काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकुक्कुणकचिकित्सिताध्यायः १३] खिलस्थानम् ४९५
कोई गर्भिणी स्त्री बला, अतिबला तथा त्रिवृत् को अपने बांये हाथ में लेकर दबाकर अच्छी तरह रस निकाले। इस रस में मधु मिलाकर उस गर्भिणी स्त्री के कण्ठ में लेप करदे॥
सपिप्पलीशृङ्गबेरां हरितालमनःशिलाम्। रसाञ्जन तार्क्ष्यशिलां सुमनाकोरकाणि च ।।७९।।
सप्तमोत्र गुडस्यांशो मधुना सह पेषितः । एषा कल्याणिका नाम सर्वरोगरसक्रिया ।।८०।।
पिप्पली, आर्द्रक, हरिताल, मनःशिला, तार्क्ष्यशैलोद्भव रसाञ्जन, चमेली की कलियां तथा सातवां गुड का अंश—इन सबको मधु के साथ पीसले। यह सब रोगों को नष्ट करने वाली कल्याणिका नामक रसक्रिया है ।।७९-८०।।
मरिचं शृङ्गबेरं च समभागानि कारयेत्। दधिनाऽम्लेन पिष्ट्वा तु ताम्रपट्टं प्रलेपयेत् ।।८१।।
सप्तरात्रं प्रलिप्त्यैव ततो दध्ना प्रपेषयेत्। वर्त्योऽथ तनुकाः कार्या दद्यात् कौतुकमञ्जनम् ।।८२।।
मरिच तथा आर्द्रक को समभाग में लेकर उन्हें दही तथा कांजी से पीसकर ताम्र के टुकड़ों पर लेप करदे। सात दिन तक उन पर इसी प्रकार लेप करके उन्हें दही के साथ पीसले। उनकी छोटी २ वर्तियां बनाये। इनसे नेत्रों में अञ्जन करना चाहिये। यह आश्चर्यजनक अञ्जन है ।।८१-८२।।
मृदुपूूर्वमदोषं तु मात्रायुक्तं च भेषजम्।
सादेश्यात्तत्कुलीनां (?) च कुर्याद्बाले भिषक क्रियाम् ।।८३।।
चिकित्सक को चाहिये कि वह बालक के लिये पहले मृदु, दोषरहित तथा योग्य मात्रा में औषध का प्रयोग करे ।।८३।।
कटुकीया हि केचित् स्यान्म(स्युर्म)धुरीयास्तथाऽपरे। मृदु तस्मै उपक्राम्यंस्तीक्ष्णमप्यल्पमाचरेत् ।।८४।।
कुछ लोग बालक के लिये कटु ओषधियों का तथा कुछ मधुर ओषधियों का प्रयोग करते हैं। बालकों की मृदु ओषधियों के द्वारा ही चिकित्सा करनी चाहिये। तीक्ष्ण ओषधियों का यथासंभव कम प्रयोग करे ।।८४।।
इति वार्योविदायेदं महीपाय महानृषिः। शशंस सर्वमखिलं बालानामथ भेषजम् ।।८५।।
इस प्रकार महर्षि कश्यप ने वार्योंविद नामक राजा को सम्पूर्ण बालकों की ओषधियों का उपदेश कर दिया ।।८५।।
लोध्रं सयष्टीमधुकं तु पिष्टं घृतेन भृष्टं तु निबध्य वस्त्रे।
क्वाथं गुडूच्याः परिमृज्य तप्ते निहन्ति सर्वाक्षिगतानिकारान् ।।८६।।
लोध्र तथा मधुयष्टि को पीसकर घी में भून लें। उसे वस्त्र में बांधकर गिलोय के गरम २ क्वाथ में लटकाकर शुद्ध करलें। इसके प्रयोग से सम्पूर्ण नेत्र रोग नष्ट होते हैं ।।८६।।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।। ष्फ (८४) ।
(इति) वृद्धकाश्यपीयायां संहितायां कुक्कुणकचिकित्साध्यायस्त्रयोदशः ।।१३।।
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ।।८७।। ष्फ (८४) ।
(इति) वृद्धकाश्यपीयायां संहितायां कुक्कुणकचिकित्साध्यायस्त्रयोदशः ।।१३।।
५४ का.सं.