काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 854, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें४९४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् कुक्कुणकचिकित्सिताध्यायः १३]
दारुहरिद्रा को सूर्य के ताप में खूब पकाकर ताम्बे की शिलाओं पर उसे पीसले। फिर उसमें तालाब का जल मिलाले। ठण्डा होने पर उसे छानकर उसमें दूध मिलाकर आश्च्योतन का प्रयोग करे। यह नेत्ररोगों को नष्ट करता है॥
सर्पिषश्च भवेद्भागः क्षौद्रेण द्विगुणं भवेत्। तत्काले प्रलिपेद्धालो नेत्रव्याधौ प्रमुच्यते ॥६६॥
नेत्ररोग में एक भाग घी तथा दो भाग मधु मिलाकर लेप करने से बालक तत्काल रोग से मुक्त हो जाता है ॥६६॥
हरिद्रां शङ्खनाभिं च भद्रमुस्तं च काठकम्। पिष्ट्वा व्याघ्रनखं चैव मधुकं चैव भागशः ॥६७॥
शिरीषबीजं प्रथमं ताभ्यां कुर्वीत पूपिकाम्। ताम्रपात्रे सतैलास्ताः सूर्यतेजसि पाचिताः ॥६८॥
द्वादशेऽह्नि निवाते च नीरजस्काः प्रयत्नतः। शिलामये ततो भाण्डे तैलं तां चैव पूपिकाम् ॥६९॥
आतुराण्युथ नेत्राणि तैलेनानेन पूरयेत्। व्याधिमाशु नृणां हन्ति प्रयोगश्चैत् प्रशस्यते ॥७०॥
हरिद्रा, शंखनाभि, नागरमोथा, व्याघ्रनखी, मुलहठी तथा सिरस के बीज—यथायोग्य परिमाण में लेकर पीसकर इनके अपूप (पूड़े) बनाये। ताम्र के बर्तन में तैल डालकर सूर्य के ताप में उन्हें पकाये। १२ वें दिन वायु एवं धूलि रहित स्थान में उन अपूप तथा तैल को एक पत्थर के बर्तन में रखे। ये अपूप रोगी को खिलाये तथा उस तैल के द्वारा रोगी के नेत्रों का पूरण (आश्च्योतन) करे। यदि यह योग प्रशस्त हो तो मनुष्यों के रोग को शीघ्र ही नष्ट कर देता है॥
हरीतकीमामलकीं हरिद्रां गिरिजामपि। मधुकं च समं सर्वं सलिलेन प्रपेषयेत् ॥७१॥
एतदाश्च्योतनं मुख्यं व्याधीनां शमनं हितम्।
स्थविराणां शिशूनां च एतदाश्च्योतनं हितम् ॥७२॥
हरड़, आंवला, दारुहरिद्रा तथा मुलहठी सब समभाग लेकर पानी से पीसले। यह मुख्य आश्च्योतन है। यह नेत्र रोगों को शान्त करता है। यह आश्च्योतन वृद्ध पुरुषों तथा शिशुओं के लिये हितकर होता है ॥७१-७२॥
हरिद्राशकलीकानामार्द्राणां कर्षमावपेत्। ताम्रपात्रे मितं दद्यात् सारमस्याढकं मितम् ॥७३॥
दशभागावशेषं तु मृद्वग्निमुपसाधितम्। शीतं च परिपूतं च मुख्यमाश्योतनं हितम् ॥७४॥
एक ताम्र पात्र में ताजी हल्दी तथा शकली (मृद्गिल नामक मछली) का एक १ कर्ष लेकर उसमें एक आढक उपर्युक्त वस्तुओं का रस डालदे। उसे मृदु अग्नि पर पकाकर दसवां हिस्सा शेष रखे। उसे ठण्डा करके छानने से मुख्य आश्च्योतन बन जाता है ॥७३-७४॥
शकलीकमथाक्षीणां धारयेन्नयनामये। ग्रीवायामुत्तमाङ्गे वा तथा रोगात् प्रमुच्यते ॥७५॥
नेत्ररोगों में नेत्र, ग्रीवा तथा उत्तमाङ्ग में मृद्गिल मछली को धारण करे। इससे नेत्ररोगों से मुक्ति हो जाती है ॥७५॥
आलङ्कतकमूलानि वास्तुकस्य यवस्य च।
आघृष्य नव (?) एषां तु मूर्ध्नि कुर्वीत कण्टकान् ॥७६॥
अक्षिरोगं शिरोरोगं सर्वमेतेन शाम्यति।
आल (हरिताल), कतक (निर्मली बीज), बथुआ और जौ के नवीन मूल लेकर तथा घिसकर उनके द्वारा सिर पर कण्टकाकार चिह्न बना दे। इस प्रयोग से सम्पूर्ण नेत्ररोग तथा शिरोरोग शान्त हो जाते हैं ॥७६॥
बलामतिबलां चैव त्रिवृतां चैव गर्भिणी ॥७७॥
सव्ये पाणिपुटे कृत्वा पीडयेत्तमपूर्वकः। तं रसं क्षौद्रसंसृष्टं कण्ठमस्याः प्रलेपयेत् ॥७८॥