काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविसर्पचिकित्सिताध्यायः १४] खिलस्थानम् ४९७
दोष तथा त्वचा, रक्त, मांस एवं लसीका आदि ४ दूष्य अर्थात् ७ द्रव्य हैं उसी प्रकार कुष्ठों की उत्पत्ति में भी ये ही सात द्रव्य भाग लेते हैं। ऐसा माधवनिदान में भी कहा है। अब प्रश्न यह उठता है कि इन दोनों में फिर अन्तर क्या है ? इसका अन्तर भी माधवनिदान के कुष्ठ प्रकरण में मधुकोश व्याख्या में दिया गया है कि कुष्ठ—चिरक्रिया बाले, स्थिर, निर्बल रक्तपित्त वाले दोषों से होते हैं और विसर्प—अचिर विसर्पणशील, प्रबल रक्तपित्त वाले दोषों से होते हैं। एवं कुष्ठ में गुरु की अवज्ञा और चोरी आदि कारण हैं किन्तु विसर्प में नहीं। कुछ आचार्यों के मत में विसर्प वातादि एक २ दोष से होताहै तथा कुष्ठ त्रिदोषज ही होता है। यह इनमें परस्पर भेद है। ३. सुकुमाराणां कुमाराणाम्—विसर्प मुख्यरूप से छोटे बालकों को होता है। अथवा फिर ४० वर्ष के बाद की अवस्था में होता है। बालकों में भी मुख्यरूप से सद्यः प्रसूत बालक को प्रायः होता है। गर्भ के कारण उत्पन्न हुए क्षत के कारण इसके जीवाणु शिशु के शरीर में प्रविष्ट हो जाते हैं। G. E. Beaumont की Medicine में भी विसर्प के कारणों में लिखा है॥४॥
तस्य दारुणरूपस्य दीप्ताग्निसमतेजसः ।।५।।
समुत्पत्तिं च रूपं च चिकित्सां च महामुने ! । वक्तुमर्हसि तत्त्वेन बालानां हितकाम्यया ।।६।।
महामुने ! बालकों के हित की दृष्टि से आप अग्नि के समान तेज वाले तथा भयंकर रूप (लक्षणों) वाले-उस रोग की उत्पत्ति (Etiology and causes) रूप (लक्षण-Symptoms) तथा चिकित्सा का विस्तार से उपदेश कीजिये।
इति पृष्टः सा शिष्येण प्रोवाचेदं महामुनिः । दक्षक्रोधाद्भगवतो रुद्रस्यामिततेजसः ।।७।।
संदष्टौष्ठपुटस्यौष्ठाद्यद्रक्तं प्रापतद् भुवि । लोहिताङ्गोऽभवत्तस्माद्वैसर्पश्चाग्निसन्निभः ।।८।।
तस्याग्निर्दाहिनावेतौ भृशं पीडाकृतौ नृणाम्।
इस प्रकार शिष्य द्वारा प्रश्न किया जाने पर महामुनि कश्यप ने उत्तर दिया—असीम तेज वाले भगवान् रुद्र (महादेव) ने जब दक्ष पर क्रोध किया तब क्रोध से दांतों के द्वारा होठों के दबाये जाने से उनके होंठ से जो रक्त निकलकर भूमि पर गिरा वही लोहिताङ्ग (रक्त) तथा अग्नि के समान तेज वाले विसर्प रोग के रूप में उत्पन्न हुआ। इसलिये ये दोनों मनुष्यों का दाह करने वाले तथा अत्यन्त पीडा देने वाले हैं ।।७-८।।
विविधं सर्पणाद्देहे वैसर्पस्तु निरुच्यते ।।९।।
विसर्प की निरुक्ति—शरीर में नाना प्रकार से सर्पण (फैलना, विस्तार) करने के कारण यह विसर्प कहलाता है ।।९।।
क्षताद्भग्नादथोत्पिष्टादामच्छेदाद्विधारणात् । दध्यम्लमन्दकसुराशुक्तसौवीरकस्य च ।।१०।।
तिलमाषकुलत्थानां पलाण्डोर्लशुनस्य च । ग्राम्यानूपौदकानां च मांसानामतिसेवनात् ।।११।।
विरोधिगुर्वनिष्यन्दपूतिपर्युषिताशनात् । दिवास्वप्नाद जीर्णाच्च शाकपिष्टान्नसेवनात् ।।१२।।
विषोपहतवाय्वम्बुवस्त्रपानान्नसेवनात् । एवमादिभिरप्यन्यैर्दुष्टा वातादयः शिशोः ।।१३।।
वैसर्पं जनयन्त्याशु रक्तादीन् संप्रदूष्य तु । एवमेव प्रकुपितैर्दोषैर्दुष्टं यदा पयः ।।१४।।
सेवते तस्य तद्दोषाद्वैसर्पः संप्रजायते ।
विसप के कारण—क्षत, (चोट), अस्थिभग्न अथवा दब जाने (Laciration) से, शरीर के किसी अंश का कच्ची