसका रक्षाविधान किया जा चुका हो ऐसे बालक को पश्चिम दिशा की ओर मुख करके बिठा दे। फिर अग्नि को प्रज्वलित करके उसमें सम्पूर्ण व्यञ्जनों से युक्त अन्न की निम्न मन्त्रों द्वारा आहुति देवे। (चरक शा. अ. ८ में भी शिशु की रक्षाविधान का वर्णन अच्छी प्रकार से किया गया है) ।।१५।।
यथा सुराणाममृतं नागेन्द्राणां यथा सुधा। तथाऽन्न प्राणिनां प्राणा अन्नं चाहुः प्रजापतिम् ।।१६।।
तदुद्भवस्त्रिवर्गश्च लोकाश्चैव यथा ह्यमी। जुहोमि तस्मात्त्वय्यन्नमग्नेऽमृतसुखोपगम् ।।१७।।
प्रजापतिरनुमन्यतां स्वाहा।
अर्थात् जिसस प्रकार देवताओं के लिये अमृत होता है तथा श्रेष्ठ हाथियों के लिये सुधा (मद) होती है उसी प्रकार प्राणियों के लिये अन्न प्राण होता है। अन्न को ही प्रजापति कहते हैं। जिस प्रकार इन त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) तथा लोक की उत्पत्ति होती है। उसी प्रकार अन्न की भी उत्पत्ति होती है। इसलिये हे अग्ने ! अमृत के समान सुख कोक देनेवाले इस अन्न की मैं तेरे अन्दर आहुति देता हूँ। प्रजापति इसस बात का अनुमोदन करते हैं। इसी प्रकार का मन्त्र सुश्रुत सू. अ. ४३ में वमनविधान में मिलता है। यहां पर भी ये मूल श्लोक ही पढ़ने चाहिये। अर्थ अभिप्रेत नहीं है ।।१६-१७।।
हुतशेषस्याङ्गुष्ठमात्रं सुमृदितं कृत्वाऽऽलभ्य बालं ततोऽस्य मुखे दद्यात्त्रीणि पञ्च वा वारान्, प्राश्योपस्पृशेच्चैनम्; उत्थाप्योर्ध्वं द्वादशमासिकस्यान्नमभिलषतोऽल्पशश्रूमानि दद्यादिति ।।१८।।
अग्नि में आहुति देने से बचे हुए (यज्ञशेष) अन्न में से थोड़ा सा अन्न लेकर उसे अच्छी प्रकार नरम करके बालक के मुख में तीन या पांच बार देवे। तथा अन्न खिलाने के बाद उसे जल का आचमन कराये। तदनन्तर १२ मास का होने के बाद अन्न की इच्छा करने पर उसे निम्न खाद्य पदार्थ थोड़े २ खाने को देवे। अर्थात् दसवें मास में अन्नप्राशन संस्कार किया जाता है तथा उसके बाद एक वर्ष का होने पर उसे धीरे २ अन्य (आगे वर्णित) शालि, षष्टिक आदि लघु खाद्य पदार्थ देने चाहिये। दस मास से पूर्व दूध तथा फल का सेवन ही कराया जाता है। सुश्रुत में छठे मास में ही अन्न देने का विधान दिया है ।।१८।।
कुक्कुणकचिकित्सिताध्यायः १३] खिलस्थानम् ४८७
तत्र श्लोकाः— शालीनां षष्टिकानां वा पुराणानां विशेषतः। तण्डुलैर्निस्तुषैर्भृष्टैः क्षालितैः साधिता द्रवाः ।।१९।। सस्नेहलवणा लेह्या बालानां पुष्टिवर्धनाः। गोधूमानां तथा चूर्णं यवानां वाऽपि सात्म्यतः ।।२०।।
पुराने छिलके रहित तथा भुने हुए शालि एवं षष्टिक चावलों को धोकर सिद्ध किये हुए (बनाये हुए) द्रव में स्नेह एवं लवण मिलाकर अवलेह बनाये। ये बालकों के लिये पुष्टिवर्धक होते हैं। तथा सात्म्य के अनुसार गेहूँ तथा जौ का चूर्ण भी सेवन कराना चाहिये ।।१९-२०।।
