भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 852

४९२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् कुक्कुणकचिकित्सिताध्यायः १३]

घृतमण्ड, सुराग्र (सुरा का ऊपर का स्वच्छभाग), ऐन्द्री (इन्द्रवारुणी अथवा गोरक्षकर्कटी) तथा चन्दन की पानी से पीसकर अञ्जनवर्ती बनाये ॥४३॥

पद्मकं चोत्पलं चैव मधुकं च प्रपेषयेत् ।।४४।।
अक्षिरोगे मुखालेपमजाक्षीरेण शर्कराम् ।

पद्माख (पद्मकाष्ठ), कमल, मुलहठी तथा शर्करा को बकरी के दूध में पीसकर अक्षिरोग के लिये मुखालेप तैयार करे ॥

शृङ्गबेरोऽथ मञ्जिष्ठा कार्पासकुलकानि च ।।४५।।
सलिलेन प्रपिष्टानि मुखालेपनमुत्तमम् ।

आर्द्रक, मञ्जीठ, कपास तथा कुलक (पटोल) को पानी से पीसकर उत्तम मुखालेपन बनाया जाता है ॥४५॥

त्रिफलामञ्जनं चैव तथैव च रसाञ्जनम् ।।४६।।
मधुना समभागानि कुर्यादाशु रसक्रियाम् ।

त्रिफला, अञ्जन (सुरमा-Lead) तथा रसाञ्जन समभाग लेकर मधु से पीसकर रसक्रिया बनाई जाती है ॥४६॥

पिप्पलीं शृङ्गबेरं च मरिचानि तथाऽञ्जनम् ।।४७।।
त्रिफलां शङ्खनाभिं च सैन्धवं ताम्रजं रजः ।
एते भागाः समाः पिष्टाश्छायायां गुडिकाः कृताः ।।४८।।
शोषयित्वा विकारेषु नैकजेषु प्रदापयेत् । तिमिरे तोयसंसृष्टा कोथके मार्कवेन तु ।।४९।।

पिप्पली, आर्द्रक, मरिच, अञ्जन, त्रिफला, शङ्खनाभि, सैन्धव, ताम्रचूर्ण-समभाग लेकर, पीसकर और गोलियां बना कर छाया में सुखा ले । ये गोलियां अनेक रोगों में प्रयुक्त की जाती हैं । उदाहरण के लिये तिमिररोग में पानी तथा कोथरोग (नेत्ररोग भेद) में मकोय के रस के साथ इनका प्रयोग किया जाता है ।

**वक्तव्य—**लिङ्गनाश नामक नेत्ररोग को तिमिर कहते हैं यह नेत्र के चतुर्थ पटल में होता है । इसमें दिखाई देना बन्द हो जाता है । तथा अन्त में Perception of light भी समाप्त हो जाती है ॥४७-४९॥

रसेन पिष्ट्वा सिद्धस्य द्राक्षाक्षुद्रोदकेन तु । गुडिका कोकिला नाम चक्षुर्व्याधिषु संमता ।।५०।।
हितभोजिषु योक्तव्या बालेषु भिषगुत्तमैः ।

**कोकिला गुटिका—**अथवा सिद्ध (काला धतूरा या काली निर्गुण्डी) के रस या मुनक्का और क्षुद्रा (कैंटर्य अथवा रक्त पुनर्नवा) के रस से कोकिला नाम की गोलयां बनाई जाती हैं । ये नेत्र रोगों में उत्तम मानी गई हैं । श्रेष्ठ चिकित्सक को चाहिये कि पथ्य भोजन करने वाले बालकों में इसका प्रयोग कराये ॥५०॥

निर्यासो नक्तमालस्य घृतमण्डेन साधितः ।।५१।।
स्तन्यक्षीरेण तिमिरे कण्डौ चैव हितो भवेत् ।

करञ्ज के निर्यास (गोंद) को घृतमण्ड से सिद्ध करके उसे स्त्री के दूध के साथ देने से तिमिर तथा नेत्रकण्डू रोम में हितकारी होता है ॥५१॥

सुवर्णगैरिकं लाक्षा सैन्धवं मरिचानि च ।।५२।।