काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकुक्कुणकचिकित्सिताध्यायः १३] खिलस्थानम् ४८९
तदनन्तर उस बालक की आंखों को अच्छी तरह खोलकर साफ करे तथा उनमें से दूषित रक्त निकाल कर पानी के छींटे देवे ॥१५॥
एरण्डं रोहिषं चैव त्वक्क्षीरीं वरुणं तथा । निष्क्वाथ्यमेतत् कृत्वा च कुमारं परिषेचयेत् ॥१६॥
एरण्ड, रोहिष (गन्धतृण), त्वक्क्षीरी (तवाशीर–वंशलोचन) तथा वरुण–इनका क्वाथ बनाकर बालक का परिषेचन करे ॥१६॥
फणिज्झकस्य पत्राणि सुरसस्य च पीडयेत् । जातिप्रसन्नामण्डेन यष्टीमधुकमेव च ॥१७॥
एतदाश्चोतनं तस्य शारदेन जलेन तु । त्र्यहमेतत् प्रयुञ्जीत द्व्यहं वाऽपि विधानवित् ॥१८॥
चिकित्सा कार्य को जानने वाले वैद्य. को चाहिये कि वह फणिज्झक (तुलसीभेद) तथा तुलसी के पत्तों का पीडन करके रस निकाल ले । उसमें जाति (चमेली के पत्तों का रस, प्रसन्ना (मद्य विशेष), मण्ड तथा मधुयष्टि मिलाकर उससे अथवा शीतल जल से तीन या दो दिन तक उसकी आंख का आश्च्योतन (नेत्र सेचन) करे ।
वक्तव्य—भिन्न २ ओषधियों के क्वाथ, मधु, स्नेह आदि के द्वारा नेत्रों के तर्पण करने को आश्च्योतन कहते हैं ॥१७-१८॥
ने(भे)कराजस्य पत्राणि बिल्वस्याच्छवनां तथा । सुराग्रमण्डसंपिष्टं श्रेष्ठमाश्चोतनं मतम् ॥१९॥
भृङ्गराज के पत्ते तथा बिल्व की अच्छ (गोंद) और पत्र स्वरस (अथवा अच्छवन को एक सम्मिलित शब्द मानने से बिल्व के पत्तों का निर्मल स्वरस—यह अर्थ होगा) को सुरामण्ड में पीसने से उत्तम आश्च्योतन बनता है ॥१९॥
कोलायुत्क्वाथ्य कल्कं वा यष्टीमधुकसंयुतम् । नेत्रामये मुखालेपः कश्यपस्तत्प्रशंसति ॥२०॥
कोल (बेर) के क्वाथ अथवा उसके कल्क को मुलहठी के साथ मिलाकर नेत्ररोगों में मुख पर लेप किया जाता है । इस लेप की महर्षि कश्यप प्रशंसा करते हैं ॥२०॥
ने(भे)कराजीं च नीलीं च सुरसं गौरसर्षपाः ।
हरिद्रां चैव तत् सर्वं कल्कं कुर्वीत भागशः ॥२१॥
एतदालेपनं कुर्याद्रोगघ्नं नयनामये । वेदनामक्षिरोगं च क्षिप्रमवापकर्षति ॥२२॥
भृङ्गराज, नील, तुलसी, श्वेत सरसों तथा हल्दी को यथायोग्य परिमाण में लेकर इनका कल्क बनाये । नेत्ररोगों में उपर्युक्त रोगनाशक लेप का प्रयोग करना चाहिये । यह नेत्रों में वेदना (पीड़ा) तथा अन्य नेत्ररोगों को नष्ट करता है ॥
हरिद्रात्वचमाहृत्य पिप्पलीं चाथ भागशः । वरप्रसन्नया मण्डं कुर्यादञ्जनवर्तिकाम् ॥२३॥
पिल्लिका चोपलेपश्च नेत्रयोस्तेन शाम्यति । अथास्याश्च्योतनं कुर्यात् सौवीर¹कमनुत्तमम् ।
हल्दी के छिलके तथा पिप्पली को योग्य परिमाण में लेकर उत्तम प्रसन्ना (मद्यविशेष) के मण्ड (उपरितन स्वच्छभाग) के साथ मिलाकर अञ्जनवर्ती बनाये । इस अञ्जन के प्रयोग से नेत्रगत पिल्लिका (क्लिन्न नेत्ररोग) तथा उपलेप (नेत्रों का लिप्त सा रहना) रोग शान्त होते हैं । तदनन्तर श्रेष्ठ सौवीरक (कांजी) से उसकी आंख का आश्च्योतन करे ।
वक्तव्य—अष्टाङ्गहृदय उ. अ. १६ में उत्क्लिष्ट आदि १८ नेत्ररोगों को पिल्ल नाम से कहा है ॥२३॥
१. सौवीरकमत्र संधानविशेषः ।