भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 851

कुक्कुणकचिकित्सिताध्यायः १३] खिलस्थानम् ४९१

तथैवार्द्राश्च शुष्काश्च बालानामक्षिरोगके । रसाञ्जनं च यन्मुख्यं हरिद्रात्वचमेव च ।। ३५ ।। प्रसन्नयाऽञ्जनं त्वेतत् कुर्यादञ्जनवतिकाम् ।

गोधृत (अथवा गोमूत्र या गो दुग्ध), मधु और शंख के साथ सैन्धव नमक को पीसकर सात दिन तक उसका स्रोतोञ्जन पर लेप करना चाहिये । तदनन्तर उस स्रोतोञ्जन को पीसकर जल के साथ गोलियां बनाकर छाया में सुखा दे । पुष्य नक्षत्र में वे सब सिद्ध की हुई गोलियां, पृश्निपर्णी तथा अंशुमती (शालिपर्णी) दो भाग, श्वेत एरण्ड तथा बृहती ३ भाग इसी प्रकार लोहचूर्ण तथा ताम्रचूर्ण भी ३-३ भाग । इन सबको बकरी के दूध में पीसकर गोलियां बनाकर उन्हें सुखा ले । उन गोलियों का बकरी की मेंगनी तथा शमी के पत्तों से धूपन करे । इस प्रकार उन आर्द्र (गीली) तथा शुष्क गोलियों को रसौंत तथा हल्दी की त्वचा के साथ सुरामण्ड से पीसकर अञ्जनवर्तिका बनाये ।।३०-३५।।

पिप्पलीं शृङ्गबेरं च समभागानि पेषयेत् ।। ३६ ।। सुराग्रेण ततः कुर्यात् पिल्लिकाञ्जनवतिकाम् ।

इसी प्रकार पिप्पली तथा आर्द्रक को समभाग में लेकर सुराग्र (सुरामण्ड) के साथ पीसकर पिल्लिका रोग के लिये अञ्जनवर्ती बनाये ।। ३६ ।।

अथवाऽतिभवेन्नेत्रशूलं बालस्य लक्षयेत् ।। ३७ ।। स्तब्धनेत्रश्च दृश्येत तत्रेमं विधिमाचरेत् । पिप्पलीं शृङ्गबेरं च पर्णानि सुरसस्य च ।। ३८ ।। कालमालकपर्णानि तथैव च कुठेरकम् । तं प्रपिष्य सुराग्रेण कुर्यादञ्जनवतिकाम् ।। ३९ ।। पिल्लिकामुपदेहं च न चिरादेव नाशयेत् ।

अथवा यदि बालक के नेत्रशूल बहुत अधिक हो या नेत्र स्तब्ध दिखाई दें तो निम्न विधि का प्रयोग करना चाहिये— पिप्पली, आर्द्रक, तुलसी, काली तुलसी तथा कुठेरक (कुलसी भेद)—इन सबको सुरामण्ड से पीसकर अञ्जनवर्ती बनाये । यह पिल्लिका तथा उपदेह रोग (उपलेह) को शीघ्र ही नष्ट कर देता है ।।३७-३९।।

कपित्थस्याथ बिल्वस्य खदिरस्य च पेषयेत् ।। ४० ।। अजाक्षीरस्य पात्रं च ततः श्च्योतनमुत्तमम् ।

कपित्थ (कैथ), बिल्व तथा खदिर को बकरी के दूध में पीस ले । यह उत्तम आश्च्योतन है ।।४०।।

कपित्थस्याऽटजीनां च पत्राणि सुरसस्य च ।। ४१ ।। अजाक्षीरेण पिष्टानि कुर्यादाश्च्योतनं भिषक् ।

कपित्थ, अटजी तथा तुलसी के पत्तों को बकरी के दूध में पीसकर उससे आश्च्योतन करे ।।४१।।

मधुकं १पर्वतीयां च हरिद्रां पेषयेत् समाम् ।। ४२ ।। अजाक्षीरेण तत् कुर्यादाश्च्योतनमनुत्तमम् ।

मुलहठी तथा दारुहल्दी को समान मात्रा में लेकर बकरी के दूध में पीस ले । यह उत्तम आश्च्योतन है ।।४२।।

सपिर्मण्डं सुराग्रं च ऐन्द्रीं चन्दनमेव च ।। ४३ ।। सलिलेन प्रपिष्टानि कुर्यादञ्जनवतिकाम् ।


१. पर्वतीयां हरिद्रां दारुहरिद्रामित्यर्थः ।