भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 850

४९० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् कुक्कुणकचिकित्सिताध्यायः १३]

प्रपौण्डरीकं लोध्रं च हरिद्रां शर्करां मधु ।।२४।।
(इति ताडपत्रपुस्तके २३२ तमं पत्रम् ।)

परिषेको भवेच्छ्रेष्ठो जलेनोष्णेन योजयेत् । अक्षिरोगेषु सर्वेषु योग एष प्रशस्यते ।। २५ ।।
आचार्यानुमतं श्रेष्ठं रात्रौ चैनं प्रयोजयेत् ।

पुण्डरीक, लोध्र, हल्दी, शर्करा तथा मधु—इनमें उष्णजल मिलाकर उसके द्वारा आंखों का परिषेक करना चाहिये । सम्पूर्ण अक्षिरोगों में आचार्य ने इसे श्रेष्ठ योग माना है तथा इसका रात्रि में प्रयोग करना चाहिये ।

वक्तव्य—आश्च्योतन का प्रयोग रात्रि में ही करना चाहिये । क्योंकि आश्च्योतन के द्वारा नेत्रों का विरेचन हो जाने के बाद नेत्र दुर्बल हो जाते हैं । यदि यह दिन के समय प्रयुक्त किया जायगा तो दुर्बल हुई दृष्टि सूर्य के प्रकाश में कष्ट को अनुभव करती है अतः दिन में आश्च्योतन आदि तीव्र प्रयोगों का व्यवहार नहीं करना चाहिये । ऐसा चरक सू. अ. ५ में भी कहा है ।।२४-२५।।

आटरूषकपत्राणि मधूकं सैन्धवं तथा ।।२६।।
पुण्डरीकस्य पत्राणि तथा नीलोत्पलानि च । सुखोदकेन संयुक्तः परिषेको हितो भवेत् ।।२७।।
कफात्मके त्वभिष्यन्दे सिद्धमेतं नराधिपः ।

हे राजन् ! बांसे के पत्ते, मुलहठी, सैन्धव, पुण्डरीक (कमल) तथा नील कमल के पत्ते—इन सबको ईषदुष्ण जल में मिलाकर सिद्ध करें । यह परिषेक कफाभिष्यन्द में हितकर माना गया है ।।२६-२७।।

अमृतायास्तु निष्क्वाथे कुष्ठं च गुडमेव च ।।२८।।
विनीय पिष्टं तोयेन परिषेकोऽक्षिरोगिणाम् ।

गिलोय के क्वाथ में कुष्ठ तथा गुड को पीसकर उस जल के द्वारा नेत्ररोगों में परिषेक करना चाहिये ।।२८।।

परिषेकास्तु बलानां दन्तजन्मनि ये मया ।। २९ ।।
कीर्तितास्ते प्रयोक्तव्याः परिभूताक्षिरोगिषु ।

बालकों के दांतों की उत्पत्ति के समय मैंने पहले जिन परिषेकों का वर्णन किया है उनका इन सम्पूर्ण अक्षिरोगों में प्रयोग करना चाहिये ।।२९।।

गव्येन मधुना पिष्ट्वा शङ्खेन सह सैन्धवम् ।। ३० ।।
सप्तरात्रं प्रलेप्यं तु तेन स्त्रौतसमञ्जनम् । तं पिष्ट्वा गुडिकां कृत्वा छायायां परिशोषयेत् ।। ३१ ।।
पुष्ये सर्वासु सिद्धास्ता गुडिकाः पत्रसन्निभाः ।
पृश्निपर्ण्यास्तु भागौ द्वावंशुमत्यास्तथा भवेत् ।। ३२ ।।
त्रयश्चैवोरुपूगस्य बृहत्या भागमेव तु । रजसश्चायसश्चाथ तथा ताम्रायसस्य च ।। ३३ ।।
अजाक्षीरेण पिष्ट्वा तु शोषयेद् गुटिकां कृताम् ।
अजानां लिण्डिकाभिस्ताः शमीपत्रैश्च धूपयेत् ।। ३४ ।।


१. प्रसन्ना सुराग्रं च सुराया उपरितनो मण्डभागः ।