विडङ्गलवणस्नेहैः पक्वोष्णं लेहनं हितम्। भृशं भिन्नपुरीषस्य कोद्रवानां (णां) निधापयेत् ।।२१।।
विडङ्ग लवण तथा घृत आदि स्नेह मिलाकर पकाकर बनाया हुआ उष्ण अवलेह बालकों के लिये हितकर होता है। यदि बालक को मल भेद (अतिसार) होने लग जाय तो इसी में कोरदूषक (कोदो) मिलाकर देना चाहिये ।।२१।।
मृद्धीकामधुसर्पींषि दद्यात् पित्तात्मनः सदा। मातुलुङ्गरसोपेतं वाते सलवणाशनम् ।।२२।।
यदि उनमें पित्त की अधिकता हो तो मुनक्का, मधु तथा घृत मिलाकर देना चाहिये तथा यदि वायु की अधिकता हो तो बिजौरे के रस के साथ लवणयुक्त भोजन दिया जाता है ।।
एकान्तरं द्व्यन्तरं वा देशाग्निवलकालवित्। यदा वा क्षुधितं पश्येत्तदैनं सात्म्यमाशयेत् ।।२३।।
देश (स्थान), अग्नि (जाठराग्नि), बालक के शारीरिक बल तथा काल (समय) को जाननेवाले व्यक्ति को चाहिये कि एक समय या दो समय छोड़कर अथवा जब भी बालक को भूख समझे तब उसे सात्म्य भोजन कराये ।।२३।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः।
(इति) खिलेषु जातकर्मोत्तरं नाम (द्वादशोऽध्यायः)
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
(इति) खिलेषु जातकर्मोत्तरं नाम (द्वादशोऽध्यायः) ।।१२।।
अथ कुक्कुणकचिकित्सिताध्यायस्त्रयोदशः।
अथातः कुक्कुणकचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ।।१।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।
अब हम कुक्कुणक चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। कुक्कुणक का अभिप्राय शिशुओं के नेत्रवर्त्मगत रोग से है। इसके विषय में योगरत्नाकर में कहा है कि यह बच्चों में होने बाला एक नेत्र रोग है। इसमें नेत्र कमजोर हो जाते हैं (Weakness of the eyes in Infants) तथा बालक सूर्य के प्रकाश या अन्य चमकीले पदार्थों को देखने में असमर्थ होता है ।।१-२।।
यदा माता कुमारस्य मधुराणि निषेवते। मत्स्यं मांसं पयः शाकं नवनीतं तथा दधि ।।३।।
| ४८८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | कुक्कुणकचिकित्सिताध्यायः १३] |
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सुरासवं पिष्टमयं तिलपिष्टाम्लकाञ्जिकम् । अभिष्यन्दीनि सर्वाणि काले काले निषेवते ॥४॥
भुक्त्वा भुक्त्वा दिवा शेते विसंज्ञा च विबुध्यते ।
तस्य दोषाः प्रकुपिता दूरं गत्वा च तिष्ठते ॥५॥
दोषेणावृतमार्गायास्ततः स्तन्यं च दुष्यते ।
जब शिशु की माता सदा मधुर द्रव्य, मछली, मांस, दूध, शाक, मक्खन, दधि, सुरा, आसव, उड़द की पिठ्ठी के बने हुए पदार्थ, तिल के बने हुए पदार्थ (तिलकुट आदि), खट्टी कांजी तथा सम्पूर्ण अभिष्यन्दि द्रव्यों का सेवन करती है, दिन में भोजन करते ही सो जाती है तथा संज्ञाशून्य हो जाती है—तब उस स्त्री के दोष प्रकुपित होकर शरीर में दूर जाकर स्थित हो जाते हैं तथा दोषों के द्वारा मार्गों के रुक जाने से उस स्त्री का दूध दूषित हो जाता है ॥३-५॥
