काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 856, कुल 942 में से
संदर्भ में पढ़ें४९६ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | विसर्पचिकित्सिताध्यायः १४]
अथ विसर्पचिकित्सिताध्यायश्चतुर्दशः।
अथातो वैसर्पचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥
अब हम विसर्प चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। विसर्प शब्द का अर्थ चारो ओर फैलना है अर्थात् जो रोग चारो ओर फैलता है उसेस विसर्प कहते हैं। यह व्याधि शरीर में विविध प्रकार से सर्पण (प्रसार या फैलाव) करती है इसलिये इसे विसर्प कहा है। अथवा चारो ओर से (सर्वतः) परिसर्पण (प्रसार) के कारण इसे परिसर्प नाम से भी कहा जाता है। अर्थात् इस रोग का प्रसार दो प्रकार से हो सकता है। या तो यह रोग दो ओर फैलता है अथवा कभी २ चारो ओर फैलने लगता है। यह एक सम्पूर्ण शरीर में फैलने वाला रोग है। जिसमें वातादि (वात, पित्त एवं कफ) दोषों के कारण त्वचा, रक्त, मांस एवं लसीका—ये चारो दूष्य दूषित हो जाते हैं। आयुर्वेद में इसे प्रधानरूप से निज या दोषज रोग माना गया है। एलोपैथी में इसे (Erysipelas) नाम दिया गया है। जो कि मुख्यरूप से आगन्तु रोग माना गया है। (Streptococcus Erysipelatis) नामक जीवाणु इस रोग को उत्पन्न करने का प्रधान कारण माना गया है। त्वचा में कोई क्षत होने पर यह जीवाणु शरीर में प्रवेश करता है। कभी २ क्षत के अतिसूक्ष्म होने से हमें क्षत का ज्ञान नहीं होता यद्यपि जीवाणु सूक्ष्म क्षत के द्वारा ही प्रविष्ट होते हैं। उस अवस्था में इस रोग को (Idio-pathic) या आयुर्वेद के अनुसार दोषज कहते हैं। जिसमें हमें क्षत का स्पष्टरूप से ज्ञान हो उसे क्षतज (Traumatic) कहते हैं। ये जीवाणु त्वचा में प्रविष्ट होकर शोथ, जलन, रक्तिमा आदि स्थानिक लक्षण उत्पन्न कर देते हैं तथा यदि रोग के जीवाणु अधिक बलवान् होते हैं तो वे रक्त में पहुँच कर ज्वर आदि सार्वदैहिक लक्षण भी उत्पन्न कर देते हैं। यद्यपि आयुर्वेद में इसे मुख्य रूप से दोषज व्याधि ही माना है इसीलिए इसके जो ७ भेद दिये हैं वे भी दोषों के अनुसार ही हैं। इसी अध्याय में आगे कहा जायगा—‘वातिकः पैत्तिकश्चैव.......समुदाहृताः ॥’ तथापि पृथक् नाम का निर्देश न करने पर भी इसके निदान में कहा है—‘क्षताद्ब्रागाद्यथोत्पिष्टादामच्छेदाद्विधारणात्।’ अर्थात् क्षत भग्न आदि का उल्लेख किया गया है। इसीप्रकार चरक चि. अ. २१ में भी कहा है। अर्थात् यहां भी दोषज कारणों से अतिरिक्त क्षत, वध (तीव्र आघात), बन्ध (कस कर पट्टी बांधना) तथा पतन (गिरकर चोट लगना) आदि का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। इस प्रकार स्पष्टरूप से क्षतज भी माना गया है ॥१-२॥
कश्यपं भिषजां श्रेष्ठमादित्यसमतेजसम्। हुताग्निहोत्रमासीनमपृच्छद् वृद्धजीवकः ॥३॥
सूर्य के समान तेजस्वी, अग्निहोत्र करके बैठे हुए भिषक् श्रेष्ठ महर्षि कश्यप से वृद्धजीवक ने निम्न प्रश्न किया ॥३॥
भगवन् मण्डलीभूतं त्वग्रक्तं मांसमेव च। विदहन् दृश्यते व्याधिराशीविषविषोपमः ॥४॥
दुःसहः सुकुमाराणां कुमाराणां विशेषतः।
भगवन् सर्पविष के समान यह व्याधि मण्डलीभूत त्वचा (तथा त्वचाश्रित लसीका), रक्त और मांस को जलाती हुई सी दिखाई देती है। यह विशेषकर सुकुमार बालकों में होता है।
वक्तव्य— १. त्वचा—यहां त्वचा से त्वचाश्रित लसीका का भी ग्रहण किया जाना चाहिये क्योंकि विसर्प की उत्पत्ति में दोष तथा दूष्य सब मिलाकर ७ द्रव्य होते हैं। ये तभी पूरे हो सकते हैं जब दूष्यों में लसीका को भी गिना जाय। ऐसा चरक चि. अ. २१ में कहा है। २. यहां यह द्रष्टव्य है कि जिस प्रकार विसर्प के आरंभ कारण वातादि तीन