भारतकोश
काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ

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पृष्ठ 853

कुक्कुणकचिकित्सिताध्यायः १३] खिलस्थानम् ४९३

सशर्करं त्रिकटुकं गुटिकां ह्युपकल्पयेत्। एषा लोहितिका नाम गुडिका तु स्मृता बुधैः ॥५३॥
प्रयोक्तव्याऽक्षिसंरम्भे क्षिप्रं निर्वाणमिच्छता।

लोहितिका गुटिका—स्वर्णगैरिक, लाख, सैन्धव नमक, मरिच, शर्करा, त्रिकटु—इन सबको मिलाकर गुटिकाएं बनाये। विद्वानों द्वारा ये लोहितिका नामक गुटिका कहलाती हैं। शीघ्र आरोग्य चाहने वालों को अक्षिरोगों में इनका प्रयोग करना चाहिये ॥५२-५३॥

पिप्पल्यास्त्रिफला चैव वचा कटुकरोहिणी ॥५४॥
षडेताः समभागाः स्युः सप्तमं ताम्रजं रजः। जलपिष्टा भवेदेताः सूर्यतप्ताः पुनः पुनः ॥५५॥
गुडिकाः कारयेत्ता हि छायायां परिशोषयेत् ॥५६॥
रूक्षां घृतेन पिष्टां दुग्धेनाजेन कोथके दद्यात्।
पाषावरसेन तिमिरे राजिषु मधुकेन देया तु ॥५७॥
कोथके मर्मजे सर्वा सर्वाभिष्यन्द एव च। सैन्धवेन समायुक्ता हन्यात् कण्डूं जलान्विता ॥५८॥

पिप्पली, त्रिफला, (हरड़, बहेड़ा, आंवला), बच तथा कुटकी-ये छओं समभाग तथा सातवां ताम्रचूर्ण-इन सबको जल में पीसकर तथा बार २ धूप में रखकर गोलियां बनाकर छाया में सुखा ले। फिर उन रूक्ष गोलियों को घी में पीसकर कोथरोग (नेत्ररोग विशेष) में बकरी के दूध से देवे। तिमिर रोग में इसे घास के रस से तथा राजिरोग में मुलहठी के साथ देना चाहिये। कोथरोग, मर्म तथा सम्पूर्ण नेत्राभिष्यन्द रोगों में सैन्धव के साथ एवं नेत्रकण्डू में जल के साथ देना चाहिये ॥५३-५८॥

द्वीपिशत्रोश्च पत्राणि निष्क्वाथमुपहारयेत्। एतेन चाक्षिरोगं तु कोष्णेन परिषेचयेत् ॥५९॥
द्वीपी (चित्रक) तथा शत्रु (अम्लवेतस) के पत्तों का क्वाथ बनाये। इस उष्ण क्वाथ से नेत्र रोगों में परिषेचन करे ॥

सरलं मधुकं चैव देवदारुं च पेषयेत्। कल्केनैतेन वदनं वेदनासु प्रलेपयेत् ॥६०॥
सरल (चीड़), मुलहठी तथा देवदारु को पीसकर कल्क बनाये। वेदना (पीडा) में इस कल्क का मुख पर लेप करे ॥

रसाञ्जनं तार्क्ष्यशिलां क्षौद्रेण सह संयुताम्। आश्च्योतनं प्रयुञ्जीत नेत्रव्याधिविनाशनम् ॥६१॥
नेत्ररोगों को नष्ट करने के लिये तार्क्ष्य पर्वत पर उत्पन्न होने वाली रसाञ्जन (रसौंत) को मधु में मिलाकर उसका आश्च्योतन करना चाहिये ॥६१॥

शर्करां शृङ्गबेरं च स्तन्यं गोपित्तमेव च। रसाञ्जनं समधुकं कुर्यादाश्च्योतनं भिषक् ॥६२॥
शर्करा, आर्द्रक, दूध, गोपित्त (गोरोचन) तथा रसाञ्जन आदि का मधु में मिलाकर आश्च्योतन करना चाहिये ॥६२॥

हरिद्रां शङ्खनाभिं च सलिलेन प्रपेषयेत्।
(इति ताडपत्रपुस्तके २३३ तमं पत्रम्)
क्षीरस्य मात्रया चैव कुर्यादाश्च्योतनं हितम् ॥६३॥
हल्दी तथा शंखनाभि को पानी से पीसकर उसमें थोड़ा दूध मिलादे। इसका आश्च्योतन करना चाहिये ॥६३॥

हरिद्रां पर्वतीयां तु सूर्यतेजसि पाचयेत्। ताम्रपट्टेषु पिष्टां च सारसेनावसेचयेत् ॥६४॥
शीतं च परिपूतं च स्तन्येन सह संयुतम्। आश्च्योतनं प्रयुञ्जीत नेत्रव्याधिविनाशनम् ॥६५॥