प्रदुष्टदोषसंज्ञं तु यदा पिबति दारकः ॥६॥
लवणाम्लनिषेवित्वान्मातापुत्रौ रसादिह । आहारदोषात्तस्यास्तु बालस्यानन्नभोजिनः ॥७॥
अनुप्रवेशादाक्षेपादुष्णात्सत्त्वावनादपि । जायते नयनव्याधिः श्लेष्मलोहितसंभवः ॥८॥
दोषों के कारण दूषित हुए उस दूध को जब शिशु पीता है तब माता के लवण एवं अम्ल रस के सेवन करने से तथा उत्पन्न हुआ आहार दोष से–अन्न का सेवन न करनेवाले अर्थात् केवल दूध का पान करने वाले बालक में प्रवेश करके आक्षेप तथा उष्णता के कारण कफ तथा रक्त से उत्पन्न होनेवाला नेत्र रोग हो जाता है ॥६-८॥
अभीक्ष्णमस्रं स्रवते न च क्षीवति दुर्मनाः ।
नासिकां परिमृद्नाति कर्णं वाञ्छ(ह्य)ति दुःखितः ॥९॥
ललाटमक्षिकूटं च नासां च परिमर्दति । नेत्रे कण्डूयतेऽभीक्ष्णं पाणिना चाप्यतीव तु ॥१०॥
स प्रकाशं न सहते अश्रु चास्य प्रवर्तते । वर्त्मनि श्वयथुश्चास्य जानीयात्तं कुक्कुणकम् ॥११॥
कुक्कुणक के लक्षण—उसकी आंखों से निरन्तर पानी बहता रहता है, उसे छींक नहीं आती, उसका मन बड़ा अप्रसन्न रहता है, अत्यन्त दुखी हुआ अर्थात् कष्टपूर्वक वह नासिका तथा कानों को कुरेदता रहता है, ललाट (माथा), आंखों तथा नाक को मसलता है, आंखों में बहुत अधिक खाज चलती है जिससे वह उन्हें हाथों से रगड़ता है, वह प्रकाश (रोशनी–चमक–Light) को सहन नहीं कर सकता है, आंखों से अश्रु (पानी–Lacrimation) बहते रहते हैं तथा नेत्रवर्त्म (नेत्र पक्ष्म) में शोथ हो जाती है। ये कुक्कुणक के लक्षण हैं ॥९-११॥
तस्य चिकित्सितं श्रेष्ठं व्याख्यास्यामि यथा तथा ।
धात्रीं तु तस्य वामयेद्युक्तं चैव विपाचयेत् ॥१२॥
तस्या वान्तविरिक्ताया निर्दुह्य च स्तनावुभौ । भोजनानि च सर्वाणि यथायुक्तं प्रदापयेत् ॥१३॥
पथ्यं भुञ्जीत खादेत विपरीतं च वर्जयेत् । प्रयता शुद्धवस्त्रा स्यादक्लिष्टाऽमलिना तथा ॥१४॥
उसकी श्रेष्ठ चिकित्सा का मैं यथाविधि वर्णन करूंगा—उस बालक की धात्री को वमन कराये तथा युक्तिपूर्वक उसके दोषों का पाचन करे। वमन तथा विरेचन के बाद उसके दोनों स्तनों का दोहन करे अर्थात् स्तनों से (Breast pump) इत्यादि द्वारा दूध निकाल दे तथा उसके बाद उसे युक्तिपूर्वक सम्पूर्ण पथ्य भोजन खाने के लिये देवे और अपथ्य भोजन का त्याग कर दे। निर्मल वस्त्र धारण करे, क्लेशयुक्त न रहे तथा वह साफ सुथरी रहे ॥१२-१४॥
ततो वर्त्मनि बालस्य निर्भुज्याथ प्रमृज्य च । निर्मुच्य रुधिरं दुष्टं कुर्याच्छिरोऽवसेचनम् ॥१५॥
कुक्कुणकचिकित्सिताध्यायः १३] खिलस्थानम् ४८९
तदनन्तर उस बालक की आंखों को अच्छी तरह खोलकर साफ करे तथा उनमें से दूषित रक्त निकाल कर पानी के छींटे देवे ॥१५॥
एरण्डं रोहिषं चैव त्वक्क्षीरीं वरुणं तथा । निष्क्वाथ्यमेतत् कृत्वा च कुमारं परिषेचयेत् ॥१६॥
एरण्ड, रोहिष (गन्धतृण), त्वक्क्षीरी (तवाशीर–वंशलोचन) तथा वरुण–इनका क्वाथ बनाकर बालक का परिषेचन करे ॥१६॥
फणिज्झकस्य पत्राणि सुरसस्य च पीडयेत् । जातिप्रसन्नामण्डेन यष्टीमधुकमेव च ॥१७॥
एतदाश्चोतनं तस्य शारदेन जलेन तु । त्र्यहमेतत् प्रयुञ्जीत द्व्यहं वाऽपि विधानवित् ॥१८॥
चिकित्सा कार्य को जानने वाले वैद्य. को चाहिये कि वह फणिज्झक (तुलसीभेद) तथा तुलसी के पत्तों का पीडन करके रस निकाल ले । उसमें जाति (चमेली के पत्तों का रस, प्रसन्ना (मद्य विशेष), मण्ड तथा मधुयष्टि मिलाकर उससे अथवा शीतल जल से तीन या दो दिन तक उसकी आंख का आश्च्योतन (नेत्र सेचन) करे ।
वक्तव्य—भिन्न २ ओषधियों के क्वाथ, मधु, स्नेह आदि के द्वारा नेत्रों के तर्पण करने को आश्च्योतन कहते हैं ॥१७-१८॥
ने(भे)कराजस्य पत्राणि बिल्वस्याच्छवनां तथा । सुराग्रमण्डसंपिष्टं श्रेष्ठमाश्चोतनं मतम् ॥१९॥
भृङ्गराज के पत्ते तथा बिल्व की अच्छ (गोंद) और पत्र स्वरस (अथवा अच्छवन को एक सम्मिलित शब्द मानने से बिल्व के पत्तों का निर्मल स्वरस—यह अर्थ होगा) को सुरामण्ड में पीसने से उत्तम आश्च्योतन बनता है ॥१९॥
कोलायुत्क्वाथ्य कल्कं वा यष्टीमधुकसंयुतम् । नेत्रामये मुखालेपः कश्यपस्तत्प्रशंसति ॥२०॥
कोल (बेर) के क्वाथ अथवा उसके कल्क को मुलहठी के साथ मिलाकर नेत्ररोगों में मुख पर लेप किया जाता है । इस लेप की महर्षि कश्यप प्रशंसा करते हैं ॥२०॥
ने(भे)कराजीं च नीलीं च सुरसं गौरसर्षपाः ।
हरिद्रां चैव तत् सर्वं कल्कं कुर्वीत भागशः ॥२१॥
एतदालेपनं कुर्याद्रोगघ्नं नयनामये । वेदनामक्षिरोगं च क्षिप्रमवापकर्षति ॥२२॥
भृङ्गराज, नील, तुलसी, श्वेत सरसों तथा हल्दी को यथायोग्य परिमाण में लेकर इनका कल्क बनाये । नेत्ररोगों में उपर्युक्त रोगनाशक लेप का प्रयोग करना चाहिये । यह नेत्रों में वेदना (पीड़ा) तथा अन्य नेत्ररोगों को नष्ट करता है ॥
हरिद्रात्वचमाहृत्य पिप्पलीं चाथ भागशः । वरप्रसन्नया मण्डं कुर्यादञ्जनवर्तिकाम् ॥२३॥
पिल्लिका चोपलेपश्च नेत्रयोस्तेन शाम्यति । अथास्याश्च्योतनं कुर्यात् सौवीर¹कमनुत्तमम् ।
हल्दी के छिलके तथा पिप्पली को योग्य परिमाण में लेकर उत्तम प्रसन्ना (मद्यविशेष) के मण्ड (उपरितन स्वच्छभाग) के साथ मिलाकर अञ्जनवर्ती बनाये । इस अञ्जन के प्रयोग से नेत्रगत पिल्लिका (क्लिन्न नेत्ररोग) तथा उपलेप (नेत्रों का लिप्त सा रहना) रोग शान्त होते हैं । तदनन्तर श्रेष्ठ सौवीरक (कांजी) से उसकी आंख का आश्च्योतन करे ।
वक्तव्य—अष्टाङ्गहृदय उ. अ. १६ में उत्क्लिष्ट आदि १८ नेत्ररोगों को पिल्ल नाम से कहा है ॥२३॥
१. सौवीरकमत्र संधानविशेषः ।
४९० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् कुक्कुणकचिकित्सिताध्यायः १३]
प्रपौण्डरीकं लोध्रं च हरिद्रां शर्करां मधु ।।२४।।
(इति ताडपत्रपुस्तके २३२ तमं पत्रम् ।)
परिषेको भवेच्छ्रेष्ठो जलेनोष्णेन योजयेत् । अक्षिरोगेषु सर्वेषु योग एष प्रशस्यते ।। २५ ।।
आचार्यानुमतं श्रेष्ठं रात्रौ चैनं प्रयोजयेत् ।
पुण्डरीक, लोध्र, हल्दी, शर्करा तथा मधु—इनमें उष्णजल मिलाकर उसके द्वारा आंखों का परिषेक करना चाहिये । सम्पूर्ण अक्षिरोगों में आचार्य ने इसे श्रेष्ठ योग माना है तथा इसका रात्रि में प्रयोग करना चाहिये ।
वक्तव्य—आश्च्योतन का प्रयोग रात्रि में ही करना चाहिये । क्योंकि आश्च्योतन के द्वारा नेत्रों का विरेचन हो जाने के बाद नेत्र दुर्बल हो जाते हैं । यदि यह दिन के समय प्रयुक्त किया जायगा तो दुर्बल हुई दृष्टि सूर्य के प्रकाश में कष्ट को अनुभव करती है अतः दिन में आश्च्योतन आदि तीव्र प्रयोगों का व्यवहार नहीं करना चाहिये । ऐसा चरक सू. अ. ५ में भी कहा है ।।२४-२५।।
आटरूषकपत्राणि मधूकं सैन्धवं तथा ।।२६।।
पुण्डरीकस्य पत्राणि तथा नीलोत्पलानि च । सुखोदकेन संयुक्तः परिषेको हितो भवेत् ।।२७।।
कफात्मके त्वभिष्यन्दे सिद्धमेतं नराधिपः ।
हे राजन् ! बांसे के पत्ते, मुलहठी, सैन्धव, पुण्डरीक (कमल) तथा नील कमल के पत्ते—इन सबको ईषदुष्ण जल में मिलाकर सिद्ध करें । यह परिषेक कफाभिष्यन्द में हितकर माना गया है ।।२६-२७।।
अमृतायास्तु निष्क्वाथे कुष्ठं च गुडमेव च ।।२८।।
विनीय पिष्टं तोयेन परिषेकोऽक्षिरोगिणाम् ।
गिलोय के क्वाथ में कुष्ठ तथा गुड को पीसकर उस जल के द्वारा नेत्ररोगों में परिषेक करना चाहिये ।।२८।।
परिषेकास्तु बलानां दन्तजन्मनि ये मया ।। २९ ।।
कीर्तितास्ते प्रयोक्तव्याः परिभूताक्षिरोगिषु ।
बालकों के दांतों की उत्पत्ति के समय मैंने पहले जिन परिषेकों का वर्णन किया है उनका इन सम्पूर्ण अक्षिरोगों में प्रयोग करना चाहिये ।।२९।।
गव्येन मधुना पिष्ट्वा शङ्खेन सह सैन्धवम् ।। ३० ।।
सप्तरात्रं प्रलेप्यं तु तेन स्त्रौतसमञ्जनम् । तं पिष्ट्वा गुडिकां कृत्वा छायायां परिशोषयेत् ।। ३१ ।।
पुष्ये सर्वासु सिद्धास्ता गुडिकाः पत्रसन्निभाः ।
पृश्निपर्ण्यास्तु भागौ द्वावंशुमत्यास्तथा भवेत् ।। ३२ ।।
त्रयश्चैवोरुपूगस्य बृहत्या भागमेव तु । रजसश्चायसश्चाथ तथा ताम्रायसस्य च ।। ३३ ।।
अजाक्षीरेण पिष्ट्वा तु शोषयेद् गुटिकां कृताम् ।
अजानां लिण्डिकाभिस्ताः शमीपत्रैश्च धूपयेत् ।। ३४ ।।
१. प्रसन्ना सुराग्रं च सुराया उपरितनो मण्डभागः